The Kerala Story 2 Review In Hindi: लंबी कानूनी लड़ाई और विवाद के बाद ‘द केरल स्टोरी' रिलीज हो गई है. हालांकि इसे अपनी निर्धारित तारीख 27 फरवरी की सुबह ही सिनेमाघरों में पहुंच जाना चाहिए था, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण दोपहर तक स्टे हटाने का फैसला आया और रात तक फिल्म थिएटर्स में पहुंच सकी. कहीं शाम 7 बजे से शो शुरू हुए तो कहीं रात 8 बजे से. पहले दिन कम टिकट बिक्री का नुकसान निर्माता को उठाना पड़ सकता है, क्योंकि यह सूचना सभी दर्शकों तक समय पर नहीं पहुंच पाई कि फिल्म रिलीज हो चुकी है. जैसा कि आप जानते हैं, ‘द केरल स्टोरी 2' वर्ष 2023 में रिलीज हुई फिल्म ‘द केरल स्टोरी' का सीक्वल है. छोटे बजट की होने के बावजूद पिछली फिल्म ने करीब 300 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया था. अब सबकी नजरें इसके दूसरे भाग पर हैं.
द केरल स्टोरी की कास्ट
फिल्म के निर्माता विपुल अमृतलाल शाह हैं, जिन्होंने पहली फिल्म भी प्रोड्यूस की थी. इस बार निर्देशन की जिम्मेदारी कामाख्या नारायण सिंह ने संभाली है. मुख्य कलाकारों में हैं ऐश्वर्या ओजा, उल्का गुप्ता, अदिति भाटिया, पूर्वा पराग , सुमित गहलावत, अर्जन सिंह , युक्तम और अलका अमीन. कहानी लिखी है विपुल अमृतलाल शाह और अमरनाथ झा ने.
रिलीज से पहले ही फिल्म को लेकर विवाद, चर्चा और सोशल मीडिया पर बहस तेज रही. कुछ लोग इसे प्रोपेगेंडा बता रहे थे, तो कुछ इसे गंभीर सामाजिक मुद्दे पर बनी फिल्म मान रहे थे. ऐसे माहौल में दर्शक एक पूर्वाग्रह के साथ थिएटर में प्रवेश करता है. क्या यह सचमुच प्रोपेगेंडा है या किसी वास्तविक समस्या को ईमानदारी से दिखाने की कोशिश?
द केरल स्टोरी 2 की कहानी और विषय
फिल्म तीन लड़कियों की कहानी पर आधारित है. उनके जीवन में प्रेम, विश्वास और फिर धोखे के जरिए धर्मांतरण की घटनाएं दिखाई गई हैं. ट्रेलर से ही स्पष्ट हो जाता है कि विषय संवेदनशील है. फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह अलग परिवेश से आई हिंदू लड़कियों को मुस्लिम युवकों द्वारा बहला-फुसलाकर पहले शादी और फिर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है. फिल्म देखने के बाद दर्शकों के मत अलग-अलग हो सकते हैं. बतौर सिनेमा यह क्या परोसती है, इसे समझना जरूरी है.
फिल्म की कमियां
1. दृष्टिकोण का प्रभाव – दर्शक अपने नजरिये से फिल्म देखेंगे और सवाल उठा सकते हैं कि यह कितनी राजनीतिक रूप से संतुलित है. कुछ लोगों के लिए यही इसकी कमी हो सकती है. हालांकि, इसे एक कहानी के रूप में देखें तो यह प्रेडिक्टेबल जरूर लगती है, लेकिन कमजोर नहीं.
2. स्क्रीनप्ले की शुरुआत – तीनों लड़कियों की कहानियां क्रमशः सामने आती हैं, जो कुछ हद तक अनुमानित लगती हैं. यदि इसे फ्लैशबैक या किसी साझा घटना से शुरू किया जाता, तो प्रभाव अधिक गहरा हो सकता था.
3. गाने की प्लेसमेंट – अंत में एक वीरतापूर्ण गीत आता है, जो फिल्म के मूल गंभीर टोन से थोड़ा अलग महसूस होता है. इससे भावनात्मक निरंतरता क्षण भर के लिए टूटती है.
4. प्रोडक्शन क्वालिटी – यदि फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित होने का दावा करती है, तो ट्रीटमेंट पर और ध्यान दिया जा सकता था. कई जगह यह डॉक्यूमेंट्री और मुख्यधारा सिनेमा के बीच झूलती प्रतीत होती है, जिससे दृश्यात्मक प्रभाव कमजोर पड़ता है.
खूबियां
1. पूर्वाग्रह के साथ फिल्म देखना कठिन होता है, लेकिन देखने के दौरान कई जगह रिसर्च का आभास होता है. कुछ ट्विस्ट यह संकेत देते हैं कि कहानी केवल एजेंडा आधारित नहीं, बल्कि अध्ययन और तथ्यों पर आधारित प्रतीत होती है.
2. फिल्म सिर्फ एक धर्म को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश नहीं करती. कथा में ऐसे पात्र और प्रसंग भी हैं जो संतुलन का संकेत देते हैं. यह दिखाते हुए कि हर समुदाय में अच्छे और बुरे लोग होते हैं. साथ ही फिल्म दलित समाज, बेटियों पर अत्यधिक सख्ती करने वाले अभिभावकों और तथाकथित उदार सोच रखने वाले समाज की जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाती है. बच्चों की परवरिश और जागरूकता पर यह गंभीरता से बात करती है.
3. तीनों मुख्य अभिनेत्रियों ने अपनी भूमिकाओं में प्रभाव छोड़ा है. अलग-अलग पृष्ठभूमि से आई उनकी कहानियां एक बिंदु पर आकर मिलती हैं. भावनात्मक दृश्यों में उनका अभिनय ईमानदार लगता है और कई बार दर्शक को असहज भी करता है, जो शायद फिल्म का उद्देश्य है.
4. निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह की तारीफ बनती है. विषय की संवेदनशीलता को उन्होंने संतुलन और भावनात्मक वजन के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की है. कहानी की मूल रेखा भले प्रेडिक्टेबल लगे, लेकिन निर्देशन और लेखन मिलकर फिल्म को संभाल लेते हैं.
5. फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म के साथ मेल खाता है और ना तो दृश्यों पर हावी होता है और ना ही लाउड है.
अंतिम राय
कुल मिलाकर, ‘द केरल स्टोरी 2' ऐसी फिल्म है जिसे देखने के बाद आप पूरी तरह उदासीन नहीं रह सकते. यह सोचने पर मजबूर करती है. अगर आप खुले मन से फिल्म देखेंगे, तो इसमें चर्चा के योग्य कई पहलू मिलेंगे. फिल्म पसंद आएगी या नहीं, यह आपके नजरिये पर निर्भर करता है, लेकिन किसी भी फिल्म को, अगर एक धर्म विशेष के इर्द-गिर्द कहानी बुनी गई है, तो उसे पूरी तरह नकार देना भी गलत है, क्योंकि फिल्में समाज का आईना होती हैं. संभव है कि कई घटनाएं हमारे आसपास न घट रही हों या हमारी नजर उन पर न पड़ रही हो, लेकिन यदि किसी की नजर वहां पड़ती है तो उसे यह कहानी कहने की पूरी आजादी है. बशर्ते वह संवैधानिक सीमाओं और सेंसर बोर्ड के कानूनों के तहत बनाई गई हो. बाकी फैसला दर्शकों का है; वे इसे नकार भी सकते हैं और अपना भी सकते हैं.
स्टार- 3
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