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Success Story: पिता की मौत के बाद एक्सीडेंट में गंवाए पैर, फिर BPSC पास कर अफसर बनीं आंगनबाड़ी सेविका की बेटी

ब‍िहार के औरंगाबाद के डिंडिर गांव की सोनम कुमारी ने हादसों और असफलताओं को पछाड़कर 70वीं BPSC परीक्षा में 1812वीं रैंक हासिल की है. जानिए दोनों पैरों गंवाने के बाद बिना कोचिंग रेवेन्यू ऑफिसर बनने की उनकी प्रेरणादायक कहानी.

Success Story: पिता की मौत के बाद एक्सीडेंट में गंवाए पैर, फिर BPSC पास कर अफसर बनीं आंगनबाड़ी सेविका की बेटी
Success Story: आंगनबाड़ी सेविका की बेटी का कमाल, पिता को खोया, एक्सीडेंट झेला... फिर भी बनीं BPSC रेवेन्यू ऑफिसर
NTDV

Success Story: बिहार के औरंगाबाद जिले के हसपुरा प्रखंड अंतर्गत डिंडिर गांव की बेटी सोनम कुमारी ने वह कर दिखाया है, जो लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है. 70वीं BPSC संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में 1812वीं रैंक हासिल कर उन्होंने राजस्व अधिकारी (रेवेन्यू ऑफिसर) के पद पर चयनित होकर अपने दिवंगत पिता का अधूरा सपना पूरा कर दिया. (आदित्य कुमार की र‍िपोर्ट)

2016 का वह काला दिन जिसने जिंदगी बदल दी

NDTV से बातचीत में सोनम कुमारी ने बताया क‍ि ब‍िहार लोक सेवा आयोग की तैयारी के लिए पटना में रहकर पढ़ाई कर रही थीं. वर्ष 2016 में एक भयानक सड़क दुर्घटना हो गई, जिसमें दोनों पैरों के पंजे काटने पड़े और  आर्टिफिशियल पैर लगाए गए.  महीनों अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा और कई सर्जरियां हुईं. डॉक्टरों ने साफ कह दिया था-"अब सामान्य जीवन जीना मुश्किल होगा. 

एक्‍सीडेंट में दोनों पैरों गंवाने, सिर से पिता का साया उठने और दो बार असफल होने के बाद भी सोनम कुमारी का हौसला नहीं टूटा. उनकी यह कहानी "संघर्ष से सफलता तक" का जीता-जागता उदाहरण है.

सोनम बताती हैं क‍ि उस वक्त लगा कि सब खत्म हो गया. 6 महीने बिस्तर पर रही और 2 साल तक मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुकी थी. ऐसा लगा जैसे सारे सपने चकनाचूर हो गए. 

इसी दौरान 2015 में उनके पिता अमर प्रसाद काअहार्ट अटैक से निधन हो गया था. पिता हमेशा कहते थे-"बेटी, तुझे बड़ा अफसर बनना है." पिता का साथ छूट गया, पैर चले गए और घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर हो गई. आखिर मां पुष्पावती कुमारी की आंगनबाड़ी सेविका की तनख्वाह पर ही घर का खर्च चलने लगा.

हार के बाद भी मैदान नहीं छोड़ा: दो बार असफलता, तीसरी बार विजय

हादसे के बाद सोनम ने 2016 में BPSC का पहला प्रयास किया था, लेकिन तब तैयारी अधूरी रह गई थी. स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद 2019 में उन्होंने दोबारा तैयारी शुरू की. लेकिन किस्मत ने फिर परीक्षा ली और उन्हें लगातार दो बार असफलता का सामना करना पड़ा. सोनम कोचिंग का खर्च वहन नहीं कर सकती थीं और गांव में भी मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था.

BPSC की तैयारी के ल‍िए ब‍िहार की सोनम कुमारी ने खुद को ही अपना गुरु बना लिया. प्रतिदिन 6 से 8 घंटे नियमित पढ़ाई की. टॉपर्स के इंटरव्यू देखे और मुफ्त ऑनलाइन क्लास का सहारा लिया. जो विषय समझ नहीं आते थे, उन्हें बार-बार पढ़ा और खुद के नोट्स तैयार किए. सोनम कहती हैं, "जब 2019 में मैंने गंभीर होकर तैयारी शुरू की, तब मुझे BPSC का पाठ्यक्रम भी ठीक से नहीं पता था. लेकिन धीरे-धीरे सब सीखा. असफलता ने मुझे और अधिक मजबूत बनाया."

"रुक जाना नहीं..." गीत और मां की ममता बनी ढाल

सोनम बताती हैं कि संघर्ष के सबसे कठिन दिनों में एक गीत ने उन्हें संभाले रखा-"रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के, कांटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के. जब भी निराश होती, अकेले में यही गुनगुनाती थी. ये पंक्तियां मेरे लिए दवा का काम करती थीं."  उनकी सबसे बड़ी ताकत बनीं उनकी मां पुष्पावती कुमारी, जिन्होंने बेटी की हर हार पर हौसला बढ़ाया और हर छोटी उपलब्धि पर मिठाई खिलाकर उनका मनोबल ऊंचा रखा.

सोनम कुमारी का डिंडिर गांव से BPSC तक सफर

  • 2008: डिंडिर गांव के विद्यालय से मैट्रिक (10वीं).
  • 2010: हसपुरा से इंटरमीडिएट (12वीं) डिस्टिंक्शन के साथ उत्तीर्ण.
  • 2014: दाउदनगर कॉलेज से स्नातक (ग्रेजुएशन).
  • 2016: पटना में तैयारी के दौरान सड़क दुर्घटना.
  • 2016–2018: इलाज, सर्जरी और मानसिक रिकवरी का दौर.
  • 2019–2025: बिना किसी कोचिंग के, पूर्णतः स्व-अध्याय (सेल्फ-स्टडी) से तैयारी.
  • 2026: 70वीं BPSC में सफलता और रेवेन्यू ऑफिसर के रूप में चयन.

सोनम का संदेश: "सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता"

अपनी सफलता के बाद सोनम युवाओं, विशेषकर छात्राओं को यह संदेश दे रही हैं. उन्‍होंने कहा क‍ि रील्स या निरर्थक वीडियो देखने में समय व्यर्थ न करें. केवल प्रेरणादायक सामग्री देखें और पढ़ाई पर ध्यान दें. परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, अपना हौसला न टूटने दें. "मेरे पैर नहीं हैं, पर मेरे सपने बहुत बड़े हैं. रोज थोड़ा-थोड़ा पढ़ें, लेकिन पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखें. शरीर की किसी कमी को अपनी कमजोरी न बनने दें. यदि दिमाग और हौसला बुलंद हो, तो मंजिल मिल ही जाती है.

गांव में खुशी की लहर

सोनम के चयन की खबर मिलते ही डिंडिर गांव में जश्न का माहौल है. ग्रामीणों ने एक-दूसरे को मिठाइयां बांटीं. गांव के लोगों का कहना है, "सोनम ने साबित कर दिया कि बेटियां किसी से कम नहीं होतीं. दिव्यांगता शरीर की हो सकती है, इरादों की नहीं." 

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