होर्मुज में कुछ बड़ा होने वाला है? 3 हजार स्पेशल कमांडो क्यों भेज रहे ट्रंप, क्या है प्लानिंग

  • 8:32
  • प्रकाशित: मार्च 25, 2026

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर दिखाई दे रहा है. एक तरफ जहां 5 दिनों के युद्धविराम (Ceasefire) की घोषणा की गई है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका की ओर से ईरान पर दबाव बनाने की सबसे बड़ी सैन्य तैयारियों की तस्वीरें सामने आ रही हैं. जानकारी के मुताबिक, अमेरिका करीब 3,000 स्पेशल कमांडो को मिडिल ईस्ट क्षेत्र में भेजने की योजना पर काम कर रहा है. इस फोर्स में 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिक भी शामिल हैं, जिसे अमेरिकी सेना की सबसे तेज़ प्रतिक्रिया देने वाली यूनिट्स में गिना जाता है.

होर्मुज की ओर बढ़ते युद्धपोत, बढ़ा दबाव

अमेरिकी युद्धपोत भी लगातार होरमुज जलडमरूमध्य की तरफ बढ़ रहे हैं. यह वही रास्ता है जहां से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल का व्यापार होता है. ऐसे में युद्धविराम के बीच इतने बड़े पैमाने पर सैनिकों और युद्धपोतों की तैनाती कई सवाल खड़े कर रही है. इससे पहले भी अमेरिका ने क्षेत्र में मरीन सैनिकों को भेजा था, जिनका मकसद अमेरिकी नागरिकों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बताया गया था. लेकिन अब 82वीं एयरबोर्न डिवीजन जैसी हाई-रिस्क ऑपरेशन फोर्स की तैनाती को एक स्ट्रॉन्ग वॉर्निंग सिग्नल के तौर पर देखा जा रहा है.

अमेरिका का साफ संदेश – शांति या कार्रवाई

अमेरिका की ओर से साफ संदेश दिया गया है कि ईरान या तो शांति प्रस्ताव को माने या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे. अमेरिकी स्पेशल फोर्स को उन हालात के लिए तैयार किया जाता है, जहां अप्रत्याशित और तेज़ कार्रवाई की जरूरत होती है. चाहे वह ग्राउंड ऑपरेशन हो, एयरबोर्न अटैक हो या समुद्री मिशन.

सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका स्टेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को पूरी तरह खोलना चाहता है. फिलहाल ईरान की वजह से इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले तेल टैंकर और कार्गो शिप्स की संख्या बेहद कम हो गई है, जिससे वैश्विक तेल संकट का खतरा बढ़ा है.

कौन-कौन से युद्धपोत तैनात?

अमेरिकी नौसेना के कई बड़े युद्धपोत इस ऑपरेशन का हिस्सा हैं, जिनमें शामिल हैं:

USS Boxer
USS Portland
USS Comstock
USS Tripoli
USS New Orleans

इन युद्धपोतों पर हजारों मरीन कमांडो तैनात हैं. खास बात यह है कि इनमें ऐसे एयरक्राफ्ट भी मौजूद हैं जो स्टील्थ टेक्नोलॉजी से लैस हैं और रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते.

18 घंटे में किसी भी मिशन के लिए तैयार

82वीं एयरबोर्न डिवीजन की खासियत यह है कि इसके जवान 18 घंटे के भीतर दुनिया के किसी भी हिस्से में ऑपरेशन के लिए तैनात किए जा सकते हैं. ये सैनिक पैराशूट, हेलीकॉप्टर या एयरलिफ्ट के ज़रिए ग्राउंड ऑपरेशन को अंजाम देने में माहिर होते हैं. अफगानिस्तान, इराक और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में अमेरिकी स्पेशल फोर्स पहले भी ऐसे ऑपरेशन कर चुकी है, जिससे ईरान पर दबाव और बढ़ गया है.

बातचीत जारी, लेकिन खतरा बरकरार

भले ही अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत और प्रस्तावों का दौर जारी है, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि अमेरिका किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सैन्य मूवमेंट सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि ईरान को बातचीत की मेज पर लाने की रणनीति का हिस्सा है. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह रणनीति शांति की तरफ ले जाती है या फिर मिडिल ईस्ट एक और बड़े टकराव की ओर बढ़ेगा.

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