Video: नर्मदा में बहाया 11, 000 लीटर दूध ! 10 लाख कुपोषित बच्चों वाले राज्य में ऐसे 'महाअभिषेक' पर छिड़ी बहस

Milk Waste Viral Video: सीहोर में नर्मदा नदी में 11,000 लीटर दूध बहाने पर विवाद छिड़ गया है. आस्था के इस बड़े आयोजन और मध्य प्रदेश में 10 लाख कुपोषित बच्चों की हकीकत के बीच गंभीर सवाल उठ रहे हैं. जानिए विशेषज्ञों और श्रद्धालुओं की पूरी राय इस विशेष रिपोर्ट में.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में पातालेश्वर महादेव मंदिर में 11,000 लीटर दूध नर्मदा नदी में
  • यह अनुष्ठान 21 दिनों तक चला और इसमें भक्तों ने धार्मिक आस्था के तहत दूध का विशाल अभिषेक किया।
  • राज्य में लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिससे बड़ी मात्रा में दूध बहाने को लेकर सामाजिक विवाद उत्पन्न हुआ।
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

Narmada Milk Waste: मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी मानी जाने वाली नर्मदा नदी के आंचल में आस्था और संसाधनों के उपयोग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिसमें हजारों लीटर दूध सीधे नदी की लहरों में बहाते हुए दिखाया गया है. यह दृश्य जहां एक ओर श्रद्धालुओं के लिए अटूट श्रद्धा और एक भव्य अनुष्ठान का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर इसने पर्यावरणविदों और समाज के प्रति जागरूक वर्ग को चिंता में डाल दिया है. सवाल सिर्फ आस्था का नहीं है, बल्कि उस राज्य की जमीनी हकीकत का भी है जहां आज भी लाखों बच्चे कुपोषण की मार झेल रहे हैं. यह पूरा मामला अब धर्म, जनकल्याण और पारिस्थितिकी तंत्र के बीच एक बड़े विवाद का रूप ले चुका है, जिसने प्रशासन से लेकर आम जनता तक को दो धड़ों में बांट दिया है.

सीहोर के पातालेश्वर महादेव मंदिर में हुआ भव्य आयोजन

NDTV की पड़ताल में यह साफ हुआ है कि वायरल वीडियो सीहोर जिले के सतदेव गांव का है, जहां श्री दादाजी दरबार पातालेश्वर महादेव मंदिर में चैत्र नवरात्रि के दौरान एक विशाल धार्मिक अनुष्ठान किया गया. यह आयोजन 18 मार्च से 7 अप्रैल तक पूरे 21 दिनों तक चला. इस दौरान महायज्ञ, शिव महापुराण कथा और दुर्गा पाठ जैसे कई कार्यक्रम हुए. आयोजकों ने बताया कि इस भव्य आयोजन के लिए 5 एकड़ में विशाल पंडाल बनाया गया था और करीब 41 टन पूजन सामग्री, जड़ी-बूटियों और सोने-चांदी तक का उपयोग किया गया. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह सप्तऋषियों की प्राचीन तपोभूमि है, जहां भगवान शिव प्रकट हुए थे, इसलिए यहां की महिमा भक्तों के लिए सर्वोपरि है.

Advertisement

11,000 लीटर दूध का 'विशाल अभिषेक' और श्रद्धालुओं का पक्ष

हालांकि विवाद की मुख्य वजह वह अनुष्ठान बना जिसमें 11,000 लीटर दूध नर्मदा में अर्पित किया गया. श्री शिवानंद महाराज के भक्त पवन पवार का कहना है कि बाबा का नर्मदा जी के प्रति लगाव अनन्य है. वे खुद नंगे पैर परिक्रमा करते हैं और जनकल्याण के लिए काम करते हैं. उनके अनुसार, रोजाना 151 लीटर और एक विशेष दिन 1100 लीटर दूध से अभिषेक होता था, लेकिन बुधवार को यह आंकड़ा 11,000 लीटर तक पहुंच गया. भक्तों का मानना है कि नर्मदा उनके लिए मां हैं और यह उनकी निजी आस्था का विषय है, जिसे वे अपने संसाधनों से पूरा कर रहे हैं. उनके लिए यह एक दुर्लभ आध्यात्मिक संगम है जिसे तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए.
ये भी पढ़ें: 'बचपन' में शादी के बाद किसी और से प्यार, पत्नी ने घर में ही पति को मरवा डाला, बेटा खोने वाला परिवार दंग, हत्याकांड की कहानी 

कुपोषण की मार और संसाधनों की बर्बादी पर उठते सवाल

जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर विरोध के स्वर भी तेज हो गए. लोगों का कहना है कि मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जहां कुपोषण एक गंभीर समस्या है, वहां इतने बड़े पैमाने पर दूध बहाना समझ से परे है. आंकड़ों की बात करें तो हाईकोर्ट में दाखिल एक याचिका के अनुसार राज्य में 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं और 1.36 लाख से ज्यादा बच्चे तो बेहद गंभीर श्रेणी में आते हैं. वहीं 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं. आलोचकों का तर्क है कि यही दूध अगर गरीब और जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचता, तो यह सेवा किसी भी अनुष्ठान से बड़ी होती. हाल ही में कुछ बच्चों की मौत और पोषण आहार में हुए करोड़ों के कथित घोटाले की खबरों ने इस बहस की आग में घी डालने का काम किया है.

Advertisement

पर्यावरण और जलीय जीवों पर संभावित खतरा

सिर्फ सामाजिक ही नहीं, बल्कि इस मामले के पर्यावरणीय पहलू भी बेहद गंभीर हैं. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि नदी में भारी मात्रा में दूध डालने से पानी की गुणवत्ता खराब होती है. इससे पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) बढ़ जाती है और ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है. जब दूध पानी में सड़ता है, तो बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, जो मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं. नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) इससे बुरी तरह प्रभावित होता है. इस विवाद ने एक बार फिर यह चर्चा छेड़ दी है कि क्या हमारी धार्मिक परंपराओं को आधुनिक सामाजिक और पर्यावरणीय जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने की आवश्यकता है.
ये भी पढ़ें: Earthquake: बड़वानी में भूकंप के झटके, घर में लगे पंखे हिले, बर्तन गिरे, 3.6 रही तीव्रता; लोग घरों से बाहर निकले 

Featured Video Of The Day
Assam Elections: असम में चुनाव जारी, वोटिंग के बाद NDTV से क्या बोले गौरव गोगोई?