यह ख़बर 22 जून, 2011 को प्रकाशित हुई थी

सिंगूर भूमि विधेयक को निरस्त करने की मांग

खास बातें

  • टाटा मोटर्स ने बुधवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय में सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास विधेयक, 2011 को रद्द करने की अपील की।
कोलकाता:

टाटा मोटर्स ने बुधवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय में सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास विधेयक, 2011 को रद्द करने की अपील की। इस विधेयक ने कम्पनी को वाम मोर्चा की सरकार द्वारा आवंटित 997.17 एकड़ भूमि को निरस्त कर दिया है। न्यायाधीश सौमित्र पाल के समक्ष दायर एक याचिका में ऑटोमोबाइल कम्पनी ने विधेयक की क्रियाशीलता पर स्थगन आदेश जारी करने की मांग की है। इसके अलावा याचिका में हुगली जिले के सिंगूर स्थित कम्पनी के परिसर में यथास्थिति कायम रखने की मांग की गई है। न्यायाधीश के समक्ष दायर 552 पृष्ठों की याचिका में वकील समरादित्य पाल ने भूमि को कब्जे में लेने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का अनुरोध किया। ज्ञात हो कि विपक्ष के वाम मोर्चे के विधायकों द्वारा बहिष्कार करने के बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा ने गत 14 जून को विधेयक पारित किया। तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों से पहले सिंगूर के किसानों से किए गए अपने वादों को पूरा करने के लिए इस विधेयक को पारित कराया। चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस ने किसानों से वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर वाम मोर्चे की सरकार द्वारा कथित रूप से उनकी इच्छा के खिलाफ अधिग्रहीत की गई 400 एकड़ भूमि उन्हें लौटा देगी। टाटा मोटर्स द्वारा यहां कार का संयंत्र लगाने के लिए वाम मोर्चा सरकार ने भूमि का अधिग्रहण किया लेकिन अधिग्रहण को लेकर हुई हिंसा के चलते टाटा मोटर्स ने यहां अपनी परियोजना पर काम रोक दिया। अधिनियम को चुनौती देते हुए पाल ने कहा कि कानून के रूप में यह ठीक नहीं है और उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार ने इसे अधिसूचित किया है लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया है। उन्होंने दावा किया कि उत्तराखण्ड में यहां से अधिक सुविधाओं की पेशकश मिलने के बावजूद कम्पनी ने सिंगूर में छोटे कार संयंत्र को स्थापित करने का फैसला लिया है। वहीं, राज्य सरकार का पक्ष रखने वाले वकीलों कल्याण बनर्जी एवं अशोक बंदोपाध्याय ने जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा। न्यायालय से बाहर पत्रकारों से बातचीत में बनर्जी ने दावा किया कि सभी कानूनी परिणामों पर विचार करने के बाद कानून को अधिनियमित किया गया है। न्यायाधीश पाल ने इसके पहले सरकार का जवाब जाने बगैर कम्पनी को राहत देने से इनकार कर दिया।


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