खास बातें
- ऊंची मुद्रास्फीति, बढ़ती ब्याज दर और यूरो क्षेत्र के गहराते ऋण संकट से उपजे अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल ने वर्ष 2011 में पूंजी बाजार का खेल बिगाड़ा।
मुंबई: ऊंची मुद्रास्फीति, बढ़ती ब्याज दर और यूरो क्षेत्र के गहराते ऋण संकट से उपजे अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल ने वर्ष 2011 में समूचे पूंजी बाजार का खेल बिगाड़ दिया। देश के शेयर बाजारों में लगातार गिरावट से वर्ष के दौरान निवेशकों को 20 लाख करोड़ रुपये की पूंजी का नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि, इससे पहले दो साल में भारतीय शेयर बाजारों ने निवेशकों को अच्छी कमाई दिलाई लेकिन इस साल चौतरफा आर्थिक मंदी और महंगाई से कारोबारी धारणा दबी रही। रुपये ने भी निवेशकों को झटका दिया। छोटे निवेशक ऊंचे दाम पर शेयर लेकर फंसे रहे। रिलायंस, स्टेट बैंक और कोल इंडिया जैसे शेयरों ने भी निवेशकों को नुकसान पहुंचाया। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 53.54 रुपये प्रति डॉलर के ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर तक गिर गया जिससे देश का आयात महंगा हो गया। बंबई स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक इस साल करीब 26 फीसद नीचे आ गए। बंबई स्टॉक एक्सचेंज का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स गत 20 दिसंबर को एक साल पहले की तुलना में 5,334.01 अंक यानी 26 फीसद गिरकर 15,175.08 अंक रह गया जबकि पिछले साल के आखिर में सेंसेक्स 20,509.09 के स्तर पर था। इसी तरह निफ्टी पिछले साल के मुकाबले 1,590.30 अंक यानी 25.92 फीसद गिरकर 4,544.20 अंक रह गया। हालांकि, इसके बाद बाजार में थोड़ा सुधार हुआ और मंगलवार को सेंसेक्स 15,873.95 अंक और निफ्टी 4,750.50 अंक पर बंद हुआ। विशेषज्ञों ने कहा कि निवेशक भारत के मामले में सतर्क हैं। वैश्विक स्तर पर गहराते यूरोपीय ऋण संकट और अमेरिका की साख घटने से आर्थिक वृद्धि का रुख प्रभावित हुआ।