साहित्य में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहते, वे अपने दौर की गवाही बन जाते हैं. डॉ. राही मासूम रजा का नाम भी इन्हीं में है. उनकी कलम से जो निकला वह केवल कविता या कथानक नहीं था, वह उस समय का दस्तावेज था जब देश दो बार अपने ही भीतर से टूटा. एक बार 1947 में नक्शे पर लकीर खिंचने से और दूसरी बार 1975 में लोकतंत्र पर ताला लगने से. राही ने दोनों को करीब से देखा, जिया और फिर अपनी कलम से उसे शब्दों में दर्ज कर दिया ताकि आने वाली पीढ़ियां उन जख्मों को न भूलें और न दोहराएं.
त्रासदी और पीड़ा से जन्मा ‘आधा गांव'
1 अगस्त 1927 को पूर्वांचल के एक छोटे से गांव में जन्मे राही की लेखनी की बुनियाद गांव का गंगा-जमुनी माहौल बना. वहां ईद और होली एक ही आंगन में मनती थीं. जब 1947 में देश बंटा तो राही ने देखा कि कैसे एक दिन तक साथ हंसने-बोलने वाले लोग अगले दिन शक की निगाह से एक-दूसरे को देखने लगे. राजनीति ने नारे दिए और मोहल्लों ने दरवाजे बंद कर लिए. विभाजन की इसी त्रासदी और पीड़ा से जन्मा उनका सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘आधा गांव'. इसमें कोई बड़ी लड़ाई नहीं है, कोई बड़ा उपदेश या फलसफा नहीं है. बस एक गांव है और उस गांव में रहने वाले लोग हैं. मौलवी साहब हैं, पंडित जी हैं, किसान हैं, औरतें हैं जो चूल्हे के पास बैठकर आने वाले कल के बारे में फुसफुसाती हैं. खबर आती है कि देश के दो टुकड़े होंगे. और इसी खबर के साथ गांव के रिश्तों में दरार पड़ने लगती है. राही ने बहुत सीधे शब्दों में दिखाया कि नक्शे पर लकीर खींचना आसान है लेकिन सदियों के साथ को मिटाना उतना आसान नहीं. उपन्यास का नाम ही अपने आप में एक सवाल बन जाता है. गांव भला आधा कैसे हो सकता है? क्या दीवारें बना देने से दिलों के रास्ते बंद हो जाते हैं? इस किताब को पढ़ते हुए लगता है कि राही हमें अदालत में गवाही देने के लिए खड़ा कर रहे हैं. गवाही उस तहजीब की जो टूटने से पहले बहुत खूबसूरत थी.

‘आधा गांव' के बाद आए उनके उपन्यास "टोपी शुक्ला", "ओस की बूंद" और "दिल एक सादा कागज" विभाजन के बाद के भारत की मानसिकता को टटोलते हैं. ‘टोपी शुक्ला' नाम एक लड़के का लेकिन कहानी दो दोस्ती की. टोपी और इफ्फन बचपन से साथ खेलते हैं, साथ पढ़ते हैं. फिर एक दिन माहौल बदलता है. लोग पूछने लगते हैं तुम किस तरफ हो. धर्म पहचान बन जाता है और पहचान दीवार बन जाती है. राही ने इस उपन्यास में व्यंग्य का सहारा लिया. नेताओं की बातों पर, धर्म के ठेकेदारों की दोगली सोच पर, समाज के पाखंड पर. लेकिन व्यंग्य के नीचे एक गहरा दर्द है. दर्द इस बात का कि विभाजन खत्म हो गया लेकिन उसके सवाल आज भी हमारे साथ चलते हैं.
‘कटरा बी आर्जू' इमरजेंसी की दास्तां
लगभग तीस साल बाद देश ने एक और आघात झेला. इमरजेंसी. रातोंरात अखबारों पर सेंसर लग गया, विरोध की आवाजें जेलों में बंद कर दी गईं. इसी माहौल में लिखा गया ‘कटरा बी आर्जू'. राही सत्ता के गलियारों में नहीं गए. वे आम गली में खड़े रहे जहां चाय की दुकान पर लोग धीरे से पूछते हैं आज अखबार क्यों नहीं आया. जहां छात्र डरते हैं कि कोई बात कह देने पर पकड़ लिए जाएंगे. जहां अफसरों की चापलूसी और आम आदमी की खामोशी साथ-साथ चल रही है. ‘कटरा बी आर्जू' में उजालों पर अंधकार की मोटी तह जमी दिखती है. इसी दौर की पीड़ा उनकी इन पंक्तियों में सबसे साफ सुनाई देती है:
"उजाला कहां है?
न दिल में, न घर में, न रास्ते में
यहां से वहां तक अंधेरे का एक सिलसिला है"
राही के लिए इमरजेंसी केवल राजनीतिक घटना नहीं थी, वह नागरिक और संविधान के बीच भरोसे का टूटना था. यहां शब्द तेज हैं, तीखे हैं. जैसे कोई रिपोर्टर अपनी डायरी में रोज का हाल लिख रहा हो. क्योंकि राही जानते थे कि इस दौर को सजाकर लिखने का समय नहीं है. इसे वैसे ही लिखना होगा जैसा यह था. कच्चा, डरावना और सच.

अगर दोनों दौरों को साथ रखकर देखें तो एक बात साफ होती है. राही के लिए विभाजन और इमरजेंसी अलग-अलग घटनाएं नहीं थीं. दोनों जगह उन्हें एक ही चीज दिखाई दी. सत्ता का यह भ्रम कि वही सब कुछ है. 1947 में धर्म के नाम पर और 1975 में कानून के नाम पर. दोनों बार आम आदमी बीच में पिसा. दोनों बार रिश्ते, दोस्ती और भरोसा सबसे पहले टूटे. आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि राही मासूम रजा ने जानबूझकर दो सबसे असहज विषयों को चुना. क्योंकि ये दोनों विषय हमें आईना दिखाते हैं. विभाजन हमें बताता है कि नफरत कितनी जल्दी सदियों की साझेदारी को निगल जाती है. और इमरजेंसी हमें बताती है कि आजादी कितनी नाजुक होती है. एक गलत फैसला और सब कुछ बदल सकता है.
राही की सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा
राही की सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा थी. वे जानबूझकर ऐसी भाषा लिखते थे जो स्कूल की किताब से नहीं, बाजार से आती हो. जिसमें गाली भी हो और दुआ भी. जिसमें तंज भी हो और आंसू भी. इसी कारण उनके पाठक सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहे. गांव का आदमी भी ‘आधा गांव' पढ़कर कहता कि यह तो हमारी ही कहानी है.

राही मासूम रजा आधुनिक भारतीय साहित्य और संस्कृति के एक विराट स्तंभ थे. उनकी विरासत में सात काव्य-संग्रह, दस उपन्यास, हिंदी सिनेमा की प्रतिष्ठित पटकथाएं, दर्जनों प्रसिद्ध फिल्मी गीत व भजन और कालजयी धारावाहिक “महाभारत” के संवाद शामिल हैं. भावुक इतने कि स्वयं को तीन मांओं का बेटा कहते (एक- जन्म देने वाली मां, दूसरी- मां गंगा और तीसरी- शिक्षण-संस्थान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय), और बेबाक इतने कि विभाजन की विभीषिका और आपातकाल के काले अध्यायों पर लिखते समय उनकी कलम तलवार से अधिक धारदार हो जाती थी. भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपराओं पर पकड़ ऐसी कि “महाभारत” सीरियल के संवादों ने महाभारत को जीवन-चरित्र का हिस्सा बना दिया. और गीत-ग़जल के रचनाकार इतने बड़े कि आज भी लोग पूछते हैं: “हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद”.
आज से राही का जन्मशती वर्ष प्रारम्भ हो रहा है. पूर्वांचल की कला एवं संस्कृति को समर्पित संस्था ‘माटी' ने प्रण लिया है कि इस एक साल में 100 आयोजन किए जाएंगे. यह समारोह राही के व्यापक साहित्य और विचारों को पुनः खोजने तथा उन्हें वह केंद्रीय स्थान दिलाने का प्रयास है जिसके वे हकदार हैं. सरकारों और निजी संस्थाओं को आगे आकर यह कार्य करना होगा. इसी में राष्ट्रहित है और राही के मूल्यों की रक्षा भी.
ब्लॉग के लेखक- आसिफ आजमी (संयोजक, माटी)
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