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9-12 साल का है आपका बच्चा? याद रखें पैरेंटिंग के ये 5 गोल्डन रूल्स, संवर जाएगा बच्चे का भविष्य, मजबूत होगी बॉन्डिंग

Parenting Tips Bacho ko Kaise Samjhaye: इस प्री-टीन अवस्था में जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों को सही तरीके से गाइड करें ताकि आगे जाकर आपका बच्चा एक बेहतर इंसान बन सके और माता-पिता के साथ उसकी बॉन्डिंग बेहतर हो.

9-12 साल का है आपका बच्चा? याद रखें पैरेंटिंग के ये 5 गोल्डन रूल्स, संवर जाएगा बच्चे का भविष्य, मजबूत होगी बॉन्डिंग
टीनएज में है आपका बच्चा,तो उसे समझने के लिए फॉलो करें ये टिप्स

Parenting Tips Bacho ko Kaise Samjhaye: आमतौर पर 9 से 12 साल की उम्र के बीच ही हमारे नन्हे बच्चे अचानक खुद को बड़ा समझने लगते हैं. कल तक जो हमारी गोंद में बैठ कर अपनी बातें बताने के लिए एक्साइटेड रहते थे, इस उम्र में पहुंचने पर वह हमसे बातें छुपाने लगते हैं. टीनएज से ठीक पहले का बच्चा बदलने लगता है. उनमें बदलाव आ चुका होता है शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक हर तरह से. उनमें आज़ादी की एक नई भावना पनप रही होती है और हो सकता है कि वे यह भी आजमाना चाहें कि माता-पिता की तय की गई सीमाओं को वह किस हद तक पार कर सकता है. इस प्री-टीन अवस्था में जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों को सही तरीके से गाइड करें. हम आपको पैरेंटिंग के कुछ ऐसे रूल्स समझाने जा रहे हैं जो आपके बच्चे को बेहतर इंसान बनाने में मदद करेगा और आप दोनों का रिश्ता बेहतर बनाएगा.

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प्री-टीन में बच्चों के साथ कैसे करें व्यवहार

उनकी नई-नई आजादी को समझें

इस उम्र के बच्चों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे अपने माता-पिता से थोड़ा दूर होने लगें और दोस्तों पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर रहने लगें, लेकिन माता-पिता अपने प्री-टीन बच्चे के इस तरह दूर होने को एक तरह से खुद को ठुकराया जाना मान सकते हैं. यह वह समय होता है जब बच्चे सचमुच हमसे बातें छिपाने लगते हैं. ऐसे में जिन माता-पिता में इस बदलाव को स्वीकार करने की सहनशीलता कम होती है, जो सब कुछ जानना चाहते हैं, वे बहुत ज्यादा पूछताछ करके अपने बच्चों को खुद से दूर कर सकते हैं. बच्चे को स्पेस दें और उनकी आजादी को समझें.

अपने बच्चे के साथ खास समय बिताएं

इस उम्र में बच्चे खुलकर बात नहीं करना चाहते. ऐसे में हफ्ते में एक या दो बार अपने बच्चे के साथ अकेले में समय बिताने के लिए टाइम निकालें. इस दौरान आप बच्चे पर पूरा ध्यान दें, और साथ में दूसरा कोई काम या टेक्स्टिंग न करें. ऐसा करके आप न सिर्फ अपने रिश्ते को बेहतर बना रहे हैं, बल्कि आप उन्हें ऐसे आपसी बातचीत के हुनर ​​भी सिखा रहे हैं जो भविष्य में उनके लिए बहुत जरूरी होंगे. ये 'क्वालिटी टाइम' सचमुच बहुत अहम है. हम अक्सर इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि हमारे बच्चे शायद यह कहते हैं कि उन्हें इसकी जरूरत नहीं है और वे हमसे दूर भागते हैं. हम भी अनजाने में उनकी इस आदत का साथ दे बैठते हैं.

बहुत ज्यादा जजमेंटल न बनें

इस उम्र में आपके बच्चे आपको बहुत बारीकी से देखते हैं कि आप किस तरह दूसरों को जज करते हैं. वे इस बात से संकेत लेते हैं कि आप दूसरे लोगों के बच्चों के बारे में कैसे बात करते हैं, खासकर उन बच्चों के बारे में जो किसी मुसीबत में पड़ जाते हैं, जैसे कि वह लड़की कैसे कपड़े पहनती है, या उस लड़के के तौर-तरीके अच्छे हैं या बुरे. और वे यह देख रहे होते हैं और तय कर रहे होते हैं कि आप कठोर हैं, आलोचना करने वाले है. इसके बजाय आप बच्चों की च्वाइस को तवज्जो दें और उनसे फैसलों का सम्मान करें.

ओवररिएक्ट न करें

बच्चे की गलती पर अगर आप ओवर रिएक्ट करते हैं तो अगली बार वो आप से अपनी गलती को छुपाएगा और इस तरह उसे चीजें छिपाने की आदत बन जाएगी. बच्चे के कोई गलती करने पर आप उसे समझाए कि ठीक है, कभी-कभी हो जाता है, लेकिन उसे किस तरह इसे ठीक करना है और दोबारा उस गलती को नहीं करना है.

बच्चों के इमोशनल साइड को संवारें

इस उम्र के लड़कों के लिए सबसे मुश्किल चीजों में से एक यह है कि उन्हें अपने इमोशंस को एक्सप्रेस करने से रोका जाता है. जैसे उन्हें ये बताया जाता है कि प्यार, उदासी, या अपनी कमजोरी जाहिर करना 'लड़कियों जैसी' है और इसलिए बुरी है. कम से कम माता-पिता को तो हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने बेटों को घर पर संवेदनशील और अपनी भावनाओं को जाहिर करने वाला बनने के लिए प्रोत्साहित करें.

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