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कांच, बोतल और चाबियों की आवाज से बनाए पंचम दा ने ये एवरग्रीन गाने, निधन के बाद भी दिया ब्लॉकबस्टर सॉन्ग

महान संगीतकार राहुल देव बर्मन को दुनिया 'पंचम दा' के नाम से जानती है. खास बात यह है कि उन्होंने हर साधारण आवाज में धुन ढूंढने की कला को नई ऊंचाई दी. यह सोच उनके पूरे करियर की पहचान बन गई.

कांच, बोतल और चाबियों की आवाज से बनाए पंचम दा ने ये एवरग्रीन गाने, निधन के बाद भी दिया ब्लॉकबस्टर सॉन्ग
आरडी बर्मन को पंचम दा के नाम से जाना जाता है
नई दिल्ली:

महान संगीतकार राहुल देव बर्मन को दुनिया 'पंचम दा' के नाम से जानती है. खास बात यह है कि उन्होंने हर साधारण आवाज में धुन ढूंढने की कला को नई ऊंचाई दी. यह सोच उनके पूरे करियर की पहचान बन गई. उन्होंने साबित किया कि संगीत सिर्फ वाद्ययंत्रों से नहीं, बल्कि हर धड़कती और टकराती आवाज से बन सकता है. पंचम दा का जन्म 27 जून 1939 को कोलकाता में हुआ था. संगीतकार सचिन देव बर्मन के बेटे होने के कारण उन्हें बचपन से ही संगीत का माहौल मिला. उन्होंने महज नौ साल की उम्र में फिल्म 'फंटूश' के लिए धुन तैयार की थी, जिसमें 'ऐ मेरी टोपी पलट के आ' जैसे शुरुआती काम शामिल थे. बचपन में ही उनका झुकाव नई धुनों को तैयार करने की ओर था.

इस गाने ने पंचम दा को बनाया मॉडर्न संगीतकार

बाद में जब वह मुंबई आए तो उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अपने पिता के असिस्टेंट के रूप में की और धीरे-धीरे स्वतंत्र संगीतकार बन गए. आर.डी. बर्मन को शुरुआती पहचान फिल्म 'तीसरी मंजिल' के गाने 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा' से मिली. इस गाने ने उन्हें एक मॉडर्न संगीतकार के रूप में स्थापित किया. इसके बाद 'हरे रामा हरे कृष्णा' का 'दम मारो दम', और 'कटी पतंग' का 'ये शाम मस्तानी' जैसे गानों ने उन्हें सुपरहिट संगीतकार बना दिया.

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राजेश खन्ना और किशोर कुमार के साथ हिट जोड़ी

1970 और 80 के दशक में उनका सुनहरा दौर रहा, जब उन्होंने राजेश खन्ना और किशोर कुमार के साथ मिलकर कई यादगार गाने दिए. 'आराधना' का 'मेरे सपनों की रानी', 'अमर प्रेम' का 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुदरत' का 'हमें तुमसे प्यार कितना', और 'अमर अकबर एंथनी' का 'पर्दा है पर्दा' जैसे गाने आज भी लोकप्रिय हैं.

कांच, बोतल, चम्मच से बनाईं धुनें

इस दौर में वह कांच, बोतल, चम्मच और कंघी जैसी चीजों से धुनें तैयार करते थे. फिल्म 'शोले' के मशहूर गीत 'महबूबा महबूबा' में उन्होंने बोतल में फूंक मारकर अनोखी रिदम तैयार की. फिल्म 'यादों की बारात' के गीत 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' में उन्होंने कांच की प्याली और चम्मच की टकराहट से संगीत बनाया. वहीं, फिल्म 'पड़ोसन' के गीत 'एक चतुर नार' में कंघी और खुरदुरी सतह से आवाज निकालकर धुन बनाई गई. 

 पानी, थाली और हवा की आवाज को भी बनाया म्यूजिक

 गाने 'अगर तुम न होते' में चाबियों की आवाज से धुन तैयार की गई। वहीं, फिल्म 'किताब' में स्कूल बेंच की आवाज को संगीत का हिस्सा बनाया गया.  इसके अलावा, उन्होंने कई अन्य फिल्मों में भी आम चीजों जैसे पानी, थाली और हवा की आवाजों को संगीत में बदल दिया. 1980 के बाद उनके करियर में गिरावट आने लगी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने 'सनम तेरी कसम' का 'शीशा हो या दिल हो', 'मासूम' का 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी', और 'गोलमाल' का 'आने वाला पल जाने वाला है' जैसे गाने दिए. इस दौर में उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया, लेकिन संगीत से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ. 

अंतिम समय के गानों ने खूब पाई पॉपुलैरिटी

अपने करियर के अंतिम समय में आर.डी. बर्मन को 15 अप्रैल 1994 में रिलीज हुई  '1942: ए लव स्टोरी' में संगीत देने का मौका मिला, जिसने उनके करियर को फिर से नई चमक दी. इस फिल्म के गाने 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा', 'कुछ न कहो', और 'रिमझिम रिमझिम' बेहद लोकप्रिय हुए, लेकिन वे इस सफलता को देखने के लिए जीवित नहीं रहे. 4 जनवरी 1994 को उनका निधन हो गया. 

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