आज के दौर में किसी बड़े बजट की फिल्म को बनने में 2-3 साल लग जाएं, तो उसे भी लंबा समय माना जाता है. लेकिन हिंदी सिनेमा में एक ऐसा डायरेक्टर भी हुआ, जिसने अपनी ड्रीम फिल्म को पर्दे तक पहुंचाने में पूरे 14 साल लगा दिए. इस दौरान फिल्म कई बार रुकी, कलाकार बदले, प्रोड्यूसर बदल गया, लेकिन डायरेक्टर ने हार नहीं मानी. नतीजा था 'मुगल-ए-आजम', जिसे आज भारतीय सिनेमा की सबसे भव्य और यादगार फिल्मों में गिना जाता है.
के. आसिफ ने 'मुगल-ए-आजम' पर काम 1946 में शुरू किया था. शुरुआती दौर में इस फिल्म के प्रोड्यूसर शिराज अली हकीम थे, लेकिन 1947 के बंटवारे के बाद उनके पाकिस्तान चले जाने से फिल्म का काम रुक गया. बाद में उद्योगपति शापूरजी पलोनजी इस प्रोजेक्ट से जुड़े और फिल्म पर दोबारा काम शुरू हुआ. आखिरकार 5 अगस्त 1960 को यह फिल्म रिलीज हुई.
पहली कास्ट भी थी बिल्कुल अलग
बहुत कम लोग जानते हैं कि 'मुगल-ए-आजम' की शुरुआती स्टारकास्ट आज वाली नहीं थी. शुरुआत में चंद्रमोहन, डी.के. सप्रू और नरगिस को अहम भूमिकाओं के लिए चुना गया था. बाद में परिस्थितियां बदलने के बाद फिल्म की कास्ट पूरी तरह बदल गई और आखिरकार पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार और मधुबाला इस ऐतिहासिक फिल्म का हिस्सा बने.

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के.आसिफ ने 1945 में 'फूल' से निर्देशन की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने 'मुगल-ए-आजम' बनाई. बाद के सालों में उन्होंने 'सस्ता खून महंगा पानी' और 'लव एंड गॉड' पर भी काम शुरू किया, लेकिन दोनों फिल्में उनके जीवनकाल में पूरी नहीं हो सकीं. इनमें 'लव एंड गॉड' उनके निधन के कई साल बाद रिलीज हुई. निर्माता के तौर पर उनका नाम 'हलचल' (1951) से भी जुड़ा रहा.
परफेक्शन के लिए किसी भी हद तक चले जाते थे
के. आसिफ अपनी बारीकी और परफेक्शन के लिए मशहूर थे. 'मुगल-ए-आजम' के शीश महल सेट से लेकर युद्ध के भव्य दृश्यों तक, हर फ्रेम को खास बनाने पर उन्होंने भरपूर मेहनत की. फिल्म के युद्ध वाले दृश्यों में भारतीय सेना के जवानों, हजारों घोड़ों और ऊंटों का इस्तेमाल किया गया था. वहीं 'प्यार किया तो डरना क्या' जैसे गाने पर उस दौर में करीब 10 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि उतनी रकम में उस समय पूरी फिल्म बन जाती थी.
'मुगल-ए-आजम' ने के. आसिफ को हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े फिल्मकारों की कतार में खड़ा कर दिया. रिलीज के 65 साल बाद भी यह फिल्म अपनी भव्यता, संवाद, संगीत और निर्देशन के लिए याद की जाती है. यही वजह है कि आज भी जब भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्मों की बात होती है, तो के. आसिफ और 'मुगल-ए-आजम' का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है.
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