कुछ आवाजें सिर्फ सुर नहीं होतीं, संगीत की धड़कन होती हैं. आशा भोसले का जाना उस लड़ी का टूट जाना है, जिसने हर उम्र को संगीत के स्वर्ण युग से जोड़े रखा. ऐसे में मन ये टीस उठना लाजिमी है कि - क्या होता, अगर संगीत में 'आशा' न होती? तब शायद भारतीय सिनेमा और हमारा जीवन, दोनों कम रंगीन होते, ज्यादा फीके होते. संगीत का मस्ती वाला हिस्सा बेनूर होता और मन के कुछ पन्ने खाली रह जाते. भारतीय सिनेमा में लता मंगेशकर की आवाज बेशक संगीत की मर्यादा और पवित्रता का पैमाना है, लेकिन आशा भोसले की आवाज न होती तो जिस शोखी, शरारत, विद्रोह और बिंदास अंदाज की कमी उस पैमाने में थी, उसकी भरपाई कैसे होती?
आशा भोसले का रोना भी सुरों का हिस्सा
1966 में आई फिल्म 'तीसरी मंजिल' का ‘आजा आजा, मैं हूं प्यार तेरा' याद कीजिए. आशा जी की आवाज ने इसमें जो कशिश भरी, कोई और आवाज क्या ये कमाल दिखा सकती थी? या फिर फिल्म 'कारवां' (1971) का वो कैबरे सॉन्ग– ‘पिया तू अब तो आजा' ही देख लीजिए. इस गीत में आशा जी की सांसों की लय, संगीत का हिस्सा बन गई. अगर आशा जी न होती, तो शायद संगीत कुछ और होता, क्योंकि सांस लेना, फुसफुसाना, हंसना और यहां तक कि रोना भी सुरों का हिस्सा है, ये भी तो आशाजी ने ही बताया.
ओपी नैयर के साथ जादुई गीत
आशा जी की आवाज में वो कशिश थी, जो एक साथ खुरदरी भी थी, और मखमली भी. इसकी तासीर पहचानी संगीतकार ओपी नैयर ने. अगर ओपी नैयर अपने फन में चूकते, तो 'हावड़ा ब्रिज' (1958) का जादुई गीत ‘आइये मेहरबां, बैठिये जाने-जां' आज हमारी यादों का हिस्सा न होता. ये वो दौर था जब आशा अपनी आवाज की दिलकशी से महिला किरदारों की रोमांटिक हसरतों को आवाज दे रही थीं. इनमें अदाएं थीं, शोखी थी और लुभाने वाली वो फीलिंग थी, जिसे तब भारतीय फिल्म संगीत में करीब-करीब वर्जित माना जाता था. यानी आशाजी का टोन, वक्त के हिसाब से बहुत आगे था. शायद यही वो वजह है कि आज के युवा भी आपको ‘मोनिका ओ माई डार्लिंग‘ गाते-गुनगुनाते मिल जाएंगे.
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पंचम दा ने दी तेज रफ्तार
अगर आशाजी न होतीं, तो वेस्टर्न फ्यूजन को वो 'पिच' न मिलती, जिसके लिए दुनिया सी रामचंद्र और आरडी बर्मन यानी पंचम दा की मुरीद है. किसी डिस्को में जाकर देखिए, थोड़े वैरिएशन्स के साथ ही सही, आज भी – ‘ईना मीना डीका' पर थिरकते युवाओं के दीदार हो जाएंगे. सी रामचंद्र ने भारतीय संगीत का जिस फ्यूजन से परिचय कराया, पंचम दा ने उसे वक्त के हिसाब से थोड़ा और तेज रफ्तार दी. और पंचम दा के साथ आशाजी की जुगलबंदी ने संगीत को 'हिप' और 'मॉडर्न' बना दिया. 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1972) का ‘दम मारो दम' सिर्फ गाना नहीं है, ये आज भी युवाओं की आजादी का मैनिफेस्टो है.
उमराव जान का शानदार गीत
हालांकि आशा जी का दायरा सिर्फ क्लब सांग्स या चुलबुले गाने तक नहीं है. मिसाल है 1981 में आई फिल्म 'उमराव जान' का गीत ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिये'. इसमें आशाजी की आवाज में सदियों की वही प्यास है, जो उम्र के खास पड़ाव पर हर दिल महसूस करता है. उसे खुद से जोड़ता है.
हर सुनने वाले की आंखें नम
रोमांस के जितने रंग आशा जी ने अपनी आवाज से दिखाए, वह किसी और के बस की बात नहीं थी. जब 'यादों की बारात' (1973) में वो गिटार की धुन पर गुनगुनाती हैं, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को', तो आज भी हर प्रेमी का दिल धड़क उठता है. और जब वह 'इजाजत' (1987) में- ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' गाती हैं, तो हर सुनने वाले की आंखें नम हो जाती हैं. और जब वो 'वक्त' (1965) में गाती हैं,‘आगे भी जाने न तू', तो जीवन का दर्शन भी बताती हैं.
आशा ताई न होतीं, तो रहमान रहमान न होते
90 के दशक में जब संगीत बदल रहा था, तब 62 साल की उम्र में आशाजी ने 'रंगीला' (1995) के लिए ‘तन्हा तन्हा यहां पे जीना' गाकर सबको चौंका दिया. 21 साल की उर्मिला मातोंडकर के लिए उनकी आवाज उतनी ही ताजा लगी जितनी 50 के दशक की नायिकाओं के लिए थी. अगर आशा ताई न होतीं, तो रहमान रहमान न होते. उनके 'साउंड एक्सपेरिमेंट्स' शायद कभी पूरे न होते.
भारतीय संगीत की विकास यात्रा
92 साल, ये सिर्फ आशाजी की जीवन यात्रा नहीं है, भारतीय संगीत की विकास यात्रा है. 20 भाषाओं में 12 हजार से अधिक गीत एक ऐसी विरासत हैं, जिनमें सबका कुछ न कुछ हिस्सा है. इस हिस्से की तलाश तभी खत्म होगी, जब दिल धड़कना भूल जाएंगे. क़तरा क़तरा जीने की आदत छूट जाएगी.
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