तारीख: 4 फरवरी, 2026
घटनास्थल: गाजियाबाद.
समय: रात के दो बजे.
घटना: तीन नाबालिग लड़कियों द्वारा घर की बालकनी से कूदकर खुदकुशी करने का मामला
नाम: पाखी (उम्र 12 साल), प्राची (उम्र 14 साल) और विशिका (उम्र 16 साल)
पीछे छोड़ा: आठ पेज का सुसाइड नोट और बहुत से सवाल.
सुसाइड की अब तक ज्ञात वजह: किसी कोरियन गेम से प्रभावित होना.
सुसाइड नोट में क्या लिखा था:
पिता बस इतना कह पाए -
Ghaziabad Triple Suicide Updates: 4 फरवरी की एक सर्द रात नींद के पूरे गुबार में सोई थी, गाजियाबाद की एक सोसाइटी 'भारत सिटी' की सड़कों पर गहरा सन्नाटा और अंधेरा छाया था. गाहे-बगाहे कहीं दूर कुत्तों के भौंकने की आवाजें आ रही थीं. घड़ी की छोटी सुई 12 से लुढ़क कर 2 के कंधे पर झपकी ले रही थी, तो बड़ी सुई पांच के आंकड़े को अलविदा कहने को थी... हल्की टिक-टिक से रात का सन्नाटा बिखरकर रात के गहरे पहर की गवाही दे रहा था. तभी अचानक एक के बाद एक 3 बार ऐसा शोर हुआ जो आज और अभी तक मां-बाप के सीने को चीर रहा है और शायद उनके कानों में वो आवाजें घर कर लेंगी.
ये शोर गाजियाबाद की एक सोसाइटी में गेमिंग की लत पर आपत्ति जताने के बाद तीन बहनों ने अपनी अपार्टमेंट बिल्डिंग की नौवीं मंजिल से छलांग लगाने का था...लड़कियों ने अपने कमरे को अंदर से बंद कर लिया और सुबह करीब एक-एक करके बालकनी की खिड़की से कूद गईं.

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया. यह ट्रिपल सुसाइड केस एक माता-पिता से उनकी औलादों को छीन ले गया, लेकिन पीछे छोड़ गया बहुत से सवाल. यह पहली बार नहीं था जब किसी गेम के इन्फ्लुएंस (Influence) में आकर बच्चों ने सुसाइड की हो. इससे पहले भी 'ब्लू व्हेल' नाम के गेम ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं. बच्चियों की मानसिक स्थिति, सोशल रिश्तों और फोन व गेमिंग की लत साथ ही एक ऐसे कल्चर के प्रति लगाव जिसे उन्होंने करीब से देखा ही नहीं है- सिर्फ फोन पर उसकी चकाचौंध देखी है.
कोरियन कल्चर से सिर्फ यही बच्चियां प्रभावित नहीं थीं, न ही कुछ ऐसा था कि स्कूल से ड्रॉप आउट होने के चलते उन्होंने कुछ ऐसा खोज लिया जहां तक हमारे देश के दूसरे बच्चों की पहुंच नहीं है. असल बात तो यह है कि भारत के ज्यादातर बच्चे कोरियन कल्चर से प्रभावित दिखते हैं. आप इसे पूरी तरह से मेरी ऑब्जर्वेशन कह सकते हैं. मेरे खुद के दो बच्चे हैं, दफ्तर में बहुत से और दोस्त जो मेरी ही उम्र के हैं या कम या ज्यादा हैं पर जिनके बच्चे हैं...
तकरीबन मैंने सभी के मुंह से कोरियन कल्चर, किसी खास कोरियन म्यूजिक बैंड के लिए उनके दीवानेपन की बातें सुनी हैं. कोरियन लाइफस्टाइल भारतीय बच्चों को अपनी ओर खूब खींच रहा है. वहां की चकाचौंध दूर से उन्हें ऐसा महसूस करा रही है कि अगर असल में कहीं लाइफ है तो वह बस कोरियन स्टाइल से जीने में ही है.
लेकिन खुद कोरिया के आंकड़े आपको डरा सकते हैं. शोर-शराबे, नृत्य, कला, संस्कृति और पॉप म्यूजिक की चकाचौंध में लाइफ से भरपूर दिखने वाले कोरिया में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा सवाल है. दक्षिण कोरिया में खुदकुशी की दर भारत से दोगुनी है. इसमें दुखद यह है कि यहां युवा सबसे ज्यादा जान दे रहे हैं. यहां सुसाइड करने वालों में पुरुषों का आंकड़ा महिलाओं से कहीं ज्यादा है.
इतना ही नहीं, सुसाइड प्रिवेंशन (Prevention) प्रयासों के बाद यहां के आंकड़े में जो कमी आई वह केवल 15 साल से ऊपर के लोगों में देखने को मिली. एक रिसर्च के अनुसार यहां 10 साल की उम्र के बाद से सुसाइड ट्रेंड तेजी से बढ़ते हैं. इस रिसर्च में बताया गया कि साल 2021 में यहां 10.7 फीसदी युवाओं ने अपने जीवन में कम से कम एक बार सुसाइड करने का प्रयास किया, इनमें महिलाओं का आंकड़ा 12 फीसदी था. इनमें से भी 2.5 फीसदी ने सिर्फ सुसाइड का प्लान किया था, वहीं 1.7 फीसदी ने असल में सुसाइड करने की कोशिश की थी.

क्या है मानसिक स्थिति?
जिन लोगों ने सुसाइड प्लान किया था उनमें से 83.3 फीसदी किसी दिमागी विकार (mental disorders) का शिकार थे और उनमें से सिर्फ 7.2 फीसदी ने ही इसके लिए इलाज का रास्ता चुना था.
बहरहाल, 2000 से 2019 तक दुनिया भर में युवाओं में आत्महत्या की दर कम हुई, जबकि कोरिया में युवाओं में आत्महत्या की दर बढ़ गई. कोरिया में 10-14 साल के बच्चों में आत्महत्या की दर 2000 में 0.8 और 15-19 साल के बच्चों में 6.4 थी, जो 2019 में बढ़कर क्रमशः 1.9 और 9.9 हो गई. खासकर, 10-14 साल की किशोर लड़कियों में आत्महत्या की दर 2017 में 1.2 से बढ़कर 2022 में लगभग तीन गुना यानी 3.2 हो गई.
दुनिया के नक्शे पर आत्महत्या
पूरी दुनिया में हर साल लगभग 8,00,000 लोग सुसाइड का रास्ता चुनते हैं. यानी हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जान दे देता है और हर एक सुसाइड के लिए, 20 से ज़्यादा सुसाइड की कोशिशें होती हैं.
हो सकता है कि आपके जहन में यह सवाल आए कि दुनिया में सबसे ज्यादा सुसाइड किस देश में होती हैं, तो आपको बता दें कि इस मामले में पहले नंबर पर ग्रीनलैंड आता है. इसके बाद सूरीनाम, तीसरे नंबर पर साउथ कोरिया आता है. इसके बाद गुयाना और लिथुआनिया क्रमशः चौथे और पांचवें नंबर पर हैं. इस लिस्ट में भारत 41 से 49वें नंबर के बीच आता है.
दक्षिण कोरिया में आत्महत्या की ऊंची दर के पीछे बुजुर्गों का अकेलापन और छात्रों पर पढ़ाई का दबाव जैसे कारण बताए जाते हैं.
भारत में आत्महत्या: साल 2016 में 1,00,000 आबादी पर आत्महत्या से होने वाली मौतों की दर 16.5 थी, जबकि ग्लोबल एवरेज 1,00,000 पर 10.5 था. सबसे ज्यादा जोखिम 15-29 साल के युवाओं, बुजुर्गों और खास जरूरतों वाले लोगों में देखा गया जिन्होंने इस रास्ते को चुना.
भारत से दोगुनी है दक्षिण कोरिया में खुदकुशी की दर
भारत से दोगुनी है दक्षिण कोरिया में खुदकुशी की दर भारत में 2022 में, आत्महत्या की दर 2021 की तुलना में 3.3 फीसदी बढ़ गई, जो प्रति 1,00,000 आबादी पर 12 से बढ़कर 12.4 हो गई. यह पिछले 56 सालों में रिकॉर्ड की गई सबसे ज्यादा दर है.
वहीं, कोरिया में 2022 में आत्महत्या की दर (प्रति 1,00,000 आबादी पर) 25.2 थी, और 1983 से 2022 तक यह आर्थिक संकटों और सामाजिक मुद्दों के साथ बदलती रही. 2011 में आत्महत्या रोकथाम अधिनियम लागू होने के बाद, आत्महत्या की दर में गिरावट का रुझान दिखा, लेकिन 2018 से यह फिर से बढ़ गई और 2020 से इसमें कमी आई. पुरुषों में आत्महत्या की दर महिलाओं की तुलना में ज्यादा थी.

रोकथाम नीतियों का जायजा
हालांकि कोरिया ने 2004 से अपनी आत्महत्या रोकथाम नीतियों को मजबूत किया और 2011 में आत्महत्या रोकथाम अधिनियम लागू किया. कोरिया फाउंडेशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन और स्थानीय आत्महत्या रोकथाम केंद्र कई तरह की सेवाएं और शिक्षा कार्यक्रम संचालित करते हैं. 2023 से 2027 तक नीति का लक्ष्य आत्महत्या दर को 30 फीसदी कम करना है. हालांकि, कोरिया में आत्महत्या की दरों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जो एक गंभीर मुद्दा है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स और आपको क्या करना चाहिए
आंकड़ों के इतर एक परिजन के तौर पर अगर आपकी चिंता इससे बढ़ रही है, तो एनडीटीवी ने इस मामले पर बात की डॉक्टर हेमा रत्नानी से. उनका कहना है कि आज के बच्चे बहुत कम उम्र में ही ऐसी चीजों से रूबरू हो रहे हैं, जिनके लिए उनका दिमाग तैयार नहीं होता. इंटरनेट, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन टाइम बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है.
बच्चे घंटों तक ऑनलाइन रहते हैं. इसी के चलते वे अपनी नींद, पढ़ाई और स्ट्रेस बढ़ रहा है. डॉक्टर हेमा ने कहा कि बच्चों के लिए बेहतर नींद, सोशल लाइफ और मोबाइल के इस्तेमाल पर ध्यान रखना बेहद जरूरी है.
माता-पिता के तौर पर आपको बच्चे के इंटरनेट के इस्तेमाल पर नजर रखनी होगी. चाइल्ड मोड अपने फोन में खोलकर रखें अैर हां सबसे जरूरी उससे बातें करें और जानने की कोशिश करें कि उसके जीवन में क्या चल रहा है.
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