इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों के संबंध में एक अहम फैसला सुनाया है. दरअसल, पारिवारिक विवाद के एक मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी शिक्षित है और कमाने की क्षमता (Ability to Earn) रखती हों, तब भी अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त करने का उनके पास अधिकार होगा. इस आधार पर उन्हें गुजारा भत्ता से वंचित नहीं किया जा सकता. यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक बड़ी कानूनी राहत मानी जा रही है, जो वैवाहिक कलह के बाद आर्थिक रूप से असुरक्षित महसूस करती हैं.
अदालत ने एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. दरअसल, अक्सर पति पक्ष की ओर से Cr.P.C. की धारा 125 की आड़ लेकर यह दलील दी जाती है कि पत्नी उच्च शिक्षित है या उसके पास डिग्री है, इसलिए वह अपना खर्च खुद उठा सकती है और उसे भरण-पोषण (Maintenance) नहीं मिलना चाहिए. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब इस तर्क को खारिज करते हुए महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता दी है.
वास्तविक आय को माना जाएगा ठोस आधार
कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण अंतर को रेखांकित किया है. अदालत का कहना है कि 'कमाने की काबिलियत रखना' और 'वास्तविक रूप से लाभप्रद रोजगार में होना' दो अलग बातें हैं. जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि पत्नी वर्तमान में किसी काम से इतनी आय प्राप्त कर रही है, जो उसके जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, तब तक पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता है.
ससुराल के जैसा जीवन जीने मिला अधिकार
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि भरण-पोषण का निर्धारण करते समय यह देखना जरूरी है कि क्या महिला आज भी उसी जीवन स्तर (Standard of Living) को बनाए रखने में सक्षम है, जैसा वह अपने ससुराल में जी रही थी. कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग होने के बाद महिला की स्थिति दयनीय न हो जाए. अपने फैसले को और मजबूती देने के लिए हाईकोर्ट ने 2008 के प्रसिद्ध 'चतुर्भुज बनाम सीता बाई' मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित सिद्धांतों का संदर्भ दिया.
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दरअसल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट माना था कि अपना गुजारा करने में असमर्थ होने का मतलब यह कतई नहीं है कि महिला बिल्कुल सड़क पर आ जाए या बेसहारा हो जाए. यदि पत्नी की कमाने की क्षमता है, तब भी पति की जिम्मेदारी कम नहीं होती. तब कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि कानून का उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना है, न कि केवल तकनीकी आधार पर राहत रोकना.
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