हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में आनंद बक्शी का नाम आने से पहले कोई चर्चा अधूरी सी लगती है. हजारों यादगार गीत लिखने वाले इस गीतकार का फिल्मी सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा. महज 150 रुपये से शुरू हुई उनकी फिल्मी शुरुआत बाद में उन्हें हिंदी सिनेमा का एक बड़ा नाम बना दिया. आनंद बक्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को अविभाजित भारत के रावलपिंडी में हुआ था. उनका असली नाम आनंद प्रकाश बख्शी था. देश के बंटवारे के समय परिवार भारत आ गया. बचपन में मां की मृत्यु और विभाजन के दुख ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा.
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मुंबई की राह और पहला मौका
उन्होंने भारतीय सेना में सेवा की और जबलपुर के सिग्नल कोर में तैनात रहे. सेना में रहते हुए वे कविताएं लिखते, साथियों को सुनाते और नाटकों में भाग लेते थे. यहीं से उनका सपना पनपा कि वे एक कलाकार बनेंगे. पहली बार मुंबई जाने पर उन्हें सफलता नहीं मिली. निराश होकर वे सेना में लौट गए, लेकिन गीत लिखने का जुनून उनके अंदर जिंदा रहा. 1956 में उन्होंने एक बार फिर मुंबई जाने का फैसला किया. इस बार दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ.
‘भला आदमी' से मिला मौका
मुंबई के संघर्ष भरे दिनों में भगवान दादा ने उन्हें फिल्म ‘भला आदमी' में गीत लिखने का मौका दिया. आनंद बक्शी ने इस फिल्म के लिए चार गीत लिखे और मात्र 150 रुपये मेहनताना मिला. उनका पहला रिकॉर्डेड गीत था, “धरती के लाल, न कर इतना मलाल…”. इस छोटे से ब्रेक ने उनके लिए फिल्म उद्योग का दरवाजा खोल दिया. शुरुआती दिनों में काम मिलना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 1965 में फिल्म ‘जब जब फूल खिले' ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई. फिल्म के गीत “परदेसियों से ना अंखियां मिलाना”, “ये समां समां है ये प्यार का” और “ना ना करते प्यार” आज भी लोगों की जुबान पर हैं.
सुपरहिट फिल्में के लिए लिखे गाने
इसके बाद आनंद बक्शी ने आराधना, अमर प्रेम, कटी पतंग, शोले, हरे रामा हरे कृष्णा, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, ताल और गदर: एक प्रेम कथा जैसी शानदार फिल्में के लिए खूबसूरत गाने लिखे. आनंद बक्शी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे आसान भाषा में गहरे भावों को पिरो देते थे. आम आदमी आसानी से उनके गीतों से जुड़ जाता था. उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया. लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, आशा भोसले जैसी आवाजों ने उनके गीतों को अमर बना दिया. उन्हें चार बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. 30 मार्च 2002 को बीमारी के कारण आनंद बक्शी का निधन हो गया, लेकिन उनके गीत आज भी दिलों में जीवित हैं.
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