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रश्मिका मंदाना-विजय देवरकोंडा की दूसरी शादी में नहीं होगा कोई पंडित, ना होंगे फेरे, कौन से हैं ये रीति रिवाज?

रश्मिका मंदाना की शादी दो तरह से होगी. ये बात सुनते ही सब सोच में पड़ गए कि एक शादी तेलुगू रीति रिवाज से तो दूसरी शादी किस तरह की होगी. आइए बताते हैं क्या होती है कोडवा वेडिंग.

रश्मिका मंदाना-विजय देवरकोंडा की दूसरी शादी में नहीं होगा कोई पंडित, ना होंगे फेरे, कौन से हैं ये रीति रिवाज?
क्या होती है कोडवा वेडिंग ?
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नई दिल्ली:

रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की शादी आज 26 फरवरी 2026 को उदयपुर के ITC Mementos में संपन्न हो गई. फैंस से मिले नाम ‘विरोश' कहे जाने वाले इस कपल ने दो अलग-अलग रस्मों से विवाह किया. सुबह तेलुगु रीति-रिवाजों से शुभ मुहूर्त पर शादी हुई. इसके बाद रश्मिका के कोडवा समुदाय की पारंपरिक रस्में निभाने की बात सामने आई. यह शादी ‘प्राइमल' थीम पर आधारित थी, जिसमें सादगी, पुरानी परंपराओं और प्रकृति से जुड़े रिवाज प्रमुख रहे. हल्दी सेरेमनी होली जैसी रंगीन रही, सांगीत में मस्ती छाई. पीएम मोदी ने भी इस कपल को शादी की बधाई दी.

फिल्म ‘गीता गोविंदम' से शुरू हुई उनकी केमिस्ट्री अब असल जिंदगी में पति-पत्नी के रिश्ते में बदल गई. फैंस अब ऑफीशियल फोटोज का इंतजार कर रहे हैं. कपल ने खुशी और प्यार से अपनी जिंदगी का नया सफर शुरू कर दिया है. इस बीच कोडवा रीति-रिवाज की शादी काफी चर्चा में रही. आइए बताते हैं इस शादी की 5 मेन बातें-

1.  कोई पुजारी या ब्राह्मण नहीं होता- आम हिंदू शादियों की तरह यहां कोई पंडित या पुजारी रस्में नहीं कराता. पूरी शादी का संचालन परिवार के बुजुर्ग करते हैं. पवित्र दीपक (जिसमें कावेरी अम्मा की तस्वीर होती है) को साक्षी मानकर पूर्वजों से आशीर्वाद लिया जाता है.

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2. दो दिनों का उत्सव (मंगला)- कोडवा शादी आमतौर पर दो दिनों तक चलती है. पहले दिन अलग-अलग रस्में जैसे बाले केतुवा (केले के तनों को काटना, जो ताकत और कौशल दिखाता है) और पूर्वजों को याद करना होता है. दूसरे दिन मुख्य मुहूर्त (दंपति मुहूर्त) और नीर एडपो/गंगा पूजे जैसी रस्में होती हैं, जिसमें दुल्हन कुएं से पानी लाती है और घरेलू कामों में शामिल होने का प्रतीक दिखाती है.

3. दहेज की कोई प्रथा नहीं, खर्च बराबर- कोडवा समुदाय में दहेज नहीं लिया-दिया जाता. शादी का खर्च दूल्हा और दुल्हन के परिवार बराबर बांटते हैं, जो उनकी समानता और स्वाभिमान की भावना को दर्शाता है.

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4. विशेष पारंपरिक परिधान और आभूषण- दुल्हन पीछे से प्लेट वाली साड़ी पहनती है (जो योद्धा विरासत और कावेरी नदी की कथा से जुड़ी है) लाल या सफेद साड़ी के साथ भारी सोने के गहने जैसे पाथक, कोक्केथाठी आदि. दूल्हा सफेद कु प्या-चले पहनता है, जिसमें ओडिकाठी और पीचे काठी (तलवार और चाकू) रखता है. मां दुल्हन को पाथक बांधती है, न कि दूल्हा.

5. पूर्वजों और कावेरी अम्मा का महत्व- शादी में पूर्वजों को याद कर आशीर्वाद लिया जाता है और कावेरी अम्मा (देवी कावेरी) से प्रार्थना की जाती है. यह समुदाय की प्रकृति-पूजा और योद्धा संस्कृति को दिखाता है. शादी में खूब भोजन (मांसाहारी व्यंजन), नाच-गाना और वोलगा (पारंपरिक बैंड) का आनंद होता है.

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