NCERT vs Private Books : आज के दौर में शिक्षा एक अधिकार कम और व्यापार ज्यादा नजर आने लगी है. हर साल अप्रैल का महीना आते ही मध्यमवर्गीय अभिभावकों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं. कारण है प्राइवेट स्कूलों की मनमानी और किताबों के आसमान छूते दाम. भारत सरकार का नारा है 'सब पढ़ें-सब बढ़ें', लेकिन जब एक मामूली सी किताब के लिए जेब से दस गुना ज्यादा पैसे वसूले जाने लगें, तो यह नारा केवल कागजों तक ही सीमित लगने लगता है.
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दाम में 10 गुना का अंतर आखिर क्यों?NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) की जो किताब महज 65 से 70 रुपये के बीच मिल जाती है, वही किताब प्राइवेट पब्लिकेशन 600 से 800 तक में बेचते हैं. आखिर इन किताबों में ऐसा क्या है?
किताबों में क्या होता है अंतरअक्सर स्कूल तर्क देते हैं कि इन किताबों में हाई-क्वालिटी पेपर, आकर्षक ग्राफिक्स और एक्स्ट्रा वर्कशीट होती हैं. स्कूल इन्हें वैल्यू एडिशन का नाम देते हैं. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या सिर्फ चमकदार कागज और रंगीन तस्वीरों की कीमत 10 गुना ज्यादा होनी चाहिए? यह सीधे-सीधे अभिभावकों की जेब पर डकैती करने जैसा है, जिसे लेकर पेरेंट्स परेशान रहते हैं.
कमीशन का है खेलज्यादातर प्राइवेट स्कूलों का खेल स्थानीय किताबों की दुकानों के साथ फिक्स होता है. स्कूल प्रशासन एक विशेष दुकान का नाम बताता है और अभिभावकों को वहीं से पूरा सेट खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है. इसके पीछे की कड़वी सच्चाई है मोटा कमीशन. जितनी महंगी किताबें बिकेंगी, स्कूल का परसेंटेज उतना ही ज्यादा होगा.
नियमों की धज्जियां उड़ाते स्कूलनियमों के मुताबिक, कक्षा 9वीं से 12वीं तक NCERT अनिवार्य है और प्राथमिक कक्षाओं के लिए भी इसी की सिफारिश की जाती है. इसके बावजूद, देश के लगभग 10 करोड़ बच्चे जो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं, वे इन भारी-भरकम किताबों का बोझ ढो रहे हैं. सरकार के आदेशों को ठेंगे पर रखकर ये संस्थान हर साल न केवल फीस बढ़ाते हैं, बल्कि यूनिफॉर्म और किताबों के जरिए भी वसूली का नया रास्ता निकाल लेते हैं.
इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर हाल ही में राज्यों के साथ-साथ अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने सख्त रुख अपनाया है. आयोग ने साफ कहा है कि स्कूलों में किसी भी तरह का अकेडमिक भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अगर कोई स्कूल इस दौरान नियमों का उल्लंघन करता है, तो छात्र या पैरेंट्स उसकी शिकायत कर सकते हैं. साथ ही प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने देशभर से मिली शिकायतों के बाद सभी राज्य सरकारों और शिक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी कर 30 दिन में रिपोर्ट मांगी है. आयोग ने यह कार्रवाई 'नमो फाउंडेशन' द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर की है.
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