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बिना हाथों के जन्मे, इंटरव्यू में बार-बार रिजेक्ट हुए, फिर मिली एक नौकरी और बदल गई जिंदगी

Disability Success Story: अगर मन में जज्बा हो, तो दिव्यांगता भी आपके सपनों की राह नहीं रोक सकती. इसका ताजा उदाहरण योगेश्वरन हैं, जिन्होंने मुश्किलों को मात देकर साबित कर दिया कि हौसला, मेहनत और आत्मविश्वास से हर मंजिल हासिल की जा सकती है.

बिना हाथों के जन्मे, इंटरव्यू में बार-बार रिजेक्ट हुए, फिर मिली एक नौकरी और बदल गई जिंदगी
योगेश्वरन का जन्म हाथों के बिना हुआ था.

Disability Success Story : आज के कंपिटेटिव दौर में नौकरी पाना आसान नहीं है. अच्छी पढ़ाई और अनुभव रखने वाले लोग भी कई बार महीनों तक नौकरी की तलाश करते रहते हैं. ऐसे में अगर कोई जन्म से दिव्यांग हो, तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं. मलेशिया के 34 वर्षीय योगेश्वरन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. जन्म से उनके दोनों हाथ नहीं थे और इसी वजह से उन्हें नौकरी की तलाश में कई बार निराशा का सामना करना पड़ा. कई इंटरव्यू देने के बाद भी मौका नहीं मिला. कई बार लोगों ने उनकी बात सुनने से पहले ही उन्हें खारिज कर दिया. लेकिन एक कंपनी ने उन पर भरोसा जताया और वही भरोसा उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया. आज योगेश्वरन नौकरी कर रहे हैं, परिवार की मदद कर रहे हैं और अपने दम पर घर भी खरीद चुके हैं.

नौकरी की तलाश में बार-बार मिली निराशा

योगेश्वरन का जन्म हाथों के बिना हुआ था. उनकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हो पाई, लेकिन उनके माता-पिता ने यह सुनिश्चित किया कि वे पढ़ना-लिखना सीखें और लोगों से बेहतर तरीके से बातचीत कर सकें. इसके बाद जब उन्होंने नौकरी की तलाश शुरू की तो रास्ता आसान नहीं था. वे कई इंटरव्यू में शामिल हुए, लेकिन ज्यादातर जगहों पर उन्हें मौका नहीं मिला. एक समय ऐसा भी आया जब लगातार रिजेक्शन मिलने के बाद उन्होंने उम्मीद करना लगभग छोड़ दिया था.

एक मुलाकात ने बदल दी तस्वीर

साल 2019 में एक कार्यक्रम के दौरान उनकी मुलाकात एक शिपिंग कंपनी के सीईओ आर. जेयेंदरन से हुई. बातचीत के दौरान जेयेंदरन ने योगेश्वरन की कमी नहीं, बल्कि उनकी क्षमता को देखा. कुछ समय बाद उन्हें कंपनी आने के लिए कहा गया और फिर नौकरी का ऑफर मिला. शुरुआत में उन्हें 1500 रिंगिट मंथली सैलरी और आने-जाने के लिए अलग से ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया गया. योगेश्वरन कहते हैं कि नौकरी से ज्यादा महत्वपूर्ण वह भरोसा था, जो कंपनी ने उन पर जताया. नौकरी मिलने से सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति नहीं बदली, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी वापस लौटा. सालों बाद उन्हें लगा कि कोई उन पर भरोसा कर रहा है.

आज नौकरी भी है, अपना घर भी

फ्री मलेशिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल योगेश्वरन कंपनी में रिसेप्शन से जुड़े काम संभालते हैं. वे फोन कॉल्स अटेंड करते हैं, आने वाले लोगों का स्वागत करते हैं और जरूरी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. अब वे अपना खर्च खुद उठाते हैं और परिवार की आर्थिक मदद भी करते हैं. यही नहीं, उन्होंने अपने दम पर दो मंजिला घर भी खरीदा है. योगेश्वरन के लिए यह सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि उन सालों की मेहनत और संघर्ष का परिणाम है.

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कंपनी में और भी हैं ऐसे कर्मचारी

योगेश्वरन अकेले ऐसे कर्मचारी नहीं हैं. उसी कंपनी में एस. कुहान नाम के एक अन्य कर्मचारी भी काम करते हैं, जिन्हें दाएं हाथ और पैर से जुड़ी शारीरिक दिक्कत है. इसके बावजूद वे अपने काम की जिम्मेदारियां अच्छी तरह निभा रहे हैं. कंपनी के सीईओ जेयेंदरन का मानना है कि दिव्यांग लोगों को अक्सर उनकी क्षमता के बजाय उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर आंका जाता है. उनका कहना है कि सही मौका और सहयोग मिले तो वे भी किसी दूसरे कर्मचारी की तरह अच्छा काम कर सकते हैं.

योगेश्वरन की कहानी किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि एक अवसर की कहानी है. सालों तक बंद दरवाजों के बाद जब एक दरवाजा खुला, तो उन्होंने साबित कर दिया कि मौका मिलने पर क्षमता खुद अपनी पहचान बना लेती है.

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