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This Article is From Feb 25, 2026

एमपी गजब है...5 यूनिवर्सिटी में एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं, टंट्या भील यूनिवर्सिटी का भी बुरा हाल

Madhya Pradesh Education System: टंट्या मामा के नाम पर विश्वविद्यालय खोलना राजनीतिक रूप से आसान था, जरूरी भी क्योंकि राज्य में आदिवासी आबादी करीब 22% है. मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 में, 84 विधानसभा सीटें आदिवासी बहुल हैं, 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं.

एमपी गजब है...5 यूनिवर्सिटी में एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं, टंट्या भील यूनिवर्सिटी का भी बुरा हाल
मध्य प्रदेश में यूनिवर्सिटीज का बुरा हाल

चुनाव के मौसम में नेता जिस नाम को सबसे ज़्यादा याद करते हैं, वोट के बाद वही नाम अक्सर सरकारी फाइलों में अकेला रह जाता है। मध्य प्रदेश में आदिवासी अस्मिता के बड़े प्रतीक क्रांतिसूर्य टंट्या भील के नाम पर विश्वविद्यालय तो खोल दिया गया, हजारों छात्र भी दाखिल हो गए, 140 शिक्षकों के पद भी मंजूर हो गए, लेकिन सारे पद खाली हैं और ये हालात एक विश्वविद्यालय की नहीं है, बल्कि प्रदेश के कई विश्वविद्यालय में हालात ऐसे ही चल रहे हैं.  इसे लेकर विधानसभा में भी सरकार से सवाल किया गया, जिसके जवाब में शिक्षा मंत्री ने बताया कि कितने पद स्वीकृत हैं. 

विधानसभा में पूछा गया सवाल

कांग्रेस विधायक डॉ. झूमा सोलंकी ने विधानसभा में सवाल पूछा कि यूनिवर्सिटी में कितने पद भरे हैं, कितने खाली हैं और कब तक भर्ती होगी? जवाब में उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने बताया कि विश्वविद्यालय में फिलहाल एग्रीक्लचर, आर्ट्स, कॉमर्स साइंस में ग्रेजुएशन हो रहा है, कॉमर्स में पीजी भी है. इसके लिए 80 असिस्टेंट प्रोफेसर, 40 असोसिएट प्रोफेसर 20 प्रोफेसरों के साथ 140 शैक्षणिक पद स्वीकृत हैं. 

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क्या कहते हैं आंकड़े

  • कुल छात्र: 25,000
  • स्वीकृत शैक्षणिक पद: 140
  • भरे पद: 0
  • रिक्त पद: 140
  • व्यवस्था: प्रतिनियुक्ति के भरोसे

विपक्षी विधायक ने उठाए सवाल

विधायक कांग्रेस झूमा सोलंकी ने इस मामले पर कहा कि खरगोन जिले में टंट्या भील यूनिवर्सिटी में 140 पद , प्राध्यापक से प्राध्यापक समेत सभी पद खाली हैं. यूनिवर्सिटी में 25 हजार छात्र छात्राएं पढ़ रहे हैं, यहां कोई भी एग्जाम और रिजल्ट समय पर नहीं हो रहा है. छात्र अपनी रुचि के अनुसार कोर्स नहीं ले सकते हैं. ऐसे कोर्स शुरू ही नहीं किए गए हैं. 6 महीने में सेमेस्टर के अनुसार जो परीक्षाएं होनी चाहिए वह नहीं होती हैं. एग्जाम हो जाते हैं तो मार्कशीट नही दी जाती है. मार्कशीट के आभाव में बच्चों को स्कॉलरशिप नही मिल पा रही है. कार्यसमिति बनी ही नहीं है तो फैसले कैसे होंगे. 

दूसरी यूनिवर्सिटी का भी यही हाल

खरगोन अकेला नहीं है, छिंदवाड़ा में एक और आदिवासी प्रतीक राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय खुला था, जिसमें 100 शैक्षणिक पद स्वीकृत हुए, लेकिन अब तक सब खाली हैं. यहां पढ़ने वाले बीटेक फर्स्ट ईयर के छात्र विश्वजीत पाल ने कहा कि 2-3 लेक्चर लग नहीं पा रहे हैं. टोटल 9 सब्जेक्ट हैं जिसमें एक वर्कशॉप है, अभी 4 पेपर खाली जाते हैं. वहीं बीटेक फर्स्ट ईयर के ही दूसरे छात्र यश पवार ने कहा कि सारी क्लास रेगुलर नहीं ले पाते हैं, सब्जेक्ट ज्यादा हैं, लेकिन फैक्लटी कम है. हमें सिर्फ दो फैकल्टी पढ़ाती हैं. 

इस मामले को लेकर कुलगुरु प्रो. इंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि राज्य शासन ने सभी विश्वविद्यालयों की बैठक बुलाई थी, जिसमें सभी रिक्त पदों को भरने के लिये कार्ययोजना मांगी थी, जो हमने दे दी है. 2027 का लक्ष्य दिया है और दिसंबर 2026 में इंटरव्यू की योजना बनाई है. वहीं प्रभारी कुलसचिव  एके मुगदल ने कहा कि परमानेंट स्टाफ के लिये हमने शासन को रिक्वॉरमेंट दी है, जल्द ही रिक्रूमेंट का काम शुरू हो जाएगा, जिसके बाद आने वाले सेशन में उपलब्धता रहेगी.

राम भरोसे चल रहा है काम

सरकार ने साफ कहा है कि इन पदों पर कब तक भर्ती होगी, यह बताना संभव नहीं है. यानी विश्वविद्यालय में पढ़ाई की घड़ी चल रही है, पर भर्ती की सुई पर सरकार ने लिखा है- "समय-सीमा बताया जाना संभव नहीं है" कुछ शिक्षक प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए हैं, मतलब स्थायी शिक्षा का भवन, अस्थायी इंतजामों की बैसाखियों पर खड़ा है. यह वही प्रदेश है जो दावा करता है कि उसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP सबसे पहले लागू किया. 

उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि 4-5 महीने में भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, बिल्डिंग के लिए 119 करोड़ का डीपीआर तैयार हुआ है और  निर्माण का काम शुरू हो जाएगा. मई-जून तक प्रक्रिया प्रारंभ करेंगे. दूसरी तरफ कुलगुरु का कहना है कि दिसंबर 2026 में प्रक्रिया शुरू होगी. दोनों ही बयानों में विरोधाभास नजर आता है. 

कितने पद हैं खाली?

मध्य प्रदेश के 17 सरकारी विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के 1069 स्वीकृत पदों में से 793 पद खाली हैं. यानी 74 प्रतिशत पद रिक्त हैं. पूरे प्रदेश के विश्वविद्यालयों में सिर्फ 276 असिस्टेंट प्रोफेसर पढ़ाई की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि पांच विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं है. 

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क्या हैं राजनीतिक समीकरण 

टंट्या मामा के नाम पर विश्वविद्यालय खोलना राजनीतिक रूप से आसान था, जरूरी भी क्योंकि राज्य में आदिवासी आबादी करीब 22% है. मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 में, 84 विधानसभा सीटें आदिवासी बहुल हैं, 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. लेकिन उन्हीं आदिवासी प्रतीकों के नाम पर खोले गये विश्वविद्यालयों में शिक्षक भरना शायद प्रशासनिक तपस्या साबित हो रही है. सवाल सिर्फ यह नहीं कि 140 पद खाली क्यों हैं
सवाल यह है कि आदिवासी सीटें  25 हजार छात्रों का भविष्य आखिर किसके भरोसे भरा जाएगा? क्योंकि जब विश्वविद्यालयों में कुर्सियां खाली हों, तो सिर्फ पद नहीं, पूरी पीढ़ियाँ रिक्त हो जाती हैं.

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Madhya Pradesh Education System, MP Assistant Professor, Madhya Pradesh Universities, Tantya Bhil University
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