America Food Guideline: करीब 40 साल बाद अमेरिका ने ऑफिशियल तौर पर ये स्वीकार कर लिया है कि वो डाइट को लेकर अब तक गलत दिशा में था. जो देश पूरी दुनिया को हाई-कार्ब, लो-फैट डाइट सिखा रहा था, उसने अब पूरा खेल बदल दिया है. हाल ही में व्हाइट हाउस ने नया “रियल फूड पिरामिड” और नई डाइट गाइडलाइंस जारी की हैं, जो पुराने फूड पिरामिड से बिल्कुल उलट हैं.
प्रोटीन को मिली पहली जगह
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ब्रेड, चावल और अनाज फूड पिरामिड का बेस नहीं रहे. उनकी जगह अब प्रोटीन को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है. नई गाइडलाइंस के मुताबिक, प्रोटीन की रिकमेंडेशन बढ़ाकर 1.6 ग्राम प्रति किलो बॉडी वेट कर दी गई है, जो पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी है. यानी अब साफ माना जा रहा है कि शरीर की सेहत के लिए पर्याप्त प्रोटीन बेहद जरूरी है.
फैट
दूसरा और उतना ही बड़ा बदलाव फैट को लेकर डर का खत्म होना है. सालों तक लोगों को सिखाया गया कि फैट खाने से मोटापा बढ़ता है, लेकिन अब अमेरिका खुद मान रहा है कि यह सोच अनसाइंटिफिक थी. नई गाइडलाइंस में फुल-फैट डेयरी, अंडे, और हेल्दी फैट्स को फिर से डाइट में शामिल किया गया है. साफ कहा गया है कि नेचुरल फैट खाने से हम फैट नहीं होते.
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कार्बोहाइड्रेट और ग्रेन्स
तीसरा अहम बदलाव कार्बोहाइड्रेट और ग्रेन्स पर कटौती है. यहां तक कि होल ग्रेन्स और शुगर को भी सीमित करने की सलाह दी गई है. फोकस अब कैलोरी नहीं, बल्कि न्यूट्रिएंट-डेंस फूड पर है. गाइडलाइंस में यह भी साफ कहा गया है कि क्रॉनिक डिजीज (जैसे डायबिटीज़, मोटापा) से जूझ रहे लोगों को लो-कार्ब डाइट से बेहतर हेल्थ मिल सकती है.
एडेड शुगर
इसके अलावा, एडेड शुगर को पूरी तरह गैर-ज़रूरी बताया गया है. खास तौर पर चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नो एडेड शुगर एट ऑल की सिफारिश की गई है. यह बदलाव सिर्फ डाइट का नहीं, बल्कि क्रॉनिक बीमारियों को रिवर्स करने की दिशा में एक बड़ा यू-टर्न है. सालों तक सरकारी नीतियों और फूड-फार्मा इंडस्ट्री ने सस्ते प्रोसेस्ड फूड और इलाज पर जोर दिया, प्रिवेंशन को नजरअंदाज किया.
अमेरिका का असर भारत पर भी साफ दिखता है. हाल ही की ICMR स्टडी बताती है कि एक भारतीय की 60–70% कैलोरी आज भी कार्बोहाइड्रेट से आती है. हम अब भी 1992 की डाइट गाइडलाइंस फॉलो कर रहे हैं, जिन्हें अमेरिका खुद अब कूड़ेदान में डाल चुका है.
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