हाल ही में फिल्म 'सतलुज' को लेकर एक बड़ा बवंडर खड़ा हो गया. फिल्म 3 जुलाई को ZEE5 पर रिलीज हुई, लेकिन सिर्फ दो दिन बाद ही, यानी 5 जुलाई की शाम को इसे भारत में स्ट्रीम करना बंद कर दिया गया. यह फिल्म अपने कंट्रोवर्शियल विषय की वजह से काफी समय से सेंसर बोर्ड के दफ्तरों के चक्कर काट रही थी और बड़े पर्दे (सिनेमाघर) तक नहीं पहुंच पाई थी. मेकर्स ने सोचा कि चलो OTT का रास्ता अपनाते हैं, क्योंकि वहां सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए होता और प्लेटफॉर्म का अपना 'सेल्फ-रेगुलेटरी' सिस्टम होता है. लेकिन जैसा कि हमने देखा, 'सतलुज' के साथ इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है.
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कोई कंटेंट नियमों के खिलाफ
इस मामले पर फिल्म इंडस्ट्री के जानकार और 'जनता सिनेमा' के संस्थापक यूसुफ शेख का मानना है कि ओटीटी पर 'सेल्फ-रेगुलेशन' का सिस्टम काम करता है, जिसके तहत प्लेटफॉर्म्स को खुद को नियंत्रित करने की आजादी दी गई है. वे कहते हैं कि यदि कोई कंटेंट नियमों के खिलाफ जाता है, तो ओटीटी की अपनी एथिक्स कमिटी इसे देखती है, लेकिन सेंसरशिप का अर्थ 'बंदिशें' नहीं बल्कि 'जिम्मेदारी' है.
OTT पर कंटेंट को लेकर ये कोई पहला हंगामा नहीं है. इससे पहले भी 'तांडव', 'मिर्जापुर' और 'लीला' जैसी वेब सीरीज को लेकर भारी विवाद हो चुके हैं, जहां भावनाओं को आहत करने के आरोप में FIR तक दर्ज हुई. इतना ही नहीं, मामला सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है. फिल्ममेकर्स ने अपनी फिल्मों के ट्रेलर सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज किए, जिन पर लोगों ने खूब आपत्तियां उठाईं और बात कोर्ट-कचहरी तक पहुंच गई जैसे कि 'उदयपुर फाइल्स' के मामले में हुआ. मज़ेदार बात ये है कि अगर आप अपनी फिल्म का ट्रेलर सिनेमाघरों में दिखाना चाहते हैं, तो सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना 'मजबूरी' है. यानी सेंसरशिप का कानून तभी एक्टिव होता है जब आप पर्दे पर फिल्म दिखा रहे हों. इसी का फायदा उठाकर मेकर्स OTT का रुख करते हैं, जहां ये पुराने कानून लागू नहीं होते.
सेल्फ-रेगुलेटरी सिस्टम मजबूत हो
इस बारे में फिल्म कारोबार विशेषज्ञ गिरीश वानखेड़े का कहना है कि सेंसरशिप फिल्मों और टेलीविजन के लिए तो ठीक है, लेकिन ओटीटी पर यह लागू नहीं होनी चाहिए क्योंकि ओटीटी पर मौजूद असली और इंडिपेंडेंट कंटेंट 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' के दायरे में आता है. वानखेड़े आगे जोड़ते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझते हैं, इसलिए इन्हें सेंसरशिप के घेरे में लाने के बजाय इनके 'सेल्फ-रेगुलेटरी' सिस्टम को और मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए.
OTT पर 'सेंसरशिप' का असली मतलब क्या है?
ओटीटी पर सेंसर बोर्ड वाली 'कैंची' नहीं चलती, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वहां कुछ भी चल रहा है. यहां 'सेल्फ-रेगुलेशन' का सिस्टम काम करता है:
1. कंटेंट की कैटेगरी (Age Rating): हर फिल्म या सीरीज के शुरू होने से पहले आपने देखा होगा कि रेटिंग लिखी आती है, जैसे U/A 16+ या 18+. ये रेटिंग ये बताती है कि फिल्म किस ऑडियंस के लिए है.
2. पेरेंटल कंट्रोल: ओटीटी ऐप्स में माता-पिता के लिए 'लॉक' की सुविधा होती है. अगर घर में बच्चे हैं, तो आप एडल्ट कंटेंट को पासवर्ड से प्रोटेक्ट कर सकते हैं.
3. शिकायत निवारण (Grievance Redressal): सरकार के IT नियमों के हिसाब से, हर ओटीटी प्लेटफॉर्म को एक शिकायत अधिकारी बिठाना पड़ता है. यदि किसी को कंटेंट से दिक्कत है, तो वो सीधे उन्हें ईमेल कर सकता है.
सच्चाई ये है कि OTT पर सेंसरशिप का मतलब 'बंदिशें' नहीं, बल्कि 'जिम्मेदारी' है. सिनेमाघरों में सेंसर बोर्ड तय करता है कि आप क्या देखेंगे, जबकि OTT पर प्लेटफॉर्म्स आपको चॉइस देते हैं और उम्र के हिसाब से वार्निंग देते हैं. 'सतलुज' जैसे विवाद ये दिखाते हैं कि डिजिटल दुनिया में नियम और अधिक परिपक्व हो रहे हैं, लेकिन क्या सेंसर बोर्ड का दखल सही है या ये क्रिएटिविटी का गला घोंटना है? ये बहस अभी और लंबी चलने वाली है.
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