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IITs में फैकल्टी की कमी का क्या है बड़ा कारण? प्रोफेसर और IIT डायरेक्टर ने दिया जवाब

IIT Faculty Recruitment: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में फैकल्टी के हजारों पद खाली पड़े हैं. NDTV के एनालिसिस में पता चला था 22 IITs में कुल मिलाकर शिक्षकों के 12,198 पद मंजूर हैं, जिनमें से केवल 7,558 पदों पर ही शिक्षक काम कर रहे हैं. यानी 4,640 पद खाली हैं. अब इस पर IIT गांधीनगर के निदेशक और  IIT Bombay के प्रोफेसर ने जवाब दिया है. 

IITs में फैकल्टी की कमी का क्या है बड़ा कारण? प्रोफेसर और IIT डायरेक्टर ने दिया जवाब

IIT Faculty Recruitment: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में फैकल्टी के हजारों पद खाली पड़े हैं. NDTV के एनालिसिस में पता चला था 22 IITs में कुल मिलाकर शिक्षकों के 12,198 पद मंजूर हैं, जिनमें से केवल 7,558 पदों पर ही शिक्षक काम कर रहे हैं. यानी 4,640 पद खाली हैं. अब इस पर IIT गांधीनगर के निदेशक और  IIT Bombay के प्रोफेसर ने जवाब दिया है. 

'भर्ती नहीं, योग्य उम्मीदवारों की कमी सबसे बड़ी चुनौती'

IIT गांधीनगर के निदेशक प्रो. रजत मूना के अनुसार, IITs में फैकल्टी के रूप में उन्हीं लोगों का चयन किया जाता है जो अपने विषय में उत्कृष्ट प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हों और जिनके पास मजबूत पोस्टडॉक्टोरल अनुभव हो. लेकिन कई विशेष क्षेत्रों में ऐसे योग्य उम्मीदवारों के पर्याप्त आवेदन ही नहीं आते, जिससे खाली पदों को भरना मुश्किल हो जाता है. उन्होंने कहा कि IITs गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं कर सकते और केवल पद भरने के लिए नियुक्तियां करना संस्थानों के हित में नहीं होगा. 

आरक्षण नीति नहीं, योग्य उम्मीदवारों की उपलब्धता है मुद्दा

फैकल्टी भर्ती में आरक्षण को लेकर प्रो. मूना ने कहा कि साल 2019 से आरक्षण नीति लागू है, लेकिन कई बार आरक्षित वर्गों से भी आवश्यक योग्यता और शोध अनुभव वाले पर्याप्त उम्मीदवार नहीं मिल पाते. उनका कहना है कि समस्या आरक्षण नीति नहीं, बल्कि योग्य उम्मीदवारों की सीमित उपलब्धता है. 

बढ़ी मांग, लेकिन उतनी तेजी से नहीं बढ़े PhD धारक

प्रो. मूना ने बताया कि पिछले एक दशक में IITs में फैकल्टी की आवश्यकता लगभग तीन गुना बढ़ गई है. दूसरी ओर, देश में पीएचडी करने वाले छात्रों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी. इसका सीधा असर भर्ती प्रक्रिया पर पड़ा है और अच्छे उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं अधिक हो गई है. 

निजी विश्वविद्यालय नहीं, विदेशी संस्थान हैं असली प्रतिस्पर्धी

आम धारणा के विपरीत प्रो. मूना का कहना है कि IITs की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा निजी विश्वविद्यालयों से नहीं है. उनके अनुसार, वास्तविक मुकाबला MIT, Cornell और अन्य प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों से है, जहां बेहतर वेतन, आधुनिक रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और उच्च गुणवत्ता वाली जीवनशैली उपलब्ध होती है. उन्होंने कहा कि आज के समय में उत्कृष्ट शोधकर्ता दुनिया भर में अवसर तलाशते हैं और आसानी से एक देश से दूसरे देश में काम करने चले जाते हैं. 

रिसर्च फंडिंग बढ़ाने की जरूरत

प्रो. मूना का मानना है कि केवल वेतन बढ़ाना ही समाधान नहीं है. अगर भारत में शोध के लिए अधिक फंडिंग, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं और बेहतर अनुसंधान सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो IITs में फैकल्टी के रूप में काम करना अधिक आकर्षक बन सकता है. 

IIT बॉम्बे के प्रोफेसर ने भी जताई चिंता

IIT बॉम्बे के वरिष्ठ प्रोफेसर, जिन्होंने पहचान सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बात की, उन्‍होंने भी माना कि IITs हमेशा फैकल्टी चयन में बेहद सख्त रहे हैं. उनका कहना था कि संस्थान किसी भी कीमत पर गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहते. कई बार पद खाली छोड़ना बेहतर माना जाता है, बजाय ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति करने के जो संस्थान की अपेक्षाओं पर खरा न उतरे. 

प्रोफेसर के अनुसार, देश में पीएचडी करने वालों की संख्या अभी भी सीमित है. वहीं निजी क्षेत्र कई मामलों में सरकारी संस्थानों की तुलना में अधिक आकर्षक वेतन पैकेज देता है. इससे भी IITs के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करना कठिन हो जाता है. 

क्या टेन्योर-ट्रैक सिस्टम हो सकता है समाधान?

उन्होंने सुझाव दिया कि अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों की तरह IITs में भी टेन्योर-ट्रैक प्रणाली पर विचार किया जा सकता है. इसके तहत शिक्षकों की शुरुआती नियुक्ति पांच वर्ष के अनुबंध पर हो और प्रदर्शन के आधार पर बाद में उन्हें स्थायी किया जाए. इससे भर्ती प्रक्रिया अधिक लचीली हो सकती है, जबकि गुणवत्ता भी बनी रहेगी. 

प्रोफेसर ने कहा कि अतिथि (Guest) या एड-हॉक फैकल्टी तत्काल जरूरत पूरी कर सकते हैं, लेकिन वे दीर्घकालिक शिक्षण और शोध का विकल्प नहीं हैं. IITs की वैश्विक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए मजबूत और स्थायी फैकल्टी आधार आवश्यक है. 

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