होर्मुज को लेकर अब अमेरिका से भिड़ा सऊदी अरब? दोस्ती में पड़ी दरार!

  • 7:48
  • प्रकाशित: अप्रैल 14, 2026

वॉशिंगटन/तेहरान:अमेरिकी मीडिया संस्थान वॉल स्ट्रीट जर्नल के हवाले से बड़ी खबर सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब होर्मुज जलडमरूमध्य में लागू अमेरिकी नाकेबंदी के खिलाफ है. सऊदी अरब ने अमेरिका से यह नाकेबंदी खत्म करने और ईरान के साथ फिर से बातचीत शुरू करने को कहा है.

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी अरब अमेरिका पर लगातार दबाव बना रहा है. सऊदी अधिकारियों को आशंका है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम हालात को और अधिक बिगाड़ सकता है. इससे ईरान के साथ तनाव बढ़ेगा और जवाबी कार्रवाई में ईरान अन्य अहम समुद्री मार्गों को भी बाधित कर सकता है.

बाब‑अल‑मंदेब पर मंडराता खतरा
सऊदी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका की नाकेबंदी के जवाब में ईरान लाल सागर में स्थित रणनीतिक बाब‑अल‑मंदेब जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है. बाब‑अल‑मंदेब वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद अहम समुद्री चोक‑प्वाइंट माना जाता है.
अमेरिका द्वारा लगाई गई यह नाकेबंदी ईरान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से की गई है. हालांकि सऊदी अरब का मानना है कि इसका उल्टा असर पूरे खाड़ी क्षेत्र पर भी पड़ सकता है.

होर्मुज नाकेबंदी से कौन‑कौन से बंदरगाह होंगे प्रभावित
ईरान के प्रमुख बंदरगाह

बंदर अब्बास
बंदर‑ए‑लंगाह
शाहिद राजाई
जास्क
खारग आइलैंड
बुशहर पोर्ट

यूएई के बंदरगाह

जेबेल अली
खलीफा पोर्ट
मीना राशिद
पोर्ट खालिद

सऊदी अरब के बंदरगाह

रास तनूरा
दबा
किंग फहद पोर्ट

अन्य खाड़ी देश

ओमान: प्रमुख बंदरगाह पूरी तरह प्रभावित हो सकता है
कतर: रास लफान, मेसईद
कुवैत: शुवैख, शुएबा, मीना अल‑अहमदी
इराक: उम्म कसर, अल‑बसरा

अगर होर्मुज में नाकेबंदी होती है तो इन सभी देशों की तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर गंभीर असर पड़ेगा.

पाइपलाइन विकल्प और असली नुकसान
विशेषज्ञों के मुताबिक कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई और सऊदी अरब के पास वैकल्पिक तेल पाइपलाइन मौजूद हैं. इनमें शेल लाइन, ADOP लाइन और ईस्ट‑वेस्ट पाइपलाइन शामिल हैं.
हालांकि ये पाइपलाइन होर्मुज से गुजरने वाले रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल की पूरी भरपाई नहीं कर सकतीं, लेकिन कुछ हद तक राहत जरूर देती हैं. इसके उलट ईरान के पास केवल एक प्रमुख पाइपलाइन है, जो बंदर अब्बास को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ती है. ऐसे में किसी भी टकराव में ईरान को ज्यादा नुकसान होने की आशंका है.

होर्मुज संकट से नई जंग की आशंका
इस बीच संकेत मिल रहे हैं कि इजरायल फिर से बड़े सैन्य हमले की तैयारी कर रहा है. यह किसी से छिपा नहीं है कि इजरायल लगातार सीजफायर के खिलाफ रहा है. लेबनान में भी सीजफायर के बावजूद इजरायल ने हमले तेज कर रखे हैं.

7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिन के सीजफायर का ऐलान हुआ था, लेकिन पहले दिन से ही इसके टूटने की आशंका जताई जा रही थी.

नेतन्याहू के युद्ध संकेत
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू खुद दक्षिणी लेबनान की सीमा पर पहुंचे. उनके साथ रक्षा मंत्री इस्राइल काट्ज और सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एयाल ज़मीर भी मौजूद थे.
नेतन्याहू ने कहा कि उन्होंने मिडल ईस्ट का चेहरा बदल दिया है. उनके मुताबिक ईरान और उसके सहयोगी इजरायल को खत्म करने आए थे, लेकिन अब वे खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं. इसे उन्होंने इजरायल के लिए बड़ी उपलब्धि बताया.

इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आईडीएफ ने सैन्य अलर्ट का स्तर काफी बढ़ा दिया है और सैनिकों को ईरान के साथ युद्ध दोबारा शुरू करने के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं.

अमेरिका भी लिमिटेड स्ट्राइक पर विचार करता हुआ
वॉशिंगटन पोस्ट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामाबाद में अमेरिका‑ईरान वार्ता विफल रहने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके सलाहकार ईरान पर सीमित सैन्य हमलों के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं.

इन संभावित हमलों का उद्देश्य ईरान पर दबाव बनाना है ताकि वह अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़े और होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शुल्क के खोलने की अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करे. संकेत यह भी हैं कि ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है.

ईरान का सख्त जवाब
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि पिछले चार वर्षों में पहली बार दोनों देशों के बीच उच्चतम स्तर पर इतनी गंभीर बातचीत हुई. अरागची के मुताबिक दोनों पक्ष समझौते के बेहद करीब थे.

उन्होंने आरोप लगाया कि जब समझौता अंतिम चरण में था, तभी अमेरिका ने अचानक अपनी मांगें बढ़ा दीं और बातचीत की शर्तें बदल दीं. अरागची ने कहा कि अमेरिका ने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया है.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने भी कहा कि अगर अमेरिका अपनी तानाशाही मानसिकता छोड़कर ईरानी राष्ट्र के अधिकारों का सम्मान करना शुरू करे, तो समझौता करना मुश्किल नहीं है.

संबंधित वीडियो