नई दिल्ली:
दिल्ली सरकार ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट से कहा कि निजी बिजली वितरण कंपनियों के बहीलेखा का ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से कराना जरूरी है, ताकि उनके खातों में असंगतता और धोखाधड़ी के आरोप स्पष्ट हो सकें, जिनके कारण राजधानी में बिजली की दरें प्रभावित हो रही हैं।
दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने अदालत को बताया कि वे बिजली वितरण करने वाली तीन कंपनियों का वित्त वर्ष 2007 से ऑडिट करवाना चाहते हैं और सरकार की मंशा नियमित ऑडिट की नहीं है।
उन्होंने कहा, "हम बिजली वितरण कंपनियों का नियमित या दिनवार ऑडिट नहीं कराना चाहते। हम उन्हें हमेशा के लिए सीएजी के अधीन भी नहीं लाना चाहते, बल्कि हम सिर्फ 2007 से उनका ऑडिट करवाना चाहते हैं। यह ऑडिट जनहित के लिए होना चाहिए।"
धवन ने यह भी कहा कि कंपनियों का सीएजी से ऑडिट करवाने का विचार आम आदमी पार्टी (आप) की देन नहीं है। वास्तव में इसी मुद्दे पर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार कंपनियों का यदा-कदा सीएजी से ऑडिट कराने के पक्ष में थी।
धवन की दलील सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी और न्यायाधीश आरएस एंडलॉ की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 2 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी। राष्ट्रीय राजधानी में बिजली आपूर्ति करने वाली टाटा पॉवर दिल्ली डिस्ट्रिब्यूशन लिमिटेड, बीएसईएस राजधानी और बीएसईएस यमुना द्वारा 'आप' सरकार के कंपनियों का खाता ऑडिट करने के फैसले के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई की।
पिछले वर्ष 7 जनवरी को दिल्ली सरकार ने कंपनियों का सीएजी से ऑडिट करने के आदेश दिए थे, जिसके बाद कंपनियों ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी।