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This Article is From Dec 26, 2025

माधुरी दीक्षित-“जिन फिल्मों के रिव्यू अच्छे होते थे, हम वही देखने जाते थे

हिंदी सिनेमा में ‘धक-धक गर्ल’ के नाम से मशहूर माधुरी दीक्षित ने अपने अभिनय, नृत्य और खूबसूरती से दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज किया है.

माधुरी दीक्षित-“जिन फिल्मों के रिव्यू अच्छे होते थे, हम वही देखने जाते थे
माधुरी दीक्षित-“जिन फिल्मों के रिव्यू अच्छे होते थे, हम वही देखने जाते थे”
नई दिल्ली:

हिंदी सिनेमा में ‘धक-धक गर्ल' के नाम से मशहूर माधुरी दीक्षित ने अपने अभिनय, नृत्य और खूबसूरती से दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज किया है. अपने लंबे करियर में माधुरी ने न सिर्फ व्यावसायिक सिनेमा में बड़ी सफलताएँ हासिल कीं, बल्कि ऐसी फिल्में भी कीं, जो कला और व्यावसायिक सिनेमा के बीच की कड़ी मानी जाती हैं. हालांकि, अपने करियर के एक लंबे हिस्से में वह नकारात्मक या डर पैदा करने वाले किरदारों से दूरी बनाए रहीं, क्योंकि उस दौर में ऐसी भूमिकाओं को कलाकार की छवि के लिए जोखिम भरा माना जाता था.

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बदलते समय के साथ सिनेमा की भाषा और मंच दोनों बदले हैं. डिजिटल मंचों के विस्तार ने कलाकारों को नए प्रयोग करने और अपने अभिनय की सीमाओं को परखने का अवसर दिया है. इसी बदलाव के बीच माधुरी दीक्षित की वेब श्रृंखला ‘मिसेज़ देशपांडे' सामने आई है, जिसमें वह पहली बार ऐसा किरदार निभा रही हैं, जो दर्शकों को डर और असहजता के एहसास से भर देता है. एनडीटीवी से खास बातचीत में माधुरी दीक्षित से पूछा गया कि अगर ‘मिसेज़ देशपांडे' जैसा किरदार उन्हें अपने करियर के शुरुआती दौर में मिला होता, तो क्या वह इसे स्वीकार करतीं? इस सवाल के जवाब में माधुरी ने कहा, “मुझे लगता है कि अगर उस वक्त यह किरदार मुझे मिलता, तो मैं इसे करने के लिए पूरी तरह तैयार होती.”

माधुरी ने अपने बचपन और सिनेमा से जुड़े अनुभवों को साझा करते हुए कहा, “मेरे पिता रोज़ अख़बार पढ़ते थे और जिन फिल्मों के रिव्यू अच्छे होते थे, हम वही फिल्में देखने जाते थे.” उन्होंने आगे बताया, “अक्सर वे फिल्में कला सिनेमा की होती थीं. हमने शबाना आज़मी जी, स्मिता पाटिल जी और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकारों की फिल्में थिएटर में देखी हैं, ‘मंथन', ‘स्पर्श', ‘बाज़ार', ‘मंडी' और ‘भुवन शोम' जैसी फिल्में.”

इन फिल्मों के प्रभाव को लेकर माधुरी ने कहा, “इन फिल्मों में यथार्थ था और अभिनय का अंदाज़ बिल्कुल अलग था. शायद उसी वजह से मुझे हमेशा ऐसे सिनेमा से जुड़ाव महसूस हुआ.” माधुरी का मानना है कि इसी झुकाव के चलते उन्होंने अपने करियर में ऐसे प्रोजेक्ट भी चुने, जो पारंपरिक ढांचे से अलग थे. उन्होंने कहा, “इसी कारण मैंने ‘दिल तो पागल है' के साथ-साथ ‘मृत्युंजय', ‘प्रहार' और ‘पुकार' जैसी फिल्में भी कीं, जो कला और व्यावसायिक सिनेमा के बीच का रास्ता थीं.” वह यह भी स्वीकार करती हैं कि अस्सी और नब्बे का दशक जोखिम उठाने के लिहाज़ से अलग था. माधुरी के अनुसार, “उस समय शायद निर्देशक भी मुझे ऐसे किरदारों के लिए नहीं देखते थे, क्योंकि मैं उस आयु वर्ग में नहीं थी, जहाँ इस तरह के अलग और चुनौतीपूर्ण रोल दिए जाते थे.”

आज के दौर को लेकर कलाकारों से लेकर दर्शकों तक, सभी की सोच में बड़ा बदलाव आया है. ‘मिसेज़ देशपांडे' का निर्देशन किया है नागेश कुकुनूर ने, जिन्होंने हैदराबाद ब्लूज़ और इक़बाल जैसी फिल्मों से भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी थी. ऐसे में यह श्रृंखला माधुरी दीक्षित के करियर का एक नया आयाम है और देखना होगा की क्या दर्शक नेगेटिव किरदार में माधुरी को पसंद करेंगे ?

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