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उम्र खेलने की, इरादे IIT के! हिंदी मीडियम से यूपी के 'वंडर किड' ने 14 की उम्र में क्रैक किया JEE Advanced

Success Story : युवराज का सफर अनोखा है क्योंकि यह हर बच्चे के साथ नहीं हो सकता. इससे मिलने वाली असली सीख यह है कि माता-पिता को अपने बच्चे के अंदर छुपी स्वाभाविक प्रतिभा को पहचानना चाहिए. बच्चों की तुलना दूसरों से करने के बजाय, इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चे को किस चीज में इंट्रेस्ट है, वह किस तरह से चीजों को सीखता है और उसकी ताकत क्या है.

उम्र खेलने की, इरादे IIT के! हिंदी मीडियम से यूपी के 'वंडर किड' ने 14 की उम्र में क्रैक किया JEE Advanced
अगर आपके पास पक्का इरादा, अनुशासन और सही मार्गदर्शन है, तो आप अपनी मातृभाषा में पढ़कर भी देश की सबसे बड़ी परीक्षा के शिखर पर पहुंच सकते हैं.

Success Story : आमतौर पर 8 या 9 क्लास में पढ़ने वाले बच्चों की सबसे बड़ी चिंता क्या होती है? यही कि स्कूल के एग्जाम में अच्छे नंबर कैसे लाए जाएं. लेकिन उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के चौरी-चौरा इलाके से आने वाले एक बच्चे के सपने सामान्य बच्चों से बिल्कुल अलग थे. जब उनकी उम्र के बच्चे स्कूल की परीक्षाओं की तैयारी में बिजी थे, तब वह देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा JEE Advanced की तैयारी कर रहे थे.

 दरअसल हम बात कर रहे हैं युवराज सिंह सोलंकी की. युवराज ने महज 14 साल की उम्र में 'JEE Advanced' को न सिर्फ पास किया, बल्कि कैटेगरी रैंक में 1640वीं रैंक भी हासिल करके सबको हैरान कर दिया है. उनकी इस असाधारण कामयाबी के बाद लोग उनकी तुलना वैभव सूर्यवंशी से कर रहे हैं. लोग उन्हें "IIT-JEE की दुनिया का वैभव सूर्यवंशी" कहकर बुला रहे हैं. भले ही इन दोनों बच्चों की फिल्ड पूरी तरह अलग हैं, लेकिन दोनों की उपलब्धि आसाधारण है. दोनों को देखकर यह समझ आता है प्रतिभा कभी उम्र की मोहताज नहीं होती.

इतनी कम उम्र में कैसे मुमकिन हुआ JEE Advanced देना?

आमतौर पर इंडिया में स्टूडेंट्स 17 या 18 साल की उम्र में 12वीं पास करके JEE की परीक्षा देते हैं. ऐसे में फिर 14 साल की उम्र में युवराज ने ये कैसे किया. इस खबर को सुनने के बाद एक स्वाभाविक सवाल किसी के मन में उठ सकता है कि 14 साल का कोई बच्चा आखिर इस परीक्षा में बैठने के योग्य कैसे हो गया? 

इसका जवाब युवराज स्कूली शिक्षा में छिपा है. दरअसल,  युवराज बचपन से ही पढ़ने-लिखने में बहुत तेज थे. उनकी इस असाधारण  क्षमता और सीखने की रफ्तार को उनके स्कूल टीचर्स ने बहुत जल्दी पहचान लिया था. 

ऐसे में उनके स्कूलों ने युवराज के टैलेंट को देखते हुए उन्हें दो क्लास आगे बढ़ने की स्पेशल परमिशन दी. क्यूंकि उम्र बहुत कम थी, इसलिए उन्हें बड़ी क्लास में दाखिला देने के लिए शिक्षा विभाग से जरूरी प्रशासनिक और कानूनी मंजूरी भी ली गई. इसका रिजल्ट यह हुआ कि जब उनकी उम्र के बाकी बच्चे मिडिल स्कूल में ही अटके थे, तब युवराज 12वीं क्लास में पहुंच चुके थे. उनके क्लासरूम में उनके साथ बैठने वाले बाकी क्लासमेंट की उम्र 17 या 18 साल थी. 

 टैलेंट की कोई भाषा नहीं होती

युवराज के इस सफर का सबसे मोटिवेशनल पहलू सिर्फ उनकी कम उम्र नहीं है, बल्कि उनका पढ़ाई का माध्यम है. उन्होंने इस कठिन परीक्षा की तैयारी किसी बड़े इंग्लिश-मीडियम स्कूल से नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक ऑनलाइन हिंदी-मीडियम बैच के जरिए की.

पिछले कई दशकों से भारतीय समाज और परिवारों में यह धारणा घर कर चुकी थी कि अगर JEE Advanced जैसी परीक्षा पास करनी है, तो बच्चे को कोटा, दिल्ली या हैदराबाद जैसे बड़े कोचिंग हब में भेजना ही होगा. लोगों का मानना था कि इसके लिए अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ होना और महंगे क्लासरूम प्रोग्राम पर लाखों रुपये खर्च करना बेहद जरूरी है. लेकिन युवराज की सफलता ने इस पुरानी सोच की दीवारों को ढहा दिया है. युवराज ने हिंदी माध्यम से तैयारी कर रहे देश के लाखों छात्रों को एक बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है कि भाषा कभी भी आपके सपनों की उड़ान में रुकावट नहीं बन सकती.

अगर आपके पास पक्का इरादा, अनुशासन और सही मार्गदर्शन है, तो आप अपनी मातृभाषा में पढ़कर भी देश की सबसे बड़ी परीक्षा के शिखर पर पहुंच सकते हैं.

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