Sarkari Naukri Exam System : बिहार इन दिनों प्रतियोगी परीक्षाओं में प्री और मेन्स लागू करने को लेकर विवादों में है. इसको लेकर आज पटना में बीपीएससी के खिलाफ छात्र आंदोलन कर रहे हैं. छात्र बिहार लोक सेवा आयोग से इस फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं. इसी बीच एग्जाम कंट्रोलर का बयान चर्चा में है, जिसमें कहा गया कि देश के कई राज्यों में पहले से ही UPSC की तर्ज पर प्रीलिम्स (Preliminary) और मेन्स (Mains) परीक्षा व्यवस्था लागू है. यह कोई नई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में आइए जानते हैं UPSC के तर्ज पर Pre और Mains क्यों लागू किया जा रहा है इससे छात्रों को क्या फायदा और नुकसान होगा. साथ ही इसमें राधाकृष्णन और आर्थिक अपराध ईकाई की सिफारिशों के बारे में भी बताएंगे.
2 लेवल एग्जाम क्यों कर रहे हैं राज्य लागू
दरअसल, पिछले कुछ साल में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल, फर्जी अभ्यर्थियों और मैनेजमेंट से जुड़ी कई शिकायतें सामने आई हैं. इसके बाद कई राज्यों ने चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए 2 लेवल एग्जाम सिस्टम अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं.
आखिर UPSC का Pre और Mains मॉडल क्यों?
UPSC लंबे समय से प्रीलिम्स और मेन्स के जरिए कैंडिडेट्स का सिलेक्शन करता है. इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को पहले चरण में स्क्रीन किया जाता है और फिर योग्य उम्मीदवारों को मेन्स एग्जाम का मौका मिलता है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे भर्ती प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित बनती है. साथ ही क्वेश्चन पेपर भी अलग-अलग स्टेप्स में बेहतर तरीके से चेक किया जा सकता है. राज्य सरकारें भी इसी तर्ज पर सिलेक्शन सिस्टम को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं.
राधाकृष्णन कमेटी और EOU की सिफारिशें भी बनीं आधार
राधाकृष्णन कमेटी ने परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए 2 लेवल परीक्षा कराने पर जोर दिया था. वहीं आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने भी परीक्षा को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए इस सिफारिश का समर्थन किया था. इन्हीं सुझावों के आधार पर कई राज्यों ने बहु-स्तरीय परीक्षा मॉडल पर विचार शुरू किया और कुछ ने इसे लागू भी कर दिया.
फायदे क्या हैं?
अब आते हैं कि आखिर परीक्षा प्रणाली में इस बदलाव से स्टूडेंट्स को फायदा क्या होगा...
- प्री और मेन्स मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह माना जाता है कि योग्य उम्मीदवारों की पहचान आसान हो जाती है.
- मेन्स एग्जाम में एनालिटिकल और सब्जेक्ट बेस्ड प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जिससे अभ्यर्थियों की एक्चुअल कैपिसिटी का बेहतर तरीके से पता लगाया जा सकता है
- इसके अलावा बड़ी संख्या में उम्मीदवारों वाली परीक्षाओं को मैनेज करना भी आसान हो जाता है.
नुकसान क्या हैं?
लेकिन दूसरी ओर, अभ्यर्थियों का एक वर्ग मानता है कि दो चरणों की परीक्षा से तैयारी का समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं. उम्मीदवारों को बड़ी सिलेक्शन प्रोसेस से गुजरना पड़ता है और फाइनल रिजल्ट आने में ज्यादा समय लग सकता है.
यही वजह है कि बिहार में इस मुद्दे पर बहस जारी है. समर्थक इसे पारदर्शिता और गुणवत्ता का माध्यम मानते हैं, जबकि विरोधी इसे छात्रों पर अतिरिक्त बोझ बताते हैं.
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