हिंदी सिनेमा में धार्मिक फिल्मों का दौर एक बार फिर लौटता दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ समय में छोटे और बड़े बजट की कई धार्मिक फिल्में रिलीज हुई हैं, जबकि कई और आने वाली हैं. हालांकि, इन फिल्मों के साथ विवाद और सोशल मीडिया पर बहस भी बराबर चलती रही है. इसी बीच 7 अगस्त को रिलीज हुई है धार्मिक फिल्म ‘हनुमान अंश', जिसके निर्देशक हैं डॉ. विशाल चतुर्वेदी. एनडीटीवी से खास बातचीत में डॉ. चतुर्वेदी ने ‘हनुमान अंश' से लेकर रणबीर कपूर की ‘रामायण', धार्मिक फिल्मों में कास्टिंग, कलाकारों के आचरण और आस्था से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश.
सवाल: फिल्म 7 अगस्त को रिलीज हो रही है. कितने स्क्रीन्स पर इसे रिलीज किया जाएगा?
जवाब: हमारी फिल्म करीब 250 से 350 स्क्रीन्स पर रिलीज होगी. शुरुआत में स्क्रीन मिलने को लेकर थोड़ी चिंता थी, लेकिन अब हमें जितना स्क्रीन स्पेस चाहिए था, वह मिल गया है. अलग-अलग वजहों से फिल्म को लेकर चर्चा बढ़ी है और उसका फायदा भी हमें मिला है.
सवाल: नीब करौरी बाबा पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?
जवाब: आज से करीब 20 साल पहले मेरा कैंची धाम से ऐसा जुड़ाव हुआ, जिसने मेरी सोच बदल दी. मैं नैनीताल के पास तैनात था. एक दिन हम दोस्त घूमने निकले और गलती से दूसरे रास्ते पर चले गए. तेज बारिश, तूफान और बिजली के बीच अचानक हमारी गाड़ी फिसली और रुक गई. कुछ ही पलों में बारिश थम गई, धुंध छंट गई और जब मैंने दरवाजा खोला तो वह सीधे कैंची धाम के प्रवेश द्वार के सामने खुला. उस अनुभव ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया. बाद में पता चला कि ऐसे अनुभव बहुत से लोगों के साथ हुए हैं, जिन्हें महाराज जी अपने पास बुलाते हैं. तभी से उनके जीवन पर फिल्म बनाने का विचार मेरे मन में था.
मैंने एक बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म को यह विषय सुनाया, लेकिन उनका रवैया बेहद नकारात्मक था. उसी दिन मैंने तय कर लिया कि यह फिल्म हर हाल में बनाऊंगा, क्योंकि मुझे लगा कि साधु-संतों की कहानियों को केवल नकारात्मक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. बाद में कुछ लोगों का सहयोग मिला और सीमित बजट में यह फिल्म बन पाई.
सवाल: आज के दौर में धार्मिक फिल्म, वह भी नए कलाकारों के साथ बनाना कितना मुश्किल है?
जवाब: नए कलाकारों के साथ फिल्म बनाना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है. मेरे पास बड़े कलाकारों के साथ फिल्म बनाने के विकल्प भी थे, लेकिन मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया. मेरा मानना था कि महाराज जी जैसे किरदार के लिए ऐसा चेहरा होना चाहिए जिसकी पहले से कोई स्थापित छवि न हो और जिसके आचरण से उस किरदार की गरिमा प्रभावित न हो. इसी वजह से कई साल तक निवेशक नहीं मिले, लेकिन आखिरकार कुछ लोगों ने भरोसा किया और उनके सहयोग से फिल्म बन सकी. इस विषय पर पिछले 30-40 वर्षों में बहुत कम काम हुआ है, इसलिए इसे लेकर लोगों में भी उत्सुकता है.
सवाल: क्या आपने किसी बड़े स्टार को फिल्म से जोड़ने की कोशिश की थी?
जवाब: महाराज जी के किरदार के लिए मैंने किसी बड़े स्टार से संपर्क नहीं किया. हां, कहानी सुनाने वाले नैरेटर की आवाज के लिए दो-तीन बड़े कलाकारों से बात की थी, ताकि उनकी पहचानी हुई आवाज कहानी में विश्वास और ठहराव ला सके. कुछ लोग तैयार भी थे, लेकिन हमारी फिल्म का बजट बहुत छोटा था. अंत में अभिनेता चंदन आनंद ने यह जिम्मेदारी निभाई.
सवाल: आज धार्मिक फिल्मों को लेकर जिस तरह का माहौल है, रामायण और इससे पहले आदिपुरुष को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह की ट्रोलिंग हुई, क्या ऐसे माहौल में धार्मिक फिल्में बनाना पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है?
जवाब: धार्मिक फिल्में बनाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी संवेदनशीलता है. लोग अपने धर्म और आस्था को लेकर बेहद भावुक होते हैं. जब आपको किसी धर्म पर फिल्म बनाने की आजादी मिलती है तो उसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है. हर कदम बहुत सोच-समझकर उठाना पड़ता है. सिर्फ रिसर्च काफी नहीं है, बल्कि उस विषय के प्रति श्रद्धा और विश्वास भी होना चाहिए.
इसी सोच के कारण हमने कास्टिंग में भी बहुत सावधानी बरती. हमने ऐसे कलाकारों को चुना जिनका व्यवहार और जीवनशैली सात्विक है. पूरा सेट शाकाहारी रखा गया, रोज आरती होती थी और हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता था, ताकि पूरी टीम उसी आध्यात्मिक वातावरण में काम करे. मेरा मानना है कि जब तक कलाकार उस भाव को भीतर से महसूस नहीं करेगा, वह ऐसे किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाएगा.
सवाल: आज क्या आस्था से ज्यादा कलाकार की छवि हावी हो गई है? पहले लोग किसी भी कलाकार में भगवान राम का स्वरूप देखते थे, लेकिन अब रणबीर कपूर या प्रभास जैसे कलाकारों की निजी छवि को लेकर चर्चा ज्यादा होती है. पहले महिपाल, प्रेम अदीब, अरुण गोविल, गुरमीत चौधरी और आशीष शर्मा जैसे कलाकारों के साथ ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिली.
जवाब: मुझे नहीं लगता कि लोग केवल रणबीर कपूर या प्रभास को देख रहे हैं. सबसे पहले मैं रणबीर कपूर को शुभकामनाएं देना चाहता हूं. उन्होंने अपने जीवन में काफी सकारात्मक बदलाव किए हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि रामायण सफल होगी.
जहां तक अरुण गोविल, गुरमीत चौधरी और आशीष शर्मा का सवाल है, जब उन्होंने भगवान राम का किरदार निभाया था तब उनकी पहले से कोई बड़ी स्टार इमेज नहीं थी. दर्शकों ने उन्हें उनके किरदार के रूप में स्वीकार किया. यही वजह थी कि मैंने भी शुरुआत से तय किया था कि महाराज जी के किरदार के लिए नया चेहरा ही लूं, ताकि लोग कलाकार की पुरानी छवि नहीं, बल्कि किरदार को देखें.
मेरा मानना है कि फिल्मकार को अपनी कास्टिंग चुनने की पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन धार्मिक फिल्मों में कलाकारों का चयन सिर्फ अभिनय के आधार पर नहीं होना चाहिए. उनके आचरण, व्यवहार और व्यक्तित्व को भी उतनी ही गंभीरता से देखना चाहिए, क्योंकि ऐसे किरदारों के साथ करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी होती है.
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