70वीं बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) परीक्षा का परिणाम आते ही स्नेहा कुमारी ने सबसे पहले अपने पिता को फोन किया. दूसरी तरफ फोन उठाते ही उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “पापा, हो गया.”
ये तीन शब्द केवल एक परीक्षा में सफलता के सूचक नहीं थे, बल्कि उस पिता के दशकों लंबे संघर्ष का परिणाम, जिन्होंने 13 साल की उम्र से परिवार की जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी थी. आर्थिक परिस्थितियों के कारण वे खुद अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने हमेशा एक सपना देखा, उनके बच्चे उस मुकाम तक पहुंचें, जहां तक वह खुद नहीं पहुंच पाए.
NDTV से बातचीत में स्नेहा कहती हैं, “रिजल्ट देखने के बाद सबसे पहला ख्याल यही आया कि अब पापा का सालों का सपना पूरा हो गया. उन्होंने बचपन से ही काम करना शुरू कर दिया था. ज्वाइंट फैमिली की जिम्मेदारियां निभाई, अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी, लेकिन हमेशा चाहते थे कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बड़ा करें. सबसे पहले मैंने उन्हें ही फोन किया था.”
आज स्नेहा बिहार प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बनने जा रही हैं. उनका चयन सब इलेक्शन ऑफिसर (Sub Election Officer) के पद पर हुआ है. लेकिन इस मंजिल तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था. इसमें असफलताएं थी, सामाजिक ताने थे, सीमित संसाधन थे और खुद पर भरोसा बनाए रखने की लंबी परीक्षा भी.

पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) की रहने वाली स्नेहा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई शांतिनिकेतन जुबली स्कूल, मोतिहारी से की. इसके बाद उन्होंने पटना के कृष्णा निकेतन स्कूल से 12वीं पास की. स्कूल के दिनों में उनका सपना इंजीनियर बनने का था. उन्होंने JEE की तैयारी भी की, लेकिन परीक्षा में सफलता नहीं मिली.
वह कहती हैं, “JEE में असफल होने के बाद मैं काफी निराश हो गई थी. उस समय लगा कि शायद मैं प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए नहीं बनी हूं. इसलिए मैंने अपने ही शहर के एमएस कॉलेज से BBA में दाखिला ले लिया.” ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद उनके सामने दो ऑप्शन थे, MBA करना या फिर सिविल सेवा की तैयारी.
“मेरे भाई-बहनों ने मुझ पर भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि तुम यह कर सकती हो. उनके विश्वास ने मुझे नया आत्मविश्वास दिया और वहीं से मेरी सिविल सेवा की यात्रा शुरू हुई.”
पहले ही प्रयास में मिली सफलतास्नेहा ने 2024 में पहली बार UPSC और BPSC दोनों परीक्षाएं दीं. UPSC में सफलता नहीं मिली, लेकिन BPSC में उन्होंने पहले ही प्रयास में 467वीं रैंक हासिल कर ली. खास बात यह रही कि उन्होंने तैयारी के लिए किसी बड़े शहर का रुख नहीं किया. उन्होंने अपने घर से ही ऑनलाइन और सीमित ऑफलाइन संसाधनों की मदद ली.
“घर से तैयारी करके कुछ नहीं होगा”स्नेहा कहती हैं कि तैयारी का सबसे कठिन हिस्सा किताबें नहीं थीं, बल्कि लोगों की सोच थी. उन्हें बार-बार सुनना पड़ता था-
“घर से तैयारी करके कुछ नहीं होगा.”
“इतनी आजादी क्यों दे रहे हो बेटी को?”
“गलत करियर चुन लिया है.”
“JEE नहीं निकला, BPSC भी नहीं निकलेगा.”
स्नेहा बताती हैं कि तैयारी के दौरान कई ऐसे मौके आए जब उन्हें लगा कि शायद उनसे यह परीक्षा नहीं निकलेगी. पहली टेस्ट सीरीज का अनुभव आज भी उन्हें याद है. “मैं आधा पेपर भी पूरा नहीं कर पाई थी. उस दिन लगा कि शायद मुझसे नहीं होगा. मैं बहुत निराश थी.” लेकिन उसी समय उनके पिता ने उन्हें हौसला दिया. “पापा हमेशा कहते थे, ‘तुम बस मेहनत करती रहो, सब अच्छा होगा.'
मां ने हर बार संभालास्नेहा अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को भी देती हैं. वह कहती हैं कि घर में कभी उनसे घरेलू कामों का दबाव नहीं बनाया गया. “मेरी मां ने कभी यह नहीं कहा कि पहले घर का काम करो. उन्होंने हमेशा कहा कि तुम्हारा काम अभी सिर्फ पढ़ाई करना है. अगर परिवार का यह सहयोग नहीं मिलता तो शायद मैं इतनी एकाग्रता से तैयारी नहीं कर पाती.”
सीमित संसाधन, लेकिन मजबूत रणनीतिस्नेहा का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता ज्यादा किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि जो पढ़ा है उसे बार-बार दोहराने से मिलती है. उन्होंने अपनी तैयारी के दौरान बहुत सीमित स्रोत रखे. पॉलिटी के लिए लक्ष्मीकांत, इतिहास के लिए NCERT और Spectrum, इकोनॉमिक्स के लिए मृणाल सर, भूगोल के लिए NCERT, विज्ञान के लिए Lucent और बिहार विशेष के लिए ‘बिहार तथ्य संग्रह' पढ़ा. करंट अफेयर्स के लिए उन्होंने कई अंग्रेजी के अखबार नियमित पढ़े.
उनका कहना है कि इससे सिर्फ जानकारी ही नहीं मिली, बल्कि विश्लेषण करने की क्षमता भी विकसित हुई, जिसका फायदा निबंध और उत्तर लेखन में मिला. “BPSC में सिर्फ जवाब पता होना काफी नहीं है. समय पर पूरा पेपर खत्म करना भी उतना ही जरूरी है. इसलिए मैंने उत्तर लिखने की लगातार प्रैक्टिस की.”
सोशल मीडिया से दूरीस्नेहा बताती हैं कि रिजल्ट आने तक उनका इंस्टाग्राम अकाउंट भी नहीं था. हालांकि, उन्होंने यूट्यूब का इस्तेमाल पढ़ाई के लिए किया. “मैं सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर थी. यूट्यूब पर केवल पढ़ाई, कुछ फ्री लेक्चर और कभी-कभी डांस वीडियो देखती थी. मेरा मानना है कि सोशल मीडिया बुरा नहीं है, उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है.”
जब पढ़ाई से मन भर जाता थास्नेहा को फ्रीस्टाइल डांसिंग का शौक है. इसके अलावा उन्हें टेरेस गार्डनिंग करना भी पसंद है. वह बताती हैं कि जब पढ़ाई नहीं होती थी या लगातार तनाव महसूस होता था, तब वह एक-दो दिन का ब्रेक लेती थी, परिवार से बात करती थीं, फिल्में देखती थीं या डांस करती थी. “ब्रेक लेना गलत नहीं है. जरूरी यह है कि ब्रेक के बाद फिर उसी ऊर्जा के साथ वापस लौटें.”
एक महिला कैंडिडेट होने की चुनौतियांस्नेहा कहती हैं कि पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में आज भी लड़कियों के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने को लेकर लोगों की सोच पूरी तरह नहीं बदली है. “जब कोई लड़की ऐसे क्षेत्र में जाती है तो लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते. अगर वह सफल नहीं होती तो उसे दूसरी लड़कियों के लिए उदाहरण बनाकर कहा जाता है कि देखो, पढ़ाई का क्या फायदा हुआ.”
वह मानती हैं कि समाज को बेटियों की शिक्षा और करियर को लेकर अपनी सोच बदलनी होगी. “लड़कियों को भी शिक्षा के अवसर मिलने चाहिए जितने लड़कों को मिलते हैं.”
अब लोकतंत्र को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी
सब इलेक्शन ऑफिसर के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी को लेकर स्नेहा बेहद गंभीर हैं. उनका मानना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से मजबूत नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करने से मजबूत होता है कि हर योग्य नागरिक बिना किसी डर और भेदभाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके. वह विशेष रूप से महिलाओं, फर्स्ट टाइम वोटर, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने पर काम करना चाहती हैं.
एस्पिरेंट्स के लिए संदेशस्नेहा का संदेश बेहद सरल है. “प्रतियोगिता किसी दूसरे से नहीं, खुद से होती है. हर दिन खुद का बेहतर बनने की कोशिश कीजिए. सीमित स्रोत रखिए, बार-बार रिवीजन कीजिए, प्रीवियस ईयर के क्वेश्चन और टेस्ट सीरीज पर ध्यान दीजिए, उत्तर लिखा कीजिए. कोई पहले प्रयास में सफल होता है, कोई दसवें प्रयास में. मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती.”
स्नेहा की कहानी यह साबित करती है कि सफलता केवल बड़े शहरों, महंगी कोचिंग या बेहतर संसाधनों की मोहताज नहीं होती. अगर परिवार का विश्वास साथ हो, लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत में निरंतरता हो, तो एक छोटे शहर की बेटी भी पहले ही प्रयास में BPSC जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पास कर सकती है.
यह भी पढ़ें- Success Story : न कोटा, न दिल्ली... नवादा के अमूल ने घर पर ऑनलाइन पढ़ाई कर NEET UG 2026 में हासिल की सफलता...
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं