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एक प्याली चाय और घंटों चर्चा, कुछ यूं शुरू हुआ था बंगाल का 'अड्डा कल्चर'

बंगाल का ‘अड्डा कल्चर’ क्या है और क्यों बना हुआ है चर्चा में? जानिए कैसे चाय की चुस्कियों के बीच राजनीति, खेल, फिल्म और समाज पर होने वाली ये बेफिक्र बातचीत बंगाली जीवन का अहम हिस्सा है.

एक प्याली चाय और घंटों चर्चा, कुछ यूं शुरू हुआ था बंगाल का 'अड्डा कल्चर'
बंगाली अड्डा कल्चर से जुड़ी खास बातें
NDTV

बंगाल का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में क्या आता है? रसगुल्ला, दुर्गा पूजा, पीली टैक्सी, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है. इस बार जो चर्चा में बना हुआ है वो है 'अड्डा.' बंगाल का 'अड्डा कल्चर' सिर्फ दोस्तों के साथ बैठकर बातें करने का तरीका नहीं है, बल्कि यह यहां की रोजमर्रा की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है. चाय की चुस्कियों के बीच राजनीति, खेल, फिल्म, साहित्य और समाज से जुड़े मुद्दों पर घंटों चर्चा करना ही अड्डा कहलाता है. 

क्या है बंगाल का 'अड्डा कल्चर' और कब शुरू हुआ?

बेंगाली 'अड्डा कल्चर' की शुरुआत 18वीं और 19वीं सदी में हुई. उस समय कोलकाता, जिसे तब कलकत्ता कहते थे, पढ़ाई-लिखाई, किताबों, कला और समाज में सुधार लाने के कामों का बड़ा केंद्र बन रहा था. लोग घरों के आंगन, पुस्तकालयों, क्लबों और चाय-कॉफी हाउसों में इकट्ठा होकर घंटों चर्चा किया करते थे. धीरे-धीरे यही बातचीत की संस्कृति "अड्डा" के नाम से मशहूर हो गई.

रिसर्च गेट पर प्रकाशित एक जर्नल मे भी इस बारे मे बताया गया है - 

"भारत के बड़े शहरों में से एक, कोलकाता, लंबे समय से साहित्य, कला और क्रांति की अपनी विरासत के लिए जाना जाता है. यहाँ के बंगाली लोग कला और साहित्य को एक अनोखे नज़रिए से देखते हैं; नई चीज़ों को अपनाने की उनकी आदत ने इस शहर को रचनात्मकता का एक ज़बरदस्त केंद्र बना दिया है. 'अड्डा' एक तरह की अनौपचारिक बातचीत है जो उनसे जुड़ी हुई है. इसमें आम तौर पर लोग अलग-अलग मुद्दों पर बात करते हैं. इसकी अपनी एक लय और ताल होती है. बंगाली लोग 'अड्डा' के बहुत शौकीन होते हैं. यह उनकी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है. यह उनके जीवन का इतना ज़रूरी हिस्सा है कि यह कहना गलत नहीं होगा कि 'अड्डा' के बिना एक बंगाली शायद ही रह पाए. भारतीय जन-जीवन में 'अड्डा' और 'बंगाली' एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं.'' researchgate.net

आज कल चर्चा में क्यों बना हुआ है बंगाल का 'अड्डा कल्चर'?

15 साल के शासन के बाद सत्ता से बाहर हुई ममता बनर्जी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक उठापटक मचा दी है. अब जब राजनीतिक घटनाओं की बात हो रही है, तो ये भी जान लें कि इस शिफ्ट के बाद पश्चिम बंगाल में उथल-पुथल की मुख्य वजह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उसके बाद पैदा हुआ राजनीतिक और संगठनात्मक संकट है.

बंगाल की हर गली, कोने और नुक्कड़ पर यही सवाल चल रहा है, बातें चल रही हैं, अब क्या?

इसी सवाल को ध्यान में रखते हुए NDTV ने बंगाल के लोकल रहने वाले प्रणव चैटर्जी से बातचीत की. उन्होंने बताया कि 'अड्डा' वहां के लोगों की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है. उनके अनुसार, बंगाल में बहुत से लोगों का दिन दोस्तों, पड़ोसियों या सहकर्मियों के साथ कुछ समय अड्डा लगाए बिना पूरा ही नहीं होता.

"यह सिर्फ बैठकर बातें करने का समय नहीं होता, बल्कि लोगों के लिए अपने विचार साझा करने, नई बातें जानने और रिश्तों को मजबूत बनाने का एक ज़रिया भी है.

रिसर्चगेट द्वारा की गई रिसर्च में भी यह बताया गया है कि आड्डा सिर्फ टाइमपास नहीं, बल्कि शहर में अपनी जगह बनाने और लोकतंत्र जीने का एक तरीका भी है."

अड्डा में किन बातों पर चर्चा होती है?

इतना ही नहीं, प्रणव ने आगे यह बताया कि अड्डे में किसी खास विषय की सीमा नहीं होती. चर्चा कभी भी राजनीति पर शुरू होती है और कुछ ही देर में वह क्रिकेट, फिल्मों, साहित्य, खाने-पीने या रोजमर्रा की जिंदगी के अनुभवों तक पहुंच जाती है. Down To Earth में छपे एक आर्टिकल में भी यह बताया गया है कि “ये बंगाली रिवाज अकेलेपन की दवा है."

इस कल्चर की खासियत क्या है?

प्रणव का कहना है, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यहां बातचीत पर किसी तरह का दबाव नहीं होता.  लोग खुलकर अपनी राय रखते हैं और दूसरों की बात भी ध्यान से सुनते हैं.

बंगाली अड्डा क्यों अहम है?

रिसर्च गेट में की गई एक रिसर्च के अनुसार अड्डा को बंगाली लोगों की पहचान और साथ मिलकर रहने का एक जरूरी हिस्सा माना गया है. पेपर के हिसाब से ये सिर्फ बातें करना नहीं है, बल्कि लोगों के बीच रिश्ते बनाए रखने और सबको एक साथ जोड़कर रखने का तरीका है.

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