- लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 64 देशों के साथ ग्रुप्स बनाए हैं, जिससे पारंपरिक डिप्लोमेसी को समर्थन मिलेगा
- सांसदों के बीच संवाद, सहयोग और भरोसा बढ़ाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता इन ग्रुप्स का नेतृत्व करेंगे
- पहले चरण में कई प्रमुख देशों को शामिल किया गया है, जिसमें अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और सऊदी अरब शामिल हैं
केंद्र सरकार दुनिया के कुछ खास देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने के लिए पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप ग्रुप्स पर फोकस कर रहा है. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को सरकार की इस नीति को लेकर एक बड़ा बयान भी दिया. उन्होंने कहा कि 60 से ज्यादा देशों के साथ बनाए गए पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप ग्रुप्स कुछ खास देशों के साथ रिश्ते और गहरे करने के लिए जहां एक तरफ काम करेगा. वहीं, दूसरी तरफ पार्लियामेंट्री डिप्लोमेसी को भारत की फॉरेन पॉलिसी के सेंट्रल पिलर के तौर पर मजबूत बनाएगा . आपको बता दें कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 64 देशों के साथ पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप ग्रुप्स बनाए हैं. यह एक अहम कदम है जिसका मकसद भारत के इंटर-पार्लियामेंट्री जुड़ाव को बढ़ाना और लगातार लेजिस्लेटिव बातचीत के जरिए पारंपरिक डिप्लोमेसी को सपोर्ट करना है.
केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने बताई इसकी वजह
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में किरेन रिजिजू ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और दूसरे देशों के बीच जुड़ाव बढ़ाने के लिए पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप ग्रुप्स बनाने का प्रस्ताव दिया था. स्पीकर ओम बिरला ने अब 60 से ज्यादा देशों के साथ ये ग्रुप्स बनाए हैं, जिससे ग्लोबल डेमोक्रेटिक रिश्ते मजबूत हुए हैं. रिजिजू ने कहा कि यह पहल बड़े देशों के साथ रिश्तों को गहरा करेगी और देश की फॉरेन पॉलिसी फ्रेमवर्क के एक अहम पिलर के तौर पर पार्लियामेंट्री डिप्लोमेसी को और मजबूत करेगी. लेजिस्लेटर-टू-लेजिस्लेटर के बीच मजबूत जुड़ाव से भरोसा, बातचीत और सहयोग बढ़ेगा,जो ग्लोबल स्टेज पर एक जिम्मेदार और लीडिंग डेमोक्रेसी के तौर पर भारत की बढ़ती भूमिका को दिखाता है.
कौन-कौन से नेता होंगे इसका हिस्सा
इस कदम से अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों के सांसद इन ग्रुप्स को लीड करेंगे, जिससे ग्लोबल स्टेज पर इंडियन डेमोक्रेसी के इनक्लूसिव और मल्टी-फेसटेड नेचर को दिखाया जाएगा. वरिष्ठ सांसद जिनमें रविशंकर प्रसाद, एम थंबीदुरई, पी चिदंबरम, राम गोपाल यादव, टीआर बालू, काकोली घोष दस्तीदार, गौरव गोगोई, कनिमोझी करुणानिधि, मनीष तिवारी, डेरेक ओ'ब्रायन, अभिषेक बनर्जी, असदुद्दीन ओवैसी, अखिलेश यादव, केसी वेणुगोपाल, राजीव प्रताप रूडी, सुप्रिया सुले, संजय सिंह, बैजयंत पांडा, शशि थरूर, निशिकांत दुबे, अनुराग सिंह ठाकुर, भर्तृहरि महताब, डी. पुरंदेश्वरी, संजय कुमार झा, हेमा मालिनी, बिप्लब कुमार देब, सुधांशु त्रिवेदी, जगदंबिका पाल, सस्मित पात्रा, अपराजिता सारंगी, श्रीकांत एकनाथ शिंदे, पीवी मिधुन रेड्डी और प्रफुल्ल पटेल शामिल हैं, अपने-अपने ग्रुप्स को हेड करेंगे.
पहले फेज में कौन से देश शामिल होंगे
पहले फेज में श्रीलंका, जर्मनी, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, साउथ अफ्रीका, भूटान, सऊदी अरब, इजरायल, मालदीव, यूनाइटेड स्टेट्स, रूस, यूरोपियन यूनियन पार्लियामेंट, साउथ कोरिया, नेपाल, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान, इटली, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, सिंगापुर, ब्राजील, वियतनाम, मेक्सिको, ईरान और यूनाइटेड अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं.जल्द ही इस नेटवर्क को और देशों में बढ़ाने का प्लान है। इन ग्रुप्स का मकसद सीधे लॉमेकर-टू-लॉमेकर बातचीत, लेजिस्लेटिव एक्सपीरियंस शेयर करना, बेस्ट प्रैक्टिस का एक्सचेंज करना और ट्रेड, टेक्नोलॉजी, सोशल पॉलिसी, कल्चर और डेमोक्रेटिक समाजों के सामने आने वाली ग्लोबल चुनौतियों पर चर्चा करना है.
इस पहल का मकसद रेगुलर बातचीत, स्टडी विजिट और जॉइंट विचार-विमर्श के जरिए भरोसा बनाना, आपसी समझ को बढ़ावा देना और बाइलेटरल रिश्तों को मजबूत करना है.आपको बता दें कि यह गठन ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए मल्टी-पार्टी आउटरीच पर आधारित है, जिसमें नेशनल सिक्योरिटी और हितों पर भारत का एक जैसा नजरिया पेश करने के लिए विदेश में अलग-अलग पार्टियों के डेलीगेशन भेजे गए थे. उस कोशिश ने भारत की पार्टी के मतभेदों से ऊपर उठने और जरूरी मामलों पर एक साथ अपनी बात रखने की क्षमता को दिखाया.
ये ग्रुप एक पार्टिसिपेटरी फॉरेन पॉलिसी पर जोर देते हैं जो डेमोक्रेटिक वैल्यूज पर आधारित लोगों से लोगों और इंस्टीट्यूशन से इंस्टीट्यूशन के कनेक्शन को प्राथमिकता देती है. पार्टी लाइन से ऊपर उठकर और हर तरह के नेताओं को शामिल करके, यह पहल भारत के डेमोक्रेटिक फ्रेमवर्क की गहराई और मैच्योरिटी को दिखाती है.यह देशों के बीच एक जरूरी पुल के तौर पर पार्लियामेंट की भूमिका को मजबूत करता है, जो आपस में जुड़ी दुनिया में लगातार सहयोग और कोलेबोरेशन को बढ़ावा देता है.
आखिर क्या है इसका उद्देश्य
अगर इस समूह के उद्देश्य की बात करें तो वो है सांसदों के बीच संवाद स्थापित करना. साथ ही साथ आपसी संबंधों को भी मजबूत करना. इससे पार्लियामेंट टु पार्लियामेंट और पीपल टू पीपल कनेक्ट को बढ़ाने का विचार है. कहा जा रहा है कि इन समूहों की मदद से वैश्विक चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही सांस्कृतिक प्रसार भी होगा. आपको बता दें कि मैत्री समूह बनाने का यह पहला चरण है. दूसरे चरण में और भी देशों को शामिल किया जा सकता है.
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