Tamilnadu NEET Controversey 2026 : साल 2026 में नीट-यूजी परीक्षा को लेकर हुए हालिया विवाद और पेपर लीक की घटनाओं ने एक बार फिर इस परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस ताजा मामले को देखते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (CM Vijay) ने केंद्र सरकार के सामने अपने 'नो नीट मॉडल' (No NEET Model) की पैरवी बहुत मजबूती से की है. सीएम विजय ने साफ कहा है कि यह परीक्षा अमीर और गरीब के बीच की खाई को बढ़ाती है और इसे तुरंत खत्म कर देना चाहिए.
17 साल की अनीता की कैसे गई जानतमिलनाडु में नीट का विरोध आज का नहीं है, बल्कि इसका एक बेहद भावुक और दर्दनाक इतिहास रहा है. साल 2017 में अरियालुर जिले की एक गरीब दलित छात्रा एस. अनीता ने नीट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी. एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी अनीता ने तमिलनाडु स्टेट बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में 1200 में से 1176 अंक यानी करीब 98 प्रतिशत स्कोर किए थे..
अनीता की कहानी सिर्फ अच्छे नंबरों की नहीं, बल्कि भारी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से लड़ने की थी. अनीता के पास पढ़ाई के लिए बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं, इसके बावजूद उसने अपनी लगन से बोर्ड परीक्षा में शानदार 196.75 का मेडिकल कट-ऑफ स्कोर हासिल किया, जो राज्य के किसी भी टॉप मेडिकल कॉलेज में सीट पाने के लिए काफी था.
कोचिंग के लिए नहीं थे पैसे
अगर पुरानी व्यवस्था होती, तो अनीता का डॉक्टर बनने का सपना आसानी से पूरा हो जाता. लेकिन ठीक उसी साल तमिलनाडु में नीट को अनिवार्य कर दिया गया. सीबीएसई (CBSE) के पाठ्यक्रम पर आधारित इस परीक्षा में अनीता अच्छा स्कोर नहीं कर पाई, क्योंकि उसके पास महंगे कोचिंग सेंटरों में जाने के पैसे नहीं थे.
9 दिन बाद दे दी जानवह खुद सुप्रीम कोर्ट में नीट के खिलाफ याचिकाकर्ताओं में शामिल हुई थी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय राहत न मिलने के महज 9 दिन बाद, हताश होकर 17 साल की अनीता ने आत्महत्या कर ली. इस घटना ने पूरे तमिलनाडु को झकझोर कर रख दिया और वहां नीट के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हो गया.
पहले तमिलनाडु में कैसे बनते थे डॉक्टर?आपको बता दें कि नीट लागू होने से पहले, तमिलनाडु में डॉक्टर बनने का रास्ता बहुत आसान था. राज्य के सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पूरी तरह से 12वीं कक्षा (बोर्ड परीक्षा) के अंकों के आधार पर होता था.
इस पुराने सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह था कि गांवों में रहने वाले, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले और पहली पीढ़ी के छात्रों को भी डॉक्टर बनने का मौका मिलता था. उन्हें किसी अलग प्रवेश परीक्षा या कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ती थी. तमिलनाडु का हेल्थकेयर मॉडल पूरे देश में सबसे अच्छा माना जाता था, क्योंकि यहां के स्थानीय छात्र डॉक्टर बनकर वापस अपने ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देते थे.
इस पुराने सिस्टम का इतिहास क्या था?1984 से 2006 तकसाल 1984 में राज्य में 'तमिलनाडु प्रोफेशनल कोर्सेज एंट्रेंस एग्जामिनेशन' (TNPCEE) की शुरुआत की गई थी, जिसमें 12वीं के मार्क्स और इस प्रवेश परीक्षा के अंकों को जोड़कर रैंक बनती थी.
2006 में बड़ा बदलावइसके बाद डीएमके (DMK) सरकार ने महसूस किया कि प्रवेश परीक्षा (TNPCEE) के कारण शहरी और अमीर छात्र, जो महंगी कोचिंग ले सकते थे, उन्हें फायदा हो रहा था और ग्रामीण छात्र पिछड़ रहे थे. इसलिए साल 2006-07 में राज्य सरकार ने प्रवेश परीक्षा को पूरी तरह रद्द कर दिया और फिर12वीं के अंकों को ही आधार बना दिया. इसके बाद से 2016 तक तमिलनाडु में बिना किसी कोचिंग और बिना किसी अतिरिक्त परीक्षा के गरीब से गरीब बच्चा भी केवल स्कूल में अच्छी पढ़ाई करके डॉक्टर बन जाता था. फिर 2017 में पूरे देश में नीट को लागू कर दिया गया. जिसके पक्ष में तमिलानाडु कभी नहीं रहा.
नीट लागू होने का गरीब और ग्रामीण छात्रों पर कैसे पड़ा असर?नीट लागू होने के बाद राज्य की इस व्यवस्था को गहरा झटका लगा. तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित जस्टिस ए.के. राजन समिति की रिपोर्ट में यह साफ हुआ कि नीट आने के बाद:
- मेडिकल सीटों पर 90% से ज्यादा कब्जा उन छात्रों का होने लगा जो लाखों रुपये खर्च करके प्राइवेट कोचिंग लेते थे.
- जो ग्रामीण छात्र पहले 60% से अधिक सीटें पाते थे, नीट के बाद उनका ग्राफ गिरकर बेहद कम रह गया.
- यह परीक्षा केवल उन लोगों के लिए आसान साबित हुई जो बार-बार ड्रॉप लेकर महंगी कोचिंग का खर्च उठा सकते थे.यानी जो आर्थिक रूप से मजबूत थे वही इसका फायदा उठा सकते थे गरीब तबका पिछड़ता चला गया.
तमिलनाडु की पिछली सरकारें भी हमेशा से नीट के खिलाफ रही हैं. राज्य की स्वायत्तता और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए तमिलनाडु विधानसभा में 'नीट छूट विधेयक' (Tamil Nadu Anti-NEET Bill) पास किया गया था. इस बिल का मकसद राज्य को नीट के दायरे से बाहर रखकर दोबारा 12वीं के अंकों के आधार पर एडमिशन शुरू करना था. हालांकि, राज्यपाल और केंद्र सरकार के स्तर पर इस बिल को अस्वाीकार कर दिया गया. इसको लेकर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई.
अब सीएम विजय क्या बोल रहे हैं?हाल ही में नीट-यूजी 2026 परीक्षा में हुई धांधलियों और पेपर लीक के बाद मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) और विधानसभा में अपनी आवाज बुलंद की है. सीएम विजय का मानना है कि इस परीक्षा का पूरा ढांचा ही दोषपूर्ण है.
विजय ने केंद्र सरकार से जोरदार अपील की है कि शिक्षा को समवर्ती सूची (Concurrent List) से हटाकर पूरी तरह राज्यों के अधिकार में दिया जाना चाहिए. विजय का 'नो नीट मॉडल' सीधा है मेडिकल शिक्षा में राज्यों को अपनी नीति तय करने की आजादी मिले, ताकि देश के किसी भी गरीब या ग्रामीण पृष्ठभूमि के होनहार छात्र का सपना कोचिंग न मिल पाने के कारण दम न तोड़े.
नो नीट मॉडल से छात्रों को क्या होगा फायदाइससे गरीब, मध्यमवर्गीय और किसान परिवारों के बच्चों को महंगी कोचिंग के जाल और कर्ज के बोझ से मुक्ति मिलेगी. गांवों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले छात्रों के पास बड़े शहरों जैसे कोचिंग संसाधन नहीं होते. ऐसे में 12वीं के मार्क्स को आधार बनाने से सरकारी और ग्रामीण स्कूलों के होनहार छात्र, जो अपने स्कूल या जिले में टॉप करते हैं, बिना किसी भेदभाव के सीधे देश के बेहतरीन मेडिकल कॉलेजों में पहुंच सकेंगे.
नीट जैसी नेशनल लेवल की परीक्षा का दबाव बच्चों पर मेंटल प्रेशर पड़ता है, एक ही परीक्षा पर पूरा भविष्य टिके होने के कारण छात्र डिप्रेशन का शिकार होते हैं.इस मॉडल से छात्र अपनी सालभर की स्कूली पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे, जिससे परीक्षा का डर और असमय मौतों का सिलसिला थमेगा.
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