प्रयागराज में माघ मेला अपनी पूरी रौनक पर है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं. कुंभ, महाकुंभ और माघ मेला भारतीय संस्कृति का अनमोल हिस्सा हैं, जिनकी झलक बॉलीवुड की कई फिल्मों में कैद हो चुकी है. हिंदी सिनेमा में कुंभ मेले का नाता पुराना है, जहां मेले की भीड़, आस्था, साधु-संतों की छटा और खासकर बच्चे या भाई-बहनों के बिछड़ने-मिलने की भावुक कहानियां बार-बार दिखाई गई हैं. ये दृश्य मेले की दिव्यता और मानवीय भावनाओं को न केवल जीवंत करते हैं, बल्कि मेले से जुड़े सीन सुपरहिट भी रहे. इन फिल्मों की लिस्ट काफी लंबी है. इनमें तकदीर से लेकर कुंभ की कसम और अधिकार जैसी फिल्में शामिल हैं.
तकदीर
महबूब खान के निर्देशन में बनी फिल्म साल 1943 में रिलीज हुई थी, जिसमें नरगिस, मोतीलाल, चंद्रमोहन, चार्ली जैसे सितारे मुख्य भूमिकाओं में थे. हल्की-फुल्की कॉमेडी मेले के इर्द-गिर्द घूमती है. कहानी में दो परिवारों के बच्चे पप्पू और श्यामा मेले की भीड़ में खो जाते हैं. बाद में वे बड़े होकर मिलते हैं और उनकी असली पहचान सामने आती है. मेले का सीन फिल्म की शुरुआत में है, जहां बच्चों के बिछड़ने की घटना होती है. यह 'कुंभ में बिछड़े' वाली थीम की शुरुआत मानी जाती है.
कुंभ के मेले
यह फिल्म साल 1950 में रिलीज हुई थी. यह फिल्म सीधे कुंभ मेले पर आधारित है. इसमें दिखाया गया है कि मेले में आने वाले लोग मोक्ष, शांति और व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान की तलाश में होते हैं. मेले के दौरान उनके जीवन बदल जाते हैं. फिल्म आध्यात्मिकता और मानवीय संबंधों पर फोकस है. इसमें मेले की रौनक, भीड़ और आस्था के दृश्य हैं.
अधिकार
एसएम यूसुफ के निर्देशन में बनी फिल्म साल 1954 में आई थी. फिल्म में उषा किरण, किशोर कुमार जैसे कलाकार मुख्य भूमिकाओं में थे. कुंभ मेले को कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया. मुख्य किरदार रघुनाथ परिवार, कर्तव्य और न्याय के बीच संघर्ष करता है, जिसमें मेले का बैकग्राउंड उसकी आंतरिक लड़ाई को गहराई देता है. मेले के सीन भावुक और आध्यात्मिक हैं.
कुंभ की कसम
तुकाराम काटे के निर्देशन में बनी यह फिल्म साल 1991 में रिलीज हुई थी. कहानी कुंभ मेले की परेशानियों और भावनाओं से जुड़ी है. फिल्म में एक्शन, इमोशन और ट्विस्ट हैं, जहां मेले में भाग्य और दैवीय कृपा दिखाया गया है. मेले के दृश्यों से कहानी आगे बढ़ती है.
धर्मात्मा
यह 1975 में आई फिल्म है, जिसमें फिरोज खान, हेमा मालिनी और रेखा अहम रोल में हैं. फिल्म में कुंभ मेले का एक यादगार सीन है, जहां हेमा मालिनी और उनके परिवार का बिछड़ना दिखाया गया है. उस सीन में 'यह मेला तो बस नाम है, यहां हर कोई अपनी किस्मत का सौदा करने आया है', जैसा डायलॉग है. मेले की भीड़ और आस्था को खूबसूरती से दिखाया गया है.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं