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रिटायर IAS Shrut Bhardwaj को फिर मिली जिम्मेदारी, क्या है Pay Minus Pension Rule?

Government Reappointment : रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की दोबारा सरकारी नियुक्ति होने पर अक्सर Pay Minus Pension नियन लागू होता है. इसके तहत पद का वेतन तय होता है, लेकिन उसमें से अधिकारी की पेंशन राशि समायोजित कर दी जाती है.

रिटायर IAS Shrut Bhardwaj को फिर मिली जिम्मेदारी, क्या है Pay Minus Pension Rule?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार किसी विभाग में विशेष अनुभव और संस्थागत जानकारी की जरूरत होती है.

Pension and Salary Rules : राजस्थान कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन (RCDF) में रिटायरमेंट के बाद एक्स एमडी श्रुति भारद्वाज की दोबारा नियुक्ति की खबर ने एक बार फिर पे माइनस पेंशन सिस्टम को चर्चा में ला दिया है. आम लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि जब कोई सरकारी अधिकारी रिटायर्ड हो चुका है और उसे पेंशन मिल रही है, तब दोबारा सरकारी पद मिलने पर उसे सैलरी कैसे दिया जाता है? क्या उसे पूरी सैलरी और पूरी पेंशन दोनों मिलती हैं? इन्हीं सवालों के जवाब हम इस आर्टिकल में आपको देने जा रहे हैं. 

Pay Minus Pension क्या है?

दरअसल, सरकार कई बार एक्सपीरिएंस अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद कॉन्ट्रैक्ट या स्पेशल अप्वाइंटमेंट के बेसिस पर फिर से महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करती है. ऐसे मामलों में आमतौर पर पे माइनस पेंशन (Pay Minus Pension) नियम लागू किया जाता है. इसका मतलब है कि अधिकारी को उस पद का तय सैलरी तो मिलेगा, लेकिन उसमें से उसकी पेंशन का अमाउंट घटा दी जाएगी.

कैसे तय होती है सैलरी?

मान लीजिए किसी पद का मंथली सैलरी 1 लाख रुपये है और संबंझित अधिकारी को 40 हजार रुपये पेंशन मिल रही है. लेकिन पे माइनस पेंशन नियम के तहत अधिकारी को वेतन के रूप में केवल 60 हजार रुपये दिए जाएंगे.पेंशन अलग से मिलती रहेगी, लेकिन कुल फाइनेंशियल बेनेफिट्स तय नियमों के अनुसार समायोजित किया जाता है. हालांकि, विभिन्न राज्यों और संस्थानों में नियुक्ति की शर्तों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है. इसलिए फाइनल पेमेंट संबंधित आदेश और सेवा नियमों पर निर्भर करता है.

सरकारें क्यों करती हैं ऐसी अप्वाइनमेंट?

एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपर्टस का मानना है कि कई बार किसी विभाग में स्पेशल एक्सपीरिएंस और इंस्टीट्यूशनल जानकारी की जरूरत होती है. ऐसे में सरकारें अनुभवी और पहले से काम कर चुके अधिकारियों को दोबारा जिम्मेदारी सौंप देती हैं. इससे विभागीय कामकाज में निरंतरता बनी रहती है और नई नियुक्ति तक व्यवस्था प्रभावित नहीं होती.

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