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मतलबी दुनिया से रूबरू करता है साहिर लुधियानवी का 69 साल पुराना गाना, मोहम्मद रफी की आवाज ने सिखाया जीवन का सबक

69 में एक फिल्म आई थी जिसमें गुरुदत्त पर एक गाना फिल्माया गया था. इस गाने में मतलबी दुनिया की सच्चाई को पेश किया गया था. इसके बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और इसे मोहम्मद रफी ने गाया था. ये गाना आज भी कल्ट क्लासिक माना जाता है.

मतलबी दुनिया से रूबरू करता है साहिर  लुधियानवी का 69 साल पुराना गाना, मोहम्मद रफी की आवाज ने सिखाया जीवन का सबक
स्वार्थी समाज पर कटाक्ष करता है गुरुदत्त का 69 साल पुराना गाना, मतलबी दुनिया की दिखाता है सच्चाई
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नई दिल्ली:

प्यासा को गुरु दत्त की क्लट फिल्मों में एक मानी जाती है. इस फिल्म को उन्होंने डायरेक्ट किया और उन्होंने इसमें एक्टिंग भी की. यह फिल्म 1957 में आई थी.  फिल्म विजय नाम का संघर्षरत कवि की कहानी है जो स्वतंत्र भारत में अपने कार्य को प्रकाशित करना चाहता है. फिल्म का संगीत एसडी बर्मन ने दिया है. प्यासा देश ही नहीं विश्व की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिनी जाती है.  गुरु दत्त एक ऐसे फिल्म-मेकर थे, जिन्होंने 'प्यासा', 'कागज के फूल' और 'साहिब बीबी और गुलाम' जैसी कालजयी फिल्में बनाई, जबकि उस दौरान वह निजी उथल-पुथल और मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे थे. उनके बेचैन और चंचल मन में रचनात्मकता और संघर्ष साथ-साथ चलते थे. उनकी अजीब सी दुविधा थी, फैसला न कर पाने की आदत. उ

नकी शानदार सफलताओं के बीच भी दुविधा की एक खामोश धारा बहती रहती थी. 'बाजी', 'प्यासा' या 'साहिब बीबी और गुलाम' जैसी फिल्मों के साथ-साथ ऐसी फिल्में भी थीं जो बहुत उम्मीद के साथ शुरू हुईं, कुछ तो बड़े बजट की थीं, जिनकी शूटिंग भी हुई, लेकिन बाद में वह पूरी नहीं हुईं. हालांकि आज हम प्यासा के उस गाने के बारे में बताने जा रहे हैं , जो आज भी खूब पसंद की जाती है. 

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जब  गुरु दत्त  ने 'प्यासा' बनाई, तब तक उनकी दुविधा कई गुना बढ़ चुकी थी. वे शूटिंग करते ही रहते थे और उन्हें पक्का नहीं पता होता था कि किसी खास सीन में उन्हें असल में क्या चाहिए. खुद अपने लिए भी, 'प्यासा' के मशहूर क्लाइमैक्स सीन के लिए उन्होंने 104 टेक लिए! 1957 में रिलीज हुई उनकी बेहतरीन फिल्म 'प्यासा' एक बड़ी खोज थी. फिल्म का गाना 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है' फिल्म रिलीज के बाद काफी हिट हुआ, जिसे महान कवि साहिर लुधियानवी ने लिखा. एस.डी. बर्मन ने संगीतबद्ध किया है और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी. यह गाना उस मतलबी और स्वार्थी समाज पर करारा कटाक्ष करता है जो केवल धन, शोहरत और दिखावे को महत्व देता है और मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करता है. इसमें बताया गया है कि इस दुनिया में इंसान, उसकी वफादारी, दोस्ती और प्यार की कोई कीमत नहीं बची है. गाना यह संदेश देता है कि यदि पूरी दुनिया की दौलत और तारीफें मिल भी जाए और बदले में अपनी आत्मा और सच्चाई का सौदा करना पड़े, तो ऐसी दुनिया का कोई मोल नहीं है.  

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प्यासा फिल्म के बारे में 

विजय (गुरु दत्त) एक असफल कवि है जो जिसका कार्य प्रकाशक या उसके भाई (जो उसकी कविताओं को बेकार के कागजों में बेचते हैं) गम्भीरता से नहीं लेते. वह निकम्मा होने के ताने ना सुनने के लिए घर से बाहर रहता है और गली-गली मारा-मारा घुमता है. उसे गुलाबो (वहीदा रहमान) नाम की एक अच्छे दिल की वैश्या मिलती है जो उसकी कविताओं से अनुरक्त है और उससे प्रेम करने लग जाती है. उसकी मुलाकात उसकी कॉलेज की पूर्व प्रेमिका मीना (माला सिन्हा) से होती है और उसे पता चलता है कि उसने एक पैसे वाले बड़े प्रकाशक मिस्टर घोष (रहमान) के साथ विवाह की है. घोष उसे अपनी पत्नी मीना के बारे में अधिक जानने के लिए नौकरी पर रख लेता है.

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