यह ख़बर 27 नवंबर, 2011 को प्रकाशित हुई थी

भारत पर भी मंडरा रहे हैं आर्थिक संकट के बादल

खास बातें

  • अमेरिका और यूरोजोन सहित दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छाई अनिश्चितता के कारण भारत पर भी आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
New Delhi:

अमेरिका और यूरोजोन सहित दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छाई अनिश्चितता के कारण भारत पर भी आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे हैं। चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही के आर्थिक वृद्धि के आंकड़े पिछले साल की तुलना में नीचे आए हैं। इंडियन पॉलीटिकल इकॉनामी एसोसियेशन और वरिष्ठ अर्थशात्रियों के पैनल द्वारा तैयार सर्वे में भारत में आर्थिक वृद्धि और विकास के अंतर्विरोधों के बारे में बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2009-10 की विकास दर 8.0 प्रतिशत थी, जिसके मुकाबले 2010-11 में विकास दर 8.6 प्रतिशत तक तेज हुई। लेकिन इस वर्ष तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि 2010-11 के मुकाबले 2011-12 में वृद्धि में कमी आ रही है। इस वर्ष अप्रैल से जुलाई की जीडीपी वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 8.8 प्रतिशत रही थी। कमलनयन काबरा, अरुण कुमार त्रिपाठी और जया मेहता जैसे अर्थशास्त्रियों के इस पैनल का मानना है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं, विशेषकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई है। जापानी अर्थव्यवस्था भी सुनामी से हुए प्राकृतिक विनाश के कारण नुकसान से जूझ रही है। वहीं यूरोजोन के यूनान, स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड और इटली जैसे देशों में मंदी की मार है। वैश्विक मंदी के बाद भारत चीन और कुछ अन्य उभरती अर्थव्यस्थाओं ने तेजी तो दिखाई पर मौजूदा वैश्विक मंदी के कारण इन अर्थव्यव्स्थाओं पर भी मंदी के बादल मंडरा रहे हैं। इसका कारण साफ है कि इनकी तरक्की तो विकसित देशों को होने वाले निर्यात पर निर्भर करती है। यह असर 2011-12 में और ज्यादा मजबूत होने वाला है, जिसके चलते भारत और अन्य उभरती अर्थव्यस्थाओं में मंदी आना निश्चित ही है। सर्वे में बताया गया है कि 2010-11 के आर्थिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों का हिस्सा मात्र 14.2 प्रतिशत ही है, जबकि इस क्षेत्र में अभी भी देश की श्रम शक्ति का 58 प्रतिशत हिस्सा लगा हुआ है। सर्वे में एनएसएसओ रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि आज भी देश के 48.6 प्रतिशत किसान कर्जदार हैं। सबसे ज्यादा कर्ज का फैलाव आंध्र प्रदेश में है, जहां 82 प्रतिशत किसान परिवार कर्ज के बोझ में हैं। यदि व्यापार घाटे की बात की जाए तो यह 1991 की तुलना में 25 से 30 गुना तक बढ़ गया है। 2010 के मार्च से 2011 मई मध्य तक व्यापार घाटा 5 लाख 90 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें दिलचस्प है कि चालू खाते में भी 2010-11 में पहली छमाही में 1,28,569 करोड़ का घाटा रहा, जिसके साल के अंत तक 2,50,000 करोड़ तक पहुंच जाने का अनुमान है। अर्थशास्त्रियों के इस पैनल ने कहा है कि 2011-12 वित्तीय वर्ष में भी उद्योग क्षेत्र में विकास में गतिहीनता की स्थिति और भी गंभीर हो गई है। सितंबर 2011 में उद्योग क्षेत्र की वृद्धि मात्र 1.9 प्रतिशत दर्ज की गई, जोकि पिछले एक साल में न्यूनतम है। इसके पीछे कोयला और पूंजीगत सामान के उत्पादन और मांग में आई गिरावट मुख्य वजह रही है।


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