"तू नहीं आएगा तो मैं भी नहीं जाऊंगा" से शुरू होने वाली दोस्ती हमारी लाइफ का सबसे जरूरी हिस्सा हुआ करती थी। फिर जिंदगी ने ऐसी ट्रेन पकड़ी कि हम 20 से 30 और फिर 40 के कब हो गए, कुछ पता ही नहीं चला, लेकिन इस उम्र में आकर जब हम अपनी सोशल लाइफ को देखते हैं, अचानक एहसास होता है कि जिन यारों के बिना एक दिन नहीं कटता था, उनसे बात किए हफ्तों, महीनों और कभी-कभी साल गुजर जाते हैं. सोशल मीडिया पर एक-दूसरे की तस्वीरों को 'लाइक' करना या बर्थडे पर 'HBD' लिख देना ही अब हमारी दोस्ती का दायरा बन चुका है पर क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर 40 की उम्र पार करते ही ऐसा क्या बदल जाता है कि सबसे पक्के यार भी अजनबी से लगने लगते हैं?
आइए एक नजर डालते हैं उन वजहों पर जो समय के साथ दोस्तों से दूर कर रही हैं.
द सैंडविच जनरेशन | The Sandwich Generation
40 की उम्र में लाइफ का वो फेज चल रहा होता है, जहां इंसान 'सैंडविच' बन जाता है. एक तरफ बच्चों की पढ़ाई और उनके करियर की टेंशन रहती है. वहीं, दूसरी तरफ बूढ़े होते माता-पिता की सेहत का ख्याल रखना भी आपकी बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है.
घर और बाहर के कामों के प्रेशर में इंसान इतना उलझ जाता है कि उसे खुद के लिए भी वक्त नहीं मिलता. ऐसे में दोस्तों के लिए समय निकालना लिस्ट में काफी नीचे चला जाता है.
प्रायोरिटीज
40 के बाद हर दोस्त की जिंदगी का ट्रैक अलग हो जाता है. कोई विदेश सेटल हो जाता है, तो कोई पूरी तरह अध्यात्म या फिटनेस में डूब जाता है. जब दो दोस्तों के लाइफस्टाइल और चॉइसेज में बड़ा अंतर आ जाता है, तो उनके पास बात करने के लिए 'कॉमन टॉपिक्स' कम हो जाते हैं. यही वजह है कि धीरे-धीरे बातचीत का सिलसिला कम होने लगता है.
करियर का पीक और समय की भारी कमी
40 की उम्र में अक्सर लोगों के पास बैंक बैलेंस तो होता है, लेकिन समय पूरी तरह गायब हो जाता है. कॉर्पोरेट सीढ़ी चढ़ते हुए इस उम्र में लोग अक्सर सीनियर पोजिशन या बिजनेस के टॉप पर होते हैं. काम का प्रेशर और वर्किंग आवर्स इतने बढ़ जाते हैं कि वीकेंड्स सिर्फ हफ्ते भर की थकान मिटाने और सोकर बिताने में ही निकल जाते हैं.
'फिल्टर्ड लाइफ' की चाहत
साइकोलॉजी कहती है कि उम्र के साथ इंसान की 'सोशल एनर्जी' यानी नए लोगों से मिलने और बड़े ग्रुप्स को मेंटेन करने की मानसिक क्षमता कम होने लगती है. अब हमें शोर-शराबे वाली पार्टियों से ज्यादा घर के किसी शांत कोने में बैठकर चाय पीना पसंद आता है. हम अपनी जिंदगी में ड्रामा नहीं चाहते, इसलिए हमारा सोशल सर्कल अपने आप छोटा होने लगता है.
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