नक्सलियों की 'राजधानी' जगरगुंडा का बदलता सच: जो गेट कभी शाम 6 बजे बंद होता था वो अब 24 घंटे खुला है

Bastar Ground Report: नक्सलियों की 'राजधानी' कहे जाने वाले जगरगुंडा का ग्राउंड सच. जो गेट कभी शाम 6 बजे बंद हो जाता था, वह अब 24 घंटे खुला है. एनडीटीवी की विशेष टीम बस्तर के उस संवेदनशील इलाके में पहुंची, जो दशकों तक लाल आतंक का गढ़ रहा है.

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Jagargunda Naxal Area: देश से सशस्त्र नक्सलियों के खात्मे के लिए केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 की जो समयसीमा तय की थी, वह तारीख अब आ गई है. इसी ऐतिहासिक पड़ाव पर जमीनी सच जानने के लिए एनडीटीवी की टीम बस्तर के जगरगुंडा पहुंची. जगरगुंडा को कभी नक्सलियों की "अनौपचारिक राजधानी" कहा जाता था, जहां दाखिल होने का मतलब था सीधे मौत के मुंह में कदम रखना. यहां पहुंचने से पहले सीआरपीएफ (CRPF) का एक बड़ा लोहे का गेट आता है, जो कभी इलाके के लोगों के लिए जिंदगी और मौत की लकीर तय करता था. पहले यह गेट दिन में सिर्फ कुछ घंटों के लिए ही खुलता था. तब वहां से गुजरने वाली हर एक गाड़ी को रोका जाता था, सघन जांच होती थी और पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य था. शाम के 6 बजते ही इस गेट को बंद कर दिया जाता था, जिसके बाद यहां प्रवेश करना लगभग नामुमकिन सा हो जाता था. पूरा जगरगुंडा एक तरह से इसी कटीले घेरे के अंदर कैद था, जो उनके लिए सुरक्षित भी था और बेहद सीमित भी. उस गेट के ठीक बाहर कदम रखते ही नक्सलियों की डरावनी मौजूदगी हर समय हवाओं में महसूस होती थी.

24 घंटे खुला रहता है वो ऐतिहासिक गेट

अब वक्त बदला है और आज वह गेट अपनी जगह पर अब भी खड़ा है. लेकिन अब सबसे बड़ा और सुकून देने वाला बदलाव यह है कि वह गेट अब 24 घंटे आम जनता के लिए खुला रहता है. यह एक अकेला छोटा सा बदलाव ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है, लेकिन यह इस पूरे इलाके की मुकम्मल कहानी कतई नहीं है. एनडीटीवी की टीम जब इस ऐतिहासिक गेट को पार कर आगे बढ़ी, तो हमारे सामने एक ऐसा बीहड़ इलाका आया जो कभी मुख्य देश से पूरी तरह से कटा हुआ था. घने और रहस्यमयी जंगल आज भी ज्यों के त्यों मौजूद हैं, लेकिन खामोश रहने वाले सन्नाटे का मिजाज अब वैसा खौफनाक नहीं रहा. उस सन्नाटे में अब मौत का डर कम है और पुरानी खूनी यादें ज्यादा हैं. रास्ते में नक्सलियों द्वारा जलाई गई गाड़ियों के ढांचे, टूटे हुए पुराने पुल-पुलिया और जगह-जगह बारूदी विस्फोटों के गहरे काले निशान आज भी मौजूद हैं. ये निशान हर पल यह याद दिलाने के लिए काफी हैं कि कभी जगरगुंडा को बस्तर में नक्सल प्रभाव की 'अनौपचारिक राजधानी' का तमगा हासिल था. लेकिन इसी खौफनाक रास्ते पर चलते हुए आज एक दूसरी कहानी भी साफ दिखाई देती है, जो भले ही थोड़ी धीमी और असमान है, लेकिन बदलाव की इबारत एकदम साफ लिख रही है.

Jagargunda Naxal Area: कभी नक्सलियों की राजधानी कहा जाने वाला जगरगुंडा अब विकास की राह पर दौड़ पड़ा है. यहां बकायदा बैंक और ATM भी है.

तब का जगरगुंडा: कटा हुआ और भुला दिया गया इलाका

सालों तक जगरगुंडा का यह पूरा इलाका बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग-थलग और महफूज कटा रहा. 2000 के दशक के मध्य में जब नक्सल हिंसा अपने चरम पर थी और उसके जवाब में सलवा जुडूम का दौर शुरू हुआ, तब इस इलाके को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाले तीनों प्रमुख रास्ते पूरी तरह से बंद हो गए थे. हालात इस कदर बदतर हो गए थे कि स्कूल, आंगनवाड़ी और सरकारी राशन दुकान जैसी पूरी की पूरी बुनियादी व्यवस्था को यहां से करीब 70 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा के दोरनापाल में शिफ्ट करना पड़ गया था.इस खूनी संघर्ष के बीच स्थानीय मासूम लोगों को बड़े पैमाने पर विस्थापित होना पड़ा. कई लोग जान बचाने के लिए सरकारी राहत कैंपों में चले गए, तो जो चंद लोग अपने पुरखों की जमीन पर बचे रहे, वे दो पाटों के बीच पिसते हुए हर पल मौत के डर में जीते रहे. उन्हें एक तरफ नक्सलियों का खौफ था, तो दूसरी तरफ राज्य की पुलिस का डर सताता था.

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"नक्सलवाद ने सबकुछ तबाह कर दिया था"

पूर्व जिला पंचायत सदस्य अडम्मा मरकाम उस भयानक दौर को याद करते हुए सिहर उठती हैं. वह कहती हैं कि जगरगुंडा कभी आर्थिक रूप से बहुत मजबूत और बेहद विकसित जगह हुआ करती थी, जो दोरनापाल से भी काफी आगे थी. लेकिन साल 2000 के बाद खूनी नक्सलवाद ने यहां का सब कुछ तबाह कर दिया. सलवा जुडूम के समय सारे रास्ते बंद हो गए और यहां तक कि हम लोगों के लिए खाने-पीने तक की भारी कमी हो गई थी. 

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शिक्षा ने चुकाई सबसे बड़ी और दर्दनाक कीमत

इस खूनी अलगाव और जिद की सबसे बड़ी कीमत यहां कीशिक्षा व्यवस्था ने चुकाई. करीब 13 साल के लंबे अंतराल तक यहां का हायर सेकेंडरी स्कूल पूरी तरह से बंद रहा. बच्चों को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए 50 से 70 किलोमीटर दूर डोरनापाल जाना पड़ता था, जिसके चलते संसाधनों के अभाव में कई होनहार बच्चों ने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी. अरुण शुक्ला, जो खुद इसी भयानक और अनिश्चित दौर में पल-बढ़कर बड़े हुए हैं, बताते हैं कि हम लोग 10 से 12 किलोमीटर तक पैदल चलते थे ताकि आगे जाने का कोई महफूज रास्ता मिल सके. बारिश के दिनों में हम कीचड़ में बुरी तरह फंस जाते थे और आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए हमें अलग-अलग जगहों पर हॉस्टल ढूंढने के लिए भटकना पड़ता था.
 

Bastar Ground Report: जगरगुंडा में अब अच्छी सड़कें हैं. गांव वाले मुख्यालय तक आसानी से पहुंच पा रहे हैं.

अब का जगरगुंडा: फिर से बजती स्कूल की घंटी

आज वही जगरगुंडा धीरे-धीरे अपने घावों को भरकर फिर से मुख्यधारा से जुड़ रहा है. दंतेवाड़ा तक जाने वाली मुख्य सड़क अब पूरी तरह से खुल चुकी है. इसके अलावा डोरनापाल और बीजापुर के पुराने रास्ते भी अब सुचारू रूप से चालू हैं. जगह-जगह सुरक्षा बलों के नए कैंप स्थापित हैं, जिसके चलते जहां पहले सिर्फ खौफ का राज था, अब वहां कड़ी निगरानी का पहरा है. जगरगुंडा के ही रहने वाले और पेशे से शिक्षक शंकर राव इसे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव मानते हैं. वह कहते हैं कि पहले यहां पक्की सड़क नहीं थी और हर कदम पर बारूदी सुरंगों का गहरा डर बना रहता था. अब प्रशासन ने यहां बहुत अच्छा काम किया है और दंतेवाड़ा का रास्ता पूरी तरह खुल गया है. वह आगे बताते हैं कि अब हमारे इलाके में खुद का बैंक है, एटीएम की सुविधा है, अच्छे स्कूल हैं और मनरेगा जैसी बड़ी सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ भी ग्रामीणों को यहीं गांव में मिल रहा है. वहीं कृष्ण कुमार नाग भी इसी सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि सलवा जुडूम के समय हम पूरी तरह से दुनिया से कटे हुए थे. आज हम दोरनापाल, बीजापुर और दंतेवाड़ा से सीधे सड़क मार्ग से जुड़े हैं. हमारे यहां शिक्षा, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं में काफी बड़ा और क्रांतिकारी सुधार हुआ है.

13 साल के सन्नाटे के बाद आई खिलखिलाहट

लेकिन इन सब भौतिक बदलावों के बीच सबसे बड़ा और आंखों में आंसू ला देने वाला भावनात्मक बदलाव स्कूल का फिर से खुलना है. 13 साल के लंबे सन्नाटे के बाद यहां के स्कूल में फिर से बच्चों की खिलखिलाहट के साथ घंटी बजी है. अब यहां के मासूम बच्चे सुबह की सामूहिक प्रार्थना अपने ही वतन और गांव में करते हैं, किसी दूर अनजान शहर के पराए हॉस्टल में नहीं. जिस पीढ़ी ने सिर्फ उजड़ना और बिखराव देखा था, उसके लिए यह सिर्फ किताबी पढ़ाई नहीं है, बल्कि एक बिल्कुल नई और महफूज जिंदगी की शुरुआत है.

बीच का कड़वा सच 

तमाम अच्छी बातों के बावजूद जगरगुंडा की यह पूरी कहानी इतनी भी सरल या सपाट नहीं है. यह आज एक ऐसा संवेदनशील स्थान बन चुका है जो दो अलग-अलग समयकालों के बीच में अधूरा सा खड़ा है. एक वह समय है जो अपने सीने में दफन सारे खूनी जख्मों को याद रखता है और दूसरा वह समय है जो उन घावों को भूलकर आगे बढ़ने की पुरजोर कोशिश कर रहा है. शासन और प्रशासन की फाइलों में भले ही इसे एक बड़ी सफलता की कहानी कहा जाता है और गांव वाले इसे अपनी जिंदगी का बड़ा बदलाव मानते हैं. लेकिन धरातल पर कड़वा सच कुछ और ही है. यह आज एक ऐसा इलाका बन चुका है जो अब वैसा डरावना नहीं रहा जैसा वह पहले कभी हुआ करता था, लेकिन वह अभी वैसा मुकम्मल और खुशहाल भी नहीं बन पाया है जैसा वह हकीकत में बनना चाहता है. और शायद बिना किसी बनावट के, यही आज के पूरे बस्तर की सबसे सच्ची और धरातल वाली मुकम्मल तस्वीर है.
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