आज मोदी सरकार के सफल 12 साल पूरे हो चुके हैं. इस मौके पर देश के हर सेक्टर के कामकाज का आकलन हो रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले 12 वर्षों में मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में क्या बदलाव किए हैं, इसकी चर्चा करेंगे. बता दें कि सरकार का लक्ष्य अगले 5 सालों में देश के भीतर 75,000 नई मेडिकल सीटें तैयार करना है. इसी सपने को पूरा करने की दिशा में पीआईबी के अनुसार, 24 सितंबर 2025 को हुई कैबिनेट बैठक में एक बहुत बड़ा फैसला लिया गया. कैबिनेट बैठक में सरकार ने देश के सरकारी कॉलेजों और अस्पतालों में 10,023 नई मेडिकल सीटें जोड़ने की मंजूरी दी.
UG और PG की कितनी सीटें
इन नई सीटों में से 5,023 सीटें अंडर-ग्रेजुएट (MBBS) के लिए होंगी और 5,000 सीटें पोस्ट-ग्रेजुएट (MD/MS) यानी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को तैयार करने के लिए होंगी.
बीते 12 सालों में कितना बदला मेडिकल का ढांचा?
पीआईबी के अनुसार, अगर हम पिछले 12 सालों के आंकड़ों को देखें, तो समझ आता है कि देश में मेडिकल की पढ़ाई को लेकर कितनी तेजी से काम हुआ है. साल 2013-14 में जहां देश में सिर्फ 387 मेडिकल कॉलेज थे, वहीं साल 2025-26 में यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा बढ़कर 808 हो गई.
यानी 2025 में 1,23,700 MBBS सीटें कर दी गईं जिसमें अंडर-ग्रेजुएट (MBBS) की सीटों में 141% और पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) की सीटों में 144% की जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई. इसके अलावा देश के हर हिस्से तक बड़े अस्पताल पहुंचाने के लिए 'प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना' के तहत 22 नए AIIMS अस्पतालों को भी मंजूरी दी गई.
क्या है सरकार का प्लान
इसके लिए सरकार 2025-26 से 2028-29 तक में पूरे 15,034 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है. अगर एक सीट के खर्च को देखें, तो सरकार हर एक मेडिकल सीट को तैयार करने में करीब 1.5 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश कर रही है. इस पूरे बजट में से 68.5% हिस्सा यानी 10,303.20 करोड़ रुपये केंद्र सरकार देगी, जबकि बाकी बचे 4,731.30 करोड़ रुपये राज्य सरकारों की तरफ से लगाए जाएंगे.
नियमों में हुए बड़े बदलाव
वहीं, सिर्फ सीटें बढ़ा देने से काम नहीं चलता, बच्चों को पढ़ाने के लिए अच्छे प्रोफेसर्स की भी जरूरत होती है. इस कमी को दूर करने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने जुलाई 2025 में कुछ नए और बेहद आसान नियम लागू किए हैं:
अनुभवी डॉक्टरों को सीधे पढ़ाने का मौका
सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले जिन अनुभवी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के पास 10 साल का तजुर्बा है, वे अब बिना सीनियर रेजिडेंसी के सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बन सकेंगे. वहीं 2 साल के अनुभव वाले डॉक्टर असिस्टेंट प्रोफेसर बन सकते हैं. बस उन्हें अगले 2 साल के अंदर बायोमेडिकल रिसर्च का एक बेसिक कोर्स पूरा करना होगा. इसके अलावा, NBEMS मान्यता प्राप्त संस्थानों में 3 साल का टीचिंग अनुभव रखने वाले सीनियर कंसल्टेंट सीधे प्रोफेसर बन सकते हैं.
छोटे और नॉन-टीचिंग अस्पतालों को अपग्रेड करना
जिन नॉन-टीचिंग सरकारी अस्पतालों में 220 या उससे ज्यादा बेड हैं, उन्हें अब मेडिकल कॉलेज (टीचिंग इंस्टीट्यूट) के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा. इससे मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का दायरा तेजी से बढ़ेगा.
UG और PG कोर्स एक साथ शुरू करने की अनुमति
नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों को अब एक साथ अंडर-ग्रेजुएट (MBBS) और पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) कोर्स शुरू करने की अनुमति दे दी गई है, जिससे नए मेडिकल स्टाफ और प्रोफेसर्स की भर्ती तेजी से हो सके.
MSc-PhD धारकों को मौका
एनॉटमी, फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री के साथ-साथ अब माइक्रोबायोलॉजी और फार्माकोलॉजी विभागों में भी MSc-PhD डिग्री वाले योग्य लोग फैकल्टी बन सकेंगे. साथ ही, ब्रॉड स्पेशलिटी विभागों में काम कर रहे सुपर स्पेशलिटी डॉक्टरों को अब उनके संबंधित विभागों में आधिकारिक रूप से पदनाम (Designation) मिल सकेगा.
आपको बता दें कि मेडिकल सीटें और अस्पताल बढ़ने से सिर्फ डॉक्टरों को ही नहीं, बल्कि नर्स, लैब तकनीशियन, रिसर्चर्स और प्रशासनिक स्टाफ के रूप में हजारों लोगों को नौकरियां मिलेंगी. इससे न केवल आम आदमी को बेहतर इलाज मिलेगा, बल्कि भारत दुनिया के नक्शे पर चिकित्सा के क्षेत्र में एक मजबूत देश बनकर सामने आएगा.
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