- मध्यप्रदेश में साल 2025 में बाघों की मौतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे।
- सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स का गठन किया गया है, 24 युवाओं को कमांडो प्रशिक्षण मिलेगा
- इस फोर्स को पुलिस ट्रेनिंग स्कूल पचमढ़ी में शारीरिक और जंगल कमांडो की ट्रेनिंग दी जाएगी
MP Tiger Protection Force: मध्यप्रदेश, जिसे दुनिया 'टाइगर स्टेट' के रूप में जानती है, आज अपने ही गौरव को बचाने के संघर्ष से गुजर रहा है.यहां आज एक गंभीर सवाल के सामने खड़ा है, क्या बढ़ती संख्या के बावजूद उसके बाघ सुरक्षित हैं? साल 2025 में 54 बाघों की रिकॉर्ड मौतों और 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 18 से अधिक बाघों के शिकार और मृत्यु ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है. इसी संकट के बीच वन मुख्यालय भोपाल ने एक बड़ा फैसला लिया है.सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में एक विशेष 'टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स' (TPF) का गठन किया गया है, जिसके 24 चयनित युवाओं को पुलिस ट्रेनिंग स्कूल (PTS) पचमढ़ी में 'जंगल कमांडो'के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा. यह पहल न केवल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि अब सामान्य निगरानी से बाघों को बचाना मुमकिन नहीं रह गया है.
संकट में जंगल का राजा: मौतों के आंकड़ों ने झकझोरा
दरअसल मध्यप्रदेश में बाघों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं हवा में नहीं हैं. प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद वर्ष 2025 सबसे घातक साबित हुआ,जब प्रदेश ने 54 बाघों को खो दिया. 2026 की शुरुआत भी उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है. सतपुड़ा और कान्हा जैसे विश्व प्रसिद्ध रिजर्व में अवैध शिकार, जहर देने, करंट लगाने और सीमित होते क्षेत्र (Territorial Fight) की वजह से लगातार बाघ जान गंवा रहे हैं. सतपुड़ा में महज 24 घंटे के भीतर दो बाघों की मौत ने वन विभाग की पुरानी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए थे, जिसके बाद अब सुरक्षा के "रिएक्टिव" (घटना के बाद कार्रवाई) मॉडल को बदलकर "प्रोएक्टिव" (घटना से पहले रोकथाम) बनाने की तैयारी शुरू हुई है.
पुलिस की तर्ज पर होगी 'जंगल वॉरियर्स' की ट्रेनिंग
इस नई फोर्स को तैयार करने की जिम्मेदारी पुलिस प्रशिक्षण संस्थान को सौंपी गई है. एडीजी ट्रेनिंग राजाबाबू सिंह के अनुसार, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर के अनुरोध पर एक कस्टमाइज्ड ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया जा रहा है. यह पहली बार है जब वन विभाग की किसी यूनिट के लिए पुलिस प्रशिक्षण शालाओं के द्वार खोले गए हैं. इसमें केवल शारीरिक फिटनेस ही नहीं, बल्कि 'जंगल सर्च' और 'गन फायरिंग' जैसे कड़े अभ्यास शामिल होंगे. एडीजी के मुताबिक, यदि जरूरत पड़ी तो सागर, ग्वालियर और उमरिया जैसे प्रशिक्षण केंद्रों में भी इस विशेष फोर्स को तैयार किया जाएगा, ताकि सुरक्षा का एक मजबूत घेरा तैयार हो सके.
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आधुनिक तकनीक और कानूनी दांव-पेंच से लैस होंगे जवान
प्रोटेक्शन फोर्स के लिए जो 30 दिनों का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, वह बेहद आधुनिक है. इसे दो हिस्सों में बांटा गया है. आंतरिक प्रशिक्षण के तहत जवानों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की बारीकियों, मानवाधिकार, अपराध जांच और इंटेलिजेंस कलेक्शन की शिक्षा दी जाएगी. इतना ही नहीं, शिकारियों के हाईटेक नेटवर्क को तोड़ने के लिए जवानों को साइबर क्राइम, ड्रोन संचालन, जीपीएस ट्रैकिंग और सूचना प्रौद्योगिकी का भी ज्ञान दिया जाएगा. इसका उद्देश्य यह है कि वन रक्षक सिर्फ लाठीधारी गार्ड न रहकर एक चतुर जांच अधिकारी की तरह काम कर सकें.
'एम्बुश' और 'काउंटर एम्बुश' की तैयारी
मैदानी स्तर पर इन युवाओं को एक कमांडो की तरह ढालने के लिए बाह्य प्रशिक्षण काफी कठिन रखा गया है. 120 पीरियड्स के इस कोर्स में उन्हें फील्ड क्राफ्ट, जंगल मूवमेंट, मैप रीडिंग और हथियार चलाने का गहन अभ्यास कराया जाएगा. इसमें तीन दिन का एक कठिन 'जंगल कैंप' भी शामिल है, जहां उन्हें सिखाया जाएगा कि कैसे शिकारियों के लिए 'एम्बुश' (घात लगाना) लगाया जाए और अगर वे खुद घिर जाएं तो 'काउंटर एम्बुश' के जरिए कैसे बाहर निकलें. यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मध्यप्रदेश अब वन सुरक्षा को एक ऑपरेशनल युद्ध की तरह देख रहा है.
सुरक्षा कवच या सिर्फ व्यवस्था की एक और परत?
मध्यप्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या एक सुखद पहलू है, लेकिन यही वृद्धि अब उनके लिए संकट भी बन रही है. जंगल का दायरा सिमट रहा है और मानव हस्तक्षेप बढ़ रहा है. ऐसे में 'टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स' एक उम्मीद की किरण जरूर है, लेकिन असली चुनौती क्रियान्वयन की होगी. जब एक 'टाइगर स्टेट' को विशेष बल की जरूरत पड़ती है, तो यह मान लेना चाहिए कि खतरा अब सामान्य स्तर से ऊपर जा चुका है. अब सारा दारोमदार पचमढ़ी से निकलने वाले इन 24 जवानों और भविष्य की रणनीतियों पर है कि वे बाघों के लिए वास्तव में सुरक्षा कवच बन पाते हैं या नहीं.
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