बॉलीवुड में जब दो शेर एक साथ दहाड़ते हैं, तो थिएटर में सीटियां और तालियां बजना लाजमी है. ऐसा ही माहौल तब बना था जब 1997 की ब्लॉकबस्टर बॉर्डर के 29 साल बाद, ओरिजिनल बॉक्स ऑफिस गदर (Gadar) के सनी देओल और धुरंधर के रहमान डकैत यानी अक्षय खन्ना फिर से स्क्रीन पर साथ नजर आए.
डायरेक्टर सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की 10 जुलाई को नेटफिलक्स पर रिलीज हुई कोर्टरूम ड्रामा को लेकर चर्चा बहुत ज़्यादा थी. लेकिन रिलीज के तीसरे दिन कर दर्शकों के दिलों में इसने उम्मीद के मुताबिक कोई गदर नहीं मचा पाई. जिसके कारण सनी देओल को फिल्म दामिनी के बाद फिर से काले कोर्ट में देखकर बेहतरीन लगा , लेकिन गोविंद श्रीवास्तव की कमी खली.
क्या है कहानी का ताना-बाना?
फिल्म की कहानी अर्जुन उर्फ इक्का (सनी देओल) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो एक ऐसा वकील है जिसने अपने पूरे करियर में कभी कोई केस नहीं हारा. कहानी में मोड़ तब आता है जब एक रसूखदार और अमीर आदमी शौर्यमान एक लड़की की जानलेने का आरोप लगता है. इक्का शुरुआत में इस केस को हाथ में लेने से साफ मना कर देता है. क्योंकि शौर्यमान के साथ वह पहले काम कर चुका होता है और वह उसकी फितरत से वाकिफ होता, ऐसे में केस लेने के लिए जब उसपर दबाव बनया जाता है तो वह साफ मना कर देता है. साथ ही कहता है कि सिर्फ एक मिरिकल ही उससे यह केस लड़वा सकती है, बस यही से कहानी में आता है ट्विट्सट . अर्जुन के परिवार में एक मेडिकल कंडीशन ऐसी आती है जिसका इलाज सिर्फ शौर्यमान के पास है, ऐसे में अर्जुन उसके पास आकर उसकी मदद करने के लिए कहता है जिसपर शौर्यमान उसकी मदद के लिए तैयार हो जाता है लेकिन अपना केस लड़ने की कंडीशन पर.
बर फिर यही से शुरू होता है एक मजबूर वकील , एक शातिर मुजरिम के हाथों की कठपुतली बनने का खेल. अपनी जीत का रिकॉर्ड बरकरार रखने और शौर्यमान को बचाने के लिए इक्का अपनी पूरी जान लगा देता है, लेकिन क्या वह कानून की इस उलझन को सुलझा पाएगा? यही फिल्म की मुख्य कहानी है. फिल्म के टीजर और ट्रेलर ने सोशल मीडिया पर जो तहलका मचाया था, उसे देखकर लगा था कि यह जोड़ी इस बार भी इतिहास रचेगी.लेकिन अफसोस, जब फिल्म पूरी तरह सामने आई, तो फैंस के हाथ थोड़ी निराशा ही लगी.
स्टार पावर दमदार फिऱ भी लगी बोझिल
एक बेहतरीन कोर्टरूम ड्रामा से दर्शक उम्मीद करते हैं कि वह उन्हें सीट से बांधकर रख दे, दिमाग में नए-नए सवाल पैदा करे और क्लाइमैक्स तक आते-आते झकझोर दे. मगर 'इक्का' इन पैमानों पर काफी कमजोर साबित होती है. 'दामिनी' के एडवोकेट गोविंद श्रीवास्तव वाले कड़क अंदाज की याद दिलाने वाले सनी देओल फिल्म में अपने किरदार के साथ पूरी तरह जस्टिस कर नहीं पाएं. वहीं अक्षय खन्ना को शौर्यमान के किरदार में भी रहमान डकैत के कैरेक्टर को लिए घूम रहे है. उन्होंने अपने डॉयलॉग को उसी तरह बोले जिस तरह धुरंधर में किया, जिसे देखकर लगा कि वह अभी तक रहमान डकैत को जी रहै है.
स्क्रिप्ट पड़ी कमजोर
फिल्म की स्क्रिप्ट को बहुत ही ढीले तरीके से लिखा गया है, जिससे कहानी बेवजह खिंची हुई और लंबी लगने लगती है. हालांकि, फिल्म का असली मजा इसके क्लाइमैक्स में आ सकता है, क्योंकि जब लगता है केस खत्म हुआ तो इक्का एक ऐसी चाल चलता है जिससे अपने उसूलों से किए समझौते को फिर से न्याय के तराजू में लाकर खड़ा कर देता है. कोर्टरूम ड्रामा औक क्राइम थ्रीलर होने के बाद भी यह पूरी फिल्म आपको कोई बड़ा ट्विस्ट मूवी देखने के दोरान नहीं देती है. जिसकी वजह से फिल्म बीच में ही बोझिल लगने लगती है.
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