सितारे रोज टूटते हैं, रविवार को आसमान टूट पड़ा. हिंदी फिल्मों के पार्श्व संगीत का वह आसमान जो आशा भोसले की आवाज़ से, उनके गीतों से बनता था. जिस दौर में हिंदुस्तान में लड़कियों को घरों के भीतर रहना, कम बोलना, कम हंसना सिखाया जाता था, उस दौर में आशा भोसले की खिलखिलाती आवाज विद्रोह का वह आसमान बनाती थी जिसकी छांव में इन लड़कियों ने हंसना, बोलना, प्रेम करना, उदास होना और बदले लेना सीखा, अपने सपने सजाए और अपना जीवन जिया.
लता मंगेशकर का मूल स्वर समर्पण का है तो आशा भोसले का मूल स्वर विद्रोह का है. यह विद्रोह कितना बेशकीमती था, यह उस दौर के सिने दर्शक समझ सकते हैं, वे कई-कई पीढ़ियां समझ सकती हैं जिन्होंने इन गीतों के साये में अपने हिस्से का आpeदी जी ली, अपने हिस्से के विद्रोह की कल्पना की.
संगीत मर्मज्ञ पिता दीनानाथ मंगेशकर के परिवार में 1933 में पैदा हुईं आशा भोसले चार बहनों में तीसरे नंबर पर थीं- लता मंगेशकर के बाद मीना मंगेशकर, फिर आशा भोसले और अंत में उषा मंगेशकर भाई. इन सबके साथ एक भाई हृदयनाथ मंगेशकर. संगीत का यह बेहद समृद्ध परिवार आने वाले वर्षों में पूरे देश के सुरों को सींचता रहा.
पिता दीनानाथ की मृत्यु के बाद मंगेशकर बहनों को बहुत कम उम्र से ही संघर्ष करना पड़ा. आशा भोसले महज 10 साल की उम्र में मराठी फिल्म माझा बल के लिए गाने चली आईं. यह 1943 का साल था. आने वाले वर्षों में हिंदी सिनेमा में आशा भोसले के खनकते हुए स्वर ने अपनी जगह बनाई. पचास और साठ के उन दशकों में बड़ी बहन लता मंगेशकर के अलावा गीता दत्त, शमशाद बेगम, सुरैया और सुमन कल्याणपुरे जैसी पक्की गायिकाओं के बीच आशा भोसले की खिलखिलाती-खनकदार आवाज ने एक अलग पहचान बनाई. ओपी नैयर ने नया दौर फिल्म के लिए आशा भोसले से जो गाने गवाए, वे जैसे वाकई नए दौर की पहचान बन गए. मांग के साथ तुम्हारा या उड़े जब-जब जुल्फें तेरी या फिर साथी हाथ बढ़ाना जैसे गीत अब भी सुने जाते हैं.
गायकी का यह सिलसिला लगातार परवान चढ़ता गया. ओपी नैयर के अलावा आरडी बर्मन ने भी आशा भोसले की आवाज का बेहतरीन इस्तेमाल किया. फिल्में आती रहीं गीत आते रहे, लड़कियां उन पर झूमती-थिरकती रहीं.
सत्तर और अस्सी के दशकों के बाद जब संगीत का मिजाज बदला, जब सिनेमा में आत्मा के साथ-साथ थिरकती हुई कायाओं का दौर चल पड़ा तो आशा भोसले की मादक-मांसल आवाज ने भी गजब ढाया. बाद में डिस्को का दौर आया, इक्कीसवीं सदी के तेज रफ्तार गीत आए, लेकिन आशा भोसले लगातार बनी रहीं.
इस बीच आशा भोसले की आवाज अपने लिए नई सरहदें भी खोजती और बनाती रही. उमराव जान की गजलें जिन्होंने सुनी वो मान गए कि आशा भोसले से बेहतर आवाज इन गजलों के लिए कोई हो ही नहीं सकती.
और फिर आया इजाजत का वह गीत, मेरा कुछ सामान लौटा दो. कहते हैं गुलजार ने जब आरडी बर्मन को यह गीत दिया तो वे भड़क गए कि कल तुम अखबार की कतरन लाकर कहोगे कि संगीतबद्ध कर दूं. लेकिन आशा की कांपती आवाज ने इस गीत में वह जादू पैदा किया कि अब भी एक सौ सोलह चांद की रातें जगमग करने लगती हैं.
इक्कीसवीं सदी की युवा पीढ़ी को बदलती तकनीक के साथ जब रिमिक्स का शौक चढ़ा तो उन्होंने अपने लिए आशा भोसले की आवाज को ही चुना.
आखिर यह विद्रोह की आवाज थी, युवा धड़कनों की आवाज थी, नएपन को दस्तक देती आवाज थी, अकुंठ भाव से प्रेम के लिए पुकारती आवाज थी- जो हमेशा युवा बनी रहेगी- और आशा भोसले को हमारे लिए हमेशा बनाए रखेगी.
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