एनडीटीवी के एजुकेशन कॉन्क्लेव NDTV LearnNXT में शिक्षा जगत के कई दिग्गजों ने हिस्सा लिया. इस दौरान NCERT के डायरेक्टर दिनेश प्रसाद सकलानी भी इवेंट में शामिल हुए और उन्होंने न्यू एजुकेशन पॉलिसी से लेकर सीबीएसई के थ्री लैंग्वेज वाले विवाद पर भी जवाब दिया. NCERT चीफ ने कहा कि NEP को लेकर कई सालों तक चर्चा हुई और आखिरकार इसे लागू किया जा रहा है. बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता को भी इसे समझने की जरूरत है. इस दौरान उन्होंने थ्री लैंग्वेज पॉलिसी का भी समर्थन किया.
थ्री लैंग्वेज पॉलिसी क्यों जरूरी?
CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर NCERT चीफ सकलानी ने कहा कि जब हम अपने स्कूल के दिनों को याद करते हैं तो कक्षा 6 में हमने पहली बार अंग्रेजी पढ़ी, आज हमारी इंग्लिश काफी अच्छी है. हमें एक मानसिकता से बाहर आने की जरूरत है. अगर हम किसी भी नई चीज को स्ट्रेस के साथ लेंगे तो वो स्ट्रेस देगी, किसी भी नई चीज का स्वागत करेंगे और सीखेंगे तो ये उतनी ही अच्छी होगी. आज जितने भी मल्टी लिंग्वल लोग हैं, उन्होंने अपनी शुरुआती जिंदगी में ही तमाम भाषाएं सीख लीं.
9वीं और 10वीं में क्यों लागू हुई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी?
NCERT चीफ ने आगे कहा कि अगर बच्चा एक और भाषा सीख लेता है तो, उसे पूरे देश की बात जानने का मौका मिलेगा. जब हम किसी दूसरे राज्य में जाते हैं तो अपने को अनपढ़ महसूस करते हैं, क्योंकि हम भाषा नहीं जानते हैं. तब लगता है कि हमने भी ये भाषा पढ़ी होती तो ये दिक्कत नहीं आती. जब एनसीईआरटी के डायरेक्टर से पूछा गया कि छठवीं कक्षा से थ्री लैंग्वेज पॉलिसी लागू होनी थी, लेकिन इसे 9वीं और 10वीं में अचानक क्यों लागू किया गया? इस पर उन्होंने कहा कि इसमें कुछ समस्याएं आएंगीं, लेकिन उन्हें सुलझाया जा सकता है. टीचर और स्कूल हर चीज नहीं कर सकते हैं, कम्युनिटी में बहुत सारे ऐसे ट्रेनर हैं, जिनके सपोर्ट से ये लागू हो सकता है. स्कूल और समाज को एक साथ मिलकर काम करना होगा.
दिनेश प्रसाद सकलानी ने कहा कि अगर आपको ग्लोबल बनना है तो लोकल को छोड़कर ऐसा नहीं हो सकता है. पहले हमारे पैर अपनी जमीन पर टिके होने चाहिए. भारत के पास अपार ज्ञान है, क्यों नहीं हम उसे दुनिया के साथ जोड़ सकते हैं. भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, भाषा ज्ञान और संस्कृति का एक जरिया है.
प्रोफेसर सकलानी ने कहा कि छात्रों कष्ट हो रहा है, क्योंकि हम कह रहे हैं कि उन्हें परेशानी हो रही है. अगर छात्र सोच लें कि हमें ये करना है तो वो कर सकते हैं. मेरी समझ से अगर हम इस तनाव और दबाव को एक मौके के तौर पर देखें तो बदलाव जरूर दिखेगा.
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