भारत में जब भी नई टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और देसी बिजनेस मॉडल की बात होती है, तो नितिन गडकरी का नाम जरूर सामने आता है. हाल ही में नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने अपने पारिवारिक व्यापार का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी बहू 'शुगर से डिटर्जेंट' बनाने का काम देखती हैं. उन्होंने बताया कि इस बिजनेस से 100 कंटेनर अमेरिका भेजे जाते थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय लड़ाई शुरू होते ही एक्सपोर्ट रुक गया और कारोबार प्रभावित हो गया. गडकरी के इस बयान के बाद लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि आखिर चीनी से डिटर्जेंट कैसे बन सकता है? क्या कपड़े साफ करने वाला पाउडर वास्तव में शुगर से तैयार किया जा सकता है?
सुनने में यह बात अजीब जरूर लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरा विज्ञान और ग्रीन टेक्नोलॉजी छिपी हुई है. आज दुनिया में ऐसे बायो-बेस्ड डिटर्जेंट पर तेजी से रिसर्च हो रही है, जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं और केमिकल वाले डिटर्जेंट का विकल्प बन सकते हैं. आइए आसान भाषा में समझते हैं इस अनोखी टेक्नोलॉजी का पूरा साइंस.
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आखिर चीनी से डिटर्जेंट बनता कैसे है?
दरअसल, यहां सीधे चीनी के दानों से साबुन जैसा पाउडर नहीं बनाया जाता. शुगर यानी ग्लूकोज या गन्ने से निकलने वाले कार्बोहाइड्रेट का इस्तेमाल बायो-सर्फेक्टेंट बनाने में किया जाता है.
सर्फेक्टेंट वह तत्व होता है जो कपड़ों या बर्तनों से गंदगी हटाने का काम करता है. सामान्य डिटर्जेंट में यह काम पेट्रोलियम बेस्ड केमिकल करते हैं, लेकिन बायो-सर्फेक्टेंट नेचुरल सोर्सेज से तैयार किए जाते हैं.
चीनी को खास माइक्रोऑर्गेनिज्म और फर्मेंटेशन प्रक्रिया से गुजारा जाता है. इस दौरान बैक्टीरिया और यीस्ट शुगर को ऐसे कंपाउंड में बदल देते हैं जो झाग पैदा कर सकते हैं और गंदगी हटाने में मदद करते हैं. यही कंपाउंड आगे चलकर इको-फ्रेंडली डिटर्जेंट का आधार बनते हैं.
क्यों खास है यह टेक्नोलॉजी?
आज बाजार में मिलने वाले कई डिटर्जेंट में हार्श केमिकल होते हैं, जो पानी और मिट्टी को प्रदूषित करते हैं. वहीं शुगर बेस्ड डिटर्जेंट बायोडिग्रेडेबल होते हैं यानी ये प्राकृतिक रूप से आसानी से घुल जाते हैं.
इस टेक्नोलॉजी के कुछ बड़े फायदे हैं:
- पर्यावरण को कम नुकसान.
- त्वचा पर कम असर.
- पानी में जल्दी घुलने की क्षमता.
- पेट्रोलियम बेस्ड केमिकल पर निर्भरता कम.
- ग्रीन और सस्टेनेबल इंडस्ट्री को बढ़ावा.
दुनिया तेजी से ग्रीन प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रही है. प्लास्टिक, केमिकल और प्रदूषण कम करने के लिए कंपनियां अब नेचुरल और बायो-बेस्ड विकल्प खोज रही हैं. ऐसे में शुगर बेस्ड डिटर्जेंट आने वाले समय में बड़ा बाजार बना सकते हैं.
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