अमेजन प्राइम पर चार सीजन में आई वेब सीरीज 'फोर मोर शॉट्स प्लीज ' चार महिला दोस्तों अंजना (कीर्ति कुल्हारी), सिद्धि (मानवी गगरू), दामिनी (सयानी गुप्ता) और उमंग (वीजे बानी) की कहानी कहती है. ये चारों महिलाएं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहती हैं. रिश्ते, करियर, सेक्सुअलिटी और सामाजिक दबावों के बीच वे अपने फैसले खुद लेने की कोशिश करती हैं. यही वजह है कि यह सीरीज अपने दर्शकों से जल्दी जुड़ जाती है और शहरी मध्यवर्गीय महिला जीवन का एक परिचित चेहरा सामने रखती है.
जब परदे के चेहरे अपनी ही कहानी लगने लगें
सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं. दर्शक इनके साथ हंसता है, नाराज होता है और कई बार निराश भी होता है. जब ये अपने पार्टनर को धोखा देते हैं या गलत फैसले लेते हैं, तब गुस्सा आता है. लेकिन थोड़ी ही देर में उनके हालात समझ में आने लगते हैं और माफी का भाव भी पैदा होता है. यह भावनात्मक जुड़ाव ही सीरीज को प्रभावी बनाता है और दर्शक को आखिरी सीजन तक बांधे रखता है.
जहां जाम के साथ जिंदगी भी छलकती है, साथ में समाज से जरूरी सवाल
चारों दोस्तों का ठिकाना जेह (प्रतीक स्मिता पाटिल) का ट्रक बार है. यही वह जगह है जहां जिंदगी में मिली हार के बाद वे एक दूसरे से मिलती हैं. सीरीज आगे बढ़ने के साथ यह ट्रक बार सिर्फ मिलने की जगह नहीं रहता, बल्कि दुख, गम, हंसी और आत्ममंथन का केंद्र बन जाता है. यहां बैठकर दोस्त अपने डर साझा करती हैं, रिश्तों पर बात करती हैं और अपनी समस्याओं के हल तलाशने की कोशिश करती हैं.
यह सीरीज महिलाओं के अपनी शर्तों पर जीने के अधिकार को मजबूती से सामने रखती है. यह कई रूढ़िवादी सामाजिक धारणाओं पर सवाल उठाती है. क्या चालीस या पचास की उम्र के बाद प्यार की इजाजत नहीं है. क्या विधवाओं को दोबारा रिश्ते में आने का अधिकार होना चाहिए. सिंगल मदर किन सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों से गुजरती है. लेस्बियन रिश्तों को समाज किस नजर से देखता है. सीरीज इन सवालों से बचती नहीं, बल्कि उन्हें सीधे दर्शक के सामने रखती है.
टूटे रिश्ते से आत्मनिर्भरता की उड़ान
चारों किरदारों में अंजना सबसे मजबूत और परिपक्व रूप में उभरती है. शुरुआत में वह एक खराब और टूट चुके रिश्ते से बाहर निकलती दिखाई देती है. पेशे से वह एक सफल वकील है, लेकिन निजी जीवन में लगातार संघर्ष कर रही है. सीरीज के अंत तक अंजना न सिर्फ अपनी बेटी के भविष्य को लेकर ठोस फैसले लेती है, बल्कि खुद भी जिंदगी को खुलकर जीना सीखती है. पूरे भारत की बाइक यात्रा का उसका सपना आत्मनिर्भरता और आजादी का उदाहरण बन जाता है.
असमंजस से आत्मविश्वास तक का सफर
सिद्धि की कहानी एक ऐसी युवा महिला की है जो शुरुआत में बेरोजगार है और खुद को लेकर असमंजस में रहती है. पिता के सहयोग और दोस्तों की मदद से वह धीरे धीरे अपनी पहचान खोजती है. सीरीज के दौरान वह न सिर्फ अपने पसंद का काम चुनती है, बल्कि रिश्तों को लेकर भी परिपक्व होती है. अंत तक सिद्धि को जीवन में स्थिरता और मनचाहा साथी दोनों मिलते हैं. बॉडी शेमिंग जैसे ज्वलंत विषय को लेकर सिद्धि का किरदार समाज के लिए एक उदाहरण है.
सच बोलने की कीमत और सुकून की खोज
दामिनी इस वेब सीरीज का सबसे चर्चित और विवादास्पद किरदार है. वह एक सफल और तेजतर्रार पत्रकार है, जिसकी बेबाकी कई बार उसके लिए मुसीबत बन जाती है. अपनी ही बनाई न्यूज वेबसाइट से बाहर कर दिए जाने के बाद दामिनी कई असफलताओं और मानसिक संघर्षों से गुजरती है. लेकिन अंततः वह वही काम करती है जिसमें उसे सुकून और पहचान मिलती है. इस किरदार से दर्शक को बार बार प्यार भी होता है और नाराजगी भी. दामिनी और जेह की केमिस्ट्री शानदार लगती है.
रिश्तों, आजादी और चुनावों के बीच खड़ी उमंग
लुधियाना से मुंबई आई उमंग इस भागती हुई महानगरीय दुनिया में खुद को तलाशती है. एक प्रभावशाली हस्ती से रिश्ते में रहने के बावजूद जब वह अपनी शर्तों पर नहीं जी पाती, तो वह उस रिश्ते को तोड़ने का फैसला करती है. दोस्तों को जोड़कर रखने वाली उमंग का सफर संघर्ष, प्रेम, परिवार और करियर के बीच संतुलन की कहानी बन जाता है.
संवादों की बेबाकी और कैमरे की तेज नजर
सीरीज के ज्यादातर संवाद अंग्रेजी में हैं और वे असरदार हैं. Women have to work twice as hard to reach half as far जैसे संवाद सीरीज की सोच को स्पष्ट करते हैं. वहीं हिंदी के संवाद भी खास असर छोड़ते हैं. दामिनी का यह कहना कि इंडिया में बस यही दिखता है हर जगह, ऐसे हमेशा stare करते हुए, आज की शहरी महिला की रोजमर्रा की बेचैनी को सामने रखता है. छायांकन मजबूत है और समुद्र के दृश्य तथा मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी को कैमरा प्रभावी ढंग से पकड़ता है.
नारीवाद की चमक और उसकी सीमाएं
महिला कामुकता, दफ्तर की चुनौतियां और महिलाओं के बीच दोस्ती जैसे विषयों को खुलकर दिखाने की वजह से यह वेब सीरीज लैंगिक प्रतिनिधित्व को समझने के लिए अहम बन जाती है. हालांकि सीरीज नारीवाद का ऐसा रूप दिखाती है जो एक खास वर्ग तक सीमित है. समाज की गहरी आर्थिक और सामाजिक असमानताओं पर इसमें कम ध्यान दिया गया है और महिलाओं के सशक्तिकरण को अक्सर जीवनशैली और व्यक्तिगत चुनावों तक सीमित कर दिया गया है.
कुछ खामियों के बावजूद फोर मोर शॉट्स प्लीज आज के दौर के नारीवादी विचारों की शक्ति के साथ उनकी सीमाओं को भी सामने लाती है. सीरीज सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समकालीन स्त्री जीवन पर एक जरूरी बहस भी बन गई है.
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