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61 साल पहले डाकुओं की फिल्म में 2 शेर से ही बन गया सदाबहार गीत, मीना कुमारी और राजकुमार की दिलकश केमेस्ट्री ने बनाया अमर

मोहम्मद रफी साहब ने अपने करियर में कई सदाबहार गीत गाए, लेकिन उनके करियर का एक गाना ऐसा भी है जो अधूरा ही बना और अधूरा ही गाया भी. तो आइए जानते हैं इस अधूरे गाने की पूरी कहानी.

61 साल पहले डाकुओं की फिल्म में 2 शेर से ही बन गया सदाबहार गीत, मीना कुमारी और राजकुमार की दिलकश केमेस्ट्री ने बनाया अमर
61 साल पहले बना था सदाबहार गीत, जो आज भी है अधूरा.

बात जब भी हिंदी के सदाबहार गानों की आती है, खासकर 70s के गानों की तो वो हमारे दिल तक उतर जाते हैं. उनका हर एक शब्द, हर एक बोल ऐसा लगता है मानो कि हमारे लिए ही लिखा गया है. अब जब बात गानों की हो रही है तो रफी साहब को कैसे भूल सकते हैं. उनके गाए हुए गानों में एक अलग ही मदहोशी, एक अलग ही खनक थी. जो लोगों के जहन में उतर जाया करती थी. रफी साहब ने अपने करियर में कई गीत गाए, जो लोगों को आज भी याद हैं और लोग उनको गुनगुनाते हैं. 

क्या आपको पता है रफी साहब के करियर का एक ऐसा गाना जो आज तक अधूरा है? जी हां, आपको शायद यकीन न हो लेकिन मोहम्मद रफी ने एक ऐसा गाना गाया जिसमें उनकी खनकती आवाज ने दिलों के तार हिला दिए और मीना कुमारी-राजकुमार की दिलकश केमेस्ट्री ने इसे अमर बना दिया. हम बात कर रहे हैं 1965 में आई डाकुओं की फिल्म 'काजल' के गीत 'छू लेने दो नाजुक होठों को' की. आइए जानते हैं अधूरे गाने की पूरी कहानी.

आखिर क्यों अधूरा है ये सदाबहार गाना

आपने आज तक थ्रिलर फिल्मों के बारे में सुना होगा, लेकिन इस गाने के बनने की कहानी भी किसी थ्रिलर से कम नहीं है. दरअसल फिल्म 'काजल' के डायरेक्टर राम माहेश्वरी को फिल्म के सीन के लिए बस दो लाइनें चाहिए थीं. जिसके लिए महान शायर साहिर लुधियानवी ने इस सीन के लिए दो शेर लिख दिए. उनकी कलम का जादू ऐसा छाया कि इन दो शेरों से ही गाना बन गया.

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फिल्म के जिस सीन के लिए शायरी चाहिए थी उसमें राज कुमार, मीना कुमारी को शराब ऑफर करते हैं. सब कुछ पहले से तय था. बस अब स्टूडियो में इसको रिकॉर्ड करना था. लेकिन वहां पर कुछ ऐसा हुआ, जिसने इतिहास बदल दिया. जिससे रफी साहब की आवाज, साहिर लुधियानवी के बोल और रवि साहब की धुन ने जो जादू चलाया कि ये गाना सीधे रूह में उतर गया.

साहिर लुधियानवी ने क्यों नहीं किया पूरा

शायरी तैयार थी. म्यूजिक डायरेक्टर इसके लिए बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार कर रहे थे. लेकिन तभी उन्होंने एक ऐसी मेलोडी तैयार की जो उन्हें खुद इतनी पसंद आई कि उन्होंने डायरेक्टर से जिद की कि इन लाइन्स को सिर्फ शायरी न रहने दिया जाए, बल्कि इससे गाना बन सकता है. लेकिन डायरेक्टर एक अलग ही उधेड़-बुन में लगे थे कि रोमांटिक गाना राजकुमार पर सूट करेगा या नहीं. आखिर में वो मान गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि गाना इन्हीं दो शेरों का इस्तेमाल कर के ही बनेगा.

आखिर सब फाइनल होने के बाद आया रिकॉर्डिंग का दिन और माइक के सामने आते ही मोहम्मद रफी साहब ने अपनी आवाज का ऐसा जादू बिखेरा जिसको सुनकर वहां मौजूद हर इंसान उन गाने में खो सा गया. इन शेर के बोल, उसका संगीत और रफी साहब की आवाज में दर्द, कशिश और मदहोशी ने वहां के हर इंसान को अपना दीवाना बना लिया. इन लाइनों को सुनते ही स्टूडियो में बैठे प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स को लगा कि इसे और सुना जाना चाहिए. उन्होंने डायरेक्टर को घेर लिया और कहा कि इतना सुंदर गाना और सिर्फ दो लाइने. हमें इसका एक और अंतरा चाहिए.

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तीसरे अंतरे को लिखने के लिए साहिर लुधियानवी को ढूंढा जाने लगा, लेकिन वो नहीं मिले. इस तरह से इस गाने को अधूरा ही रिकॉर्ड कर लिया गया. लेकिन रफी साहब ने एक बार फिर से अपना कमाल दिखाया और गाने को इस अंदाज में खत्म किया कि कोई समझ ही नहीं पाया कि ये सिर्फ कुछ लाइनें थी. क्या आपको भी पहले ऐसा कभी लगा था कि ये एक अधूरा गाना है. इस गाने की एक और बात है जो शायद ही लोगों को पता हो. रफी साहब ने कभी भी शराब को छुआ तक नहीं था, लेकिन इसके बाद भी इस गाने में एक नशीलापन है. तो चलिए जानते हैं इस अधूरे गाने की पूरी कहानी.

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