विजय की आखिरी फिल्म जन नायकन, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) से क्लियरेंस न मिलने के कारण रिलीज को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रही है. इस विवाद के बीच सोशल मीडिया पर इस विषय पर बहस छिड़ी हुई है. अब, फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने फिल्मों में सेंसरशिप की भूमिका पर सवाल उठाया है. सेंसरशिप के कॉन्सेप्ट को मौजूदा समय के लिए पुराना बताते हुए, RGV ने कहा कि सेंसरशिप को आलस की वजह से बनाए रखा गया है. उन्होंने बताया कि डिजिटल युग में लोग हर तरह के कंटेंट के संपर्क में आते हैं. उन्होंने कहा कि समाज की रक्षा के लिए फिल्मों में किसी सीन, इमेज या शब्द को सेंसर करना एक "मज़ाक" है.
CENSOR BOARD is OUTDATED
— Ram Gopal Varma (@RGVzoomin) January 9, 2026
Not in the context of just @Actor_Vijay ‘s #JanaNayagan ‘s censor issues but in an overall manner, it is truly foolish to think that the censor board is still relevant today
It has long outlived it's purpose, but it's being kept alive out of laziness…
वर्मा ने अपने X पर विजय के समर्थन में लिखा, "सेंसर बोर्ड पुराना हो चुका है. सिर्फ @Actor_Vijay की #JanaNayagan के सेंसर मुद्दों के संदर्भ में नहीं, बल्कि कुल मिलाकर यह सोचना सच में बेवकूफी है कि सेंसर बोर्ड आज भी प्रासंगिक है." उन्होंने आगे कहा, "इसका मकसद बहुत पहले ही खत्म हो चुका है, लेकिन अब इसकी प्रासंगिकता पर बहस करने में आलस के कारण इसे जिंदा रखा गया है और इसके लिए मुख्य रूप से पूरी फिल्म इंडस्ट्री जिम्मेदार है." उन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड के कॉन्सेप्ट को जारी रखने के लिए सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री ही जिम्मेदार है.
"हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां एक 12 साल का बच्चा फोन पर GoPro से फिल्माया गया आतंकवादी का एग्जीक्यूशन देख सकता है, एक 9 साल का बच्चा हार्डकोर पोर्न देख सकता है, एक बोर रिटायर्ड आदमी दुनिया में कहीं से भी बिना किसी रोक-टोक के एल्गोरिदम द्वारा दिखाए गए एक्सट्रीमिस्ट प्रोपेगेंडा देख सकता है. साजिश की थ्योरी में शामिल हो सकता है. यह सब तुरंत गुमनाम रूप से और बिना किसी रोक-टोक के उपलब्ध है. साथ ही समाज के हर वर्ग में हर कोई न्यूज चैनलों से लेकर यूट्यूबर्स और दूसरे ऐप्स तक, गंदी भाषा में बात करता है. अगर आप इस पुरानी मान्यता का हवाला देते हैं कि सिनेमा एक शक्तिशाली माध्यम है, तो इस बात को नजरअंदाज न करें कि सोशल मीडिया की पहुंच सिनेमा से कहीं ज्यादा है और यह राजनीतिक जहर, सांप्रदायिक जहर, चरित्र हनन, बहस के नाम पर लाइव, बिना सेंसर के चिल्लाने वाले झगड़ों से भरा हुआ है.
और इस सच्चाई में माननीय सेंसर बोर्ड का यह मानना कि फिल्म में एक शब्द काटने, एक शॉट ट्रिम करने, या सिगरेट को धुंधला करने से “समाज की रक्षा होगी.” यह एक मजाक है.”
सेंसरशिप दर्शकों का अपमान करती है
राम गोपाल वर्मा ने दावा किया कि बोर्ड उस समय बनाया गया था जब राज्य मीडिया को कंट्रोल करता था. उनके अनुसार, आज कोई यह तय नहीं कर सकता कि लोगों को क्या देखना चाहिए. आज, किसी भी तरह का कंट्रोल असंभव है, क्योंकि अब कोई यह तय नहीं कर सकता कि लोगों को क्या देखना चाहिए या क्या नहीं देखना चाहिए. ऐसे समय में सेंसरशिप एक्सपोजर को नहीं रोकती... यह सिर्फ दर्शकों का अपमान करती है.”
सेंसर बोर्ड अब जो करता है वह असल में सुरक्षा नहीं, बल्कि सिर्फ नाटक है. यह ऑस्कर लायक परफॉर्मेंस में अथॉरिटी की एक रस्म है, जहां कैंची सोच की जगह ले लेती है और नैतिक दिखावा जिम्मेदारी नाम के भेस में घूमता है. वही समाज जो सोशल मीडिया पर ग्राफिक हिंसा को आजादी से स्क्रॉल करता है, अचानक “चिंतित” हो जाता है, जब कोई फिल्ममेकर थिएटर में कुछ दिखाता है. यह पाखंड खतरनाक है.”
वर्मा ने जोर देकर कहा कि फिल्में “कोई क्लासरूम नहीं हैं, जहां सबक सिखाए जाते हैं.” “वे आईना हैं, देखने के नजरिए हैं, भावनाएं और राय हैं जो मनोरंजन के लिए हैं.”
जना नायकन विवाद
जना नायकन अभी सर्टिफिकेशन को लेकर मद्रास हाई कोर्ट में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रही है. जस्टिस पीटी आशा ने 9 जनवरी को सेंसर बोर्ड को जना नायकन को क्लियर करने का निर्देश दिया था. बोर्ड द्वारा इसे चुनौती देने के कुछ ही घंटों बाद चीफ जस्टिस एमएम श्रीवास्तव और जी अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच ने पिछले फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी. इस मामले की सुनवाई 21 जनवरी को होनी थी.
जना नायकन कब रिलीज होगी?
फिल्म को शुरू में 9 जनवरी को रिलीज करने की योजना थी, जिसे बाद में 14 जनवरी तक बढ़ा दिया गया. मेकर्स ने अभी तक नई रिलीज डेट की घोषणा नहीं की है.
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