यह ख़बर 29 मई, 2011 को प्रकाशित हुई थी

लंबी अवधि में बाजार में रहेगा मजबूती का रुख

खास बातें

  • विशेषज्ञों की राय है कि भारतीय शेयर बाजार में मौजूदा गिरावट एक अस्थायी दौर है और दीर्घावधि में बाजार का रुख अब भी मजबूत है।
New Delhi:

विशेषज्ञों की राय है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, ऊंची मुद्रास्फीति और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार में मौजूदा गिरावट एक अस्थायी दौर है और दीर्घावधि में बाजार का रुख अब भी मजबूत है। इस साल की शुरुआत से अभी तक बंबई शेयर बाजार में 11 प्रतिशत की गिरावट आई है। 10 जनवरी, 2008 को सेंसेक्स ने 21,206.77 अंक की अब तक की सर्वोच्च ऊंचाई को छुआ, तब से सेंसेक्स 13.86 फीसदी नीचे आ चुका है। 28 मई को समाप्त सप्ताह में सेंसेक्स 59.99 अंक अथवा 0.33 प्रतिशत की गिरावट के साथ 18,266.10 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 10.25 अंक अथवा 0.19 प्रतिशत की गिरावट के साथ 5,476.10 अंक पर बंद हुआ। आशिका स्टॉक ब्रोकिंग के इक्विटी शोध प्रमुख पारस बोथरा ने कहा कि भारतीय शेयर न तो ज्यादा सस्ता, न खर्चीला है। इसकी स्थिति ज्यों की त्यों है। हाल में वैश्विक मंदी का इस पर जो असर हुआ है, उससे कुछ चुनौती खड़ी हुई है और इसमें उन लोगों को परेशानी हुई है, जो एक साल से आगे का कयास नहीं लगा सकते हैं। इसी तरह की राय जाहिर करते हुए प्रोग्रेसिव फाइनेंशियल वेंचर्स के संस्थापक और अध्यक्ष अभिनव द्विवेदी ने कहा, भारत में विकास की जबर्दस्त संभावना है, जिससे कंपनियों के आधार काफी सुदृढ़ हैं और आधारभूत ढांचों की स्थिति काफी सुधरी हुई है। इसके दीर्घावधिक परिप्रेक्ष्य में तेजड़िया धारणा छुपी हुई है। शेयर बाजार की गिरावट के साथ-साथ इस वर्ष विदेशी संस्थागत निवेशकों के पूंजी निवेश में भारी गिरावट आई है। इस वर्ष अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशक शुद्ध बिकवाल रहे हैं। एफआईआई ने 2,274.10 करोड़ रुपये के शेयरों की बिक्री की है। बाजार नियामक सेबी की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय पूंजी बाजार में रिकॉर्ड मात्रा में निवेश किया था। 2010 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 10 लाख करोड़ रुपये के शेयर और बांड खरीदे थे, जो किसी एक वर्ष का रिकॉर्ड है। लेकिन बाजार पर्यवेक्षकों का मानना है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली स्थायी चीज नहीं है। गिरावट के समय शेयरों की बिकवाली आम बात है। बोथरा ने कहा, शेयर बाजार की स्वाभावित प्रकृति के कारण एफआईआई का अंत:प्रवाह साधारण से कमजोर रहने की संभावना है, क्योंकि ऊंची ब्याज दरों के कारण संपन्न वर्ग की धारणा प्रतिकूल है। इससे भी आगे हालिया राजनीतिक एवं निगमित कंपनियों के उठापटक ने एफआईआई पूंजी अंत:प्रवाह को बाधित किया है। उन्होंने कहा कि अधिक ब्याज दर वाली व्यवस्था के साथ भारतीय शेयर बाजार आने वाले दिनों में उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरेगा। निगमित कंपनियों को मार्जिन का दबाव महसूस होगा और इससे आगामी तिमाहियों में उनकी आय प्रभावित होने की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। मुद्रास्फीतिकारी दबावों, ऊंची ब्याज दर की व्यवस्था, कच्चे तेल मूल्य की अधिक कीमतें और कम आय अर्जन के कारण बैंकिंग, पूंजी माल, तेल रिफाइनरियों, सीमेंट और ढांचागत कंपनियों के शेयर दबाव में रहेंगे।


Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com