सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर SC के दो अहम फैसले, जानें SC/ST/OBC और जनरल कैटेगिरी के लिए क्‍या है मतलब

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर हाल ही में दो बेहद महत्‍वपूर्ण फैसले सुनाए हैं. आइए जानते हैं कि इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या निर्णय दिया है और इन दोनों मामलों का जनरल कैटेगरी सहित और आरक्षिण कैटे‍गरी पर क्‍या असर होगा.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में जनरल कैटेगरी को लेकर हाल ही में दो ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं.
  • अदालत ने इन फैसलों में अपने पूर्व के रुख को दोहराया है. इन फैसलों का जनरल कैटेगरी पर कई स्तरों पर असर पड़ेगा.
  • अदालत के मुताबिक, सामान्य श्रेणी जाति, वर्ग या लिंग की परवाह किए बिना सभी के लिए खुली है.
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नई दिल्‍ली:

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सरकारी नौकरियों में जनरल कैटेगरी (General Category) को लेकर हाल ही में दो ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं. देश की शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार बिना किसी रियायत या छूट का लाभ उठाए सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से बेहतर प्रदर्शन करता है, तो उसे जनरल या ओपन कैटेगरी में ही माना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों फैसले में अपने पूर्व के रुख को ही दोहराया है. सुप्रीम कोर्ट के इन नए फैसलों का जनरल कैटेगरी पर असर कई स्तरों पर पड़ेगा. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले सरकारी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में मेरिट आधारित चयन को और मजबूत करेंगे.

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने 19 दिसंबर को राजस्‍थान हाई कोर्ट के एक फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ओपन कैटेगरी का अर्थ है 'खुला' यानी इसमें शामिल होने की इकलौती शर्त मेरिट है. अदालत के फैसले से यह साफ हुआ कि जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर किसी को इससे बाहर नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आवेदन पत्र में आरक्षित श्रेणी का उल्लेख कर देने भर से कोई उम्मीदवार अपने आप केवल आरक्षित पद के लिए योग्य नहीं हो जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कर्नाटक के एक मामले की सुनवाई करते भारतीय वन सेवा के अनारक्षित कैडर में अनुसूचित जाति श्रेणी के उम्मीदवार की नियुक्ति पर विचार करने से इनकार कर दिया. इस मामले में उम्मीदवार ने चयन के प्रारंभिक परीक्षा चरण में आरक्षण का लाभ उठाया था.

सुप्रीम कोर्ट के ये दोनों फैसले आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को जनरल या ओपन या सामान्य सूची में शामिल करने की सीमा के संबंध में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

सामान्य वर्ग के लिए इन दो आदेशों का क्या अर्थ है?

राजस्‍थान से जुड़े मामले में पेश हुए एडवोकेट कार्तिक सेठ ने एनडीटीवी को बताया कि सुप्रीम कोर्ट का 19 दिसंबर का फैसला जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदलता है, बल्कि यह वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के पहले के रुख को और मजबूत करता है.

सेठ ने कहा कि यह फैसला कोई नया कानूनी सिद्धांत नहीं देता है, बल्कि पहले से तय स्थिति को ही दोहराता है. खासतौर पर इंदिरा साहनी मामले में यह साफ किया गया था कि आरक्षित श्रेणी के मेधावी उम्मीदवारों को उनकी योग्यता के आधार पर मौका मिलना चाहिए. यदि वे बिना किसी रियायत या छूट का लाभ उठाए सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल करते हैं, तो उन्हें खुली श्रेणी की सीटों पर शामिल किया जा सकता है.

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सेठ ने कहा कि राजस्थान मामले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि आरक्षित श्रेणी के वे उम्मीदवार, जो चयन के किसी भी स्तर पर बिना किसी रियायत या छूट का लाभ उठाए सिर्फ अपनी योग्यता के आधार पर चयनित होते हैं, उन्हें शॉर्टलिस्टिंग के चरण में भी खुली श्रेणी की रिक्तियों में शामिल किया जाना चाहिए.

सेठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि अगर किसी उम्मीदवार ने किसी भी चरण में छूट या रियायत का लाभ लिया है, चाहे वह प्रारंभिक स्तर पर ही क्यों न हो तो उसे सामान्य श्रेणी की सीटों पर विचार करना स्वीकार्य नहीं है. सेठ ने बताया कि इस स्थिति को छह जनवरी 2026 को यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जी. किरण और अन्य के मामले में आए फैसले में और मजबूत किया गया है. कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि एक बार आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार ने किसी भी प्रकार की छूट का लाभ ले लिया तो अनारक्षित पदों को लेकर उनके नाम पर विचार नहीं किया जा सकता है.

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जस्टिस जेके माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने मंगलवार को केंद्र सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की. यह याचिका कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें अनुसूचित जाति के एक उम्मीदवार को सामान्य सूची में शामिल करने की अनुमति दी गई थी सिर्फ इसलिए कि उसकी रैंक सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से बेहतर थी, जबकि उसने परीक्षा के प्रारंभिक चरण में छूट का लाभ लिया था.

कार्तिक सेठ ने एनडीटीवी को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अब यह साफ कर दिया है कि सार्वजनिक भर्ती में 'खुली' या 'सामान्य' श्रेणी का मतलब क्या है और इन रिक्तियों का दायरा कितना है.

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'सामान्य श्रेणी' की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

  1. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आरक्षित श्रेणियों (SC, OBC, MBC, EWS आदि) का कट-ऑफ सामान्य श्रेणी से अधिक होता है, तो वे उम्मीदवार जो सामान्य कट-ऑफ पार करते हैं, उन्हें सरकारी नौकरियों में सामान्य कोटा में शामिल किया जाना चाहिए.
  2. अदालत ने दोहराया कि सामान्य श्रेणी जाति, वर्ग या लिंग की परवाह किए बिना सभी के लिए खुली है यानी इन पदों पर नियुक्ति का एकमात्र आधार योग्यता है.कोर्ट ने अपने पुराने रुख को मजबूत करते हुए कहा कि आरक्षित श्रेणी के मेधावी उम्मीदवारों को सामान्य सूची से बाहर रखना गलत है.
  3. सुप्रीम कोर्ट ने सौरव यादव मामले का हवाला देते हुए कहा, “खुली श्रेणी सभी के लिए खुली है. इसमें शामिल होने की शर्त सिर्फ मेरिट है, चाहे उम्मीदवार के आरक्षण का अवसर उपलब्ध हो या न हो.” अदालत ने यह भी जोड़ा कि इस सिद्धांत को व्यवहार में लाना जरूरी है, बिना ‘इमीग्रेशन' जैसे शब्दों से भ्रमित हुए.
  4. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती अभियानों में ‘खुली', ‘अनारक्षित' या ‘सामान्य' श्रेणी का मतलब उन पदों से है जिन पर कोई भी योग्य उम्मीदवार नियुक्त हो सकता है, चाहे वह किसी भी जाति, जनजाति, वर्ग या लिंग का हो. ऐसे पद किसी भी वर्ग के लिए आरक्षित नहीं होते और सभी के लिए खुले रहते हैं.
  5. अदालत ने यह भी कहा कि आवेदन पत्र में आरक्षित श्रेणी का उल्लेख करने से उम्मीदवार खुद आरक्षित पद के लिए योग्य नहीं हो जाता है. यह केवल उसे आरक्षित श्रेणी के भीतर प्रतिस्पर्धा का अधिकार देता है.

राजस्थान हाई कोर्ट का मामला क्‍या है?

  • यह मामला राजस्थान हाई कोर्ट की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है. अगस्त 2022 में हाई कोर्ट और जिला अदालतों में जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के 2,756 पदों के लिए परीक्षा हुई थी. चयन प्रक्रिया में 300 अंकों की लिखित परीक्षा और 100 अंकों का टाइपिंग टेस्ट भी शामिल था.
  • मई 2023 में परिणाम घोषित होने के बाद यह सामने आया कि कई आरक्षित श्रेणियों (SC, OBC, MBC, EWS) के कट-ऑफ अंक सामान्य श्रेणी से अधिक थे. कुछ उम्मीदवारों ने सामान्य कट-ऑफ पार कर लिया था, लेकिन अपनी श्रेणी के कट-ऑफ से कम अंक होने के कारण उन्हें टाइपिंग टेस्ट से बाहर कर दिया गया. उम्मीदवारों ने इसे अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
  • हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मेरिट को प्राथमिकता दी जानी चाहिए यानी जो उम्मीदवार सामान्य कट-ऑफ पार करते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में शामिल किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा और अपीलकर्ताओं की "डबल बेनिफिट" वाली दलील को खारिज कर दिया.


कर्नाटक का मामला क्या है?

  • यह विवाद 2013 में आयोजित भारतीय वन सेवा (आईएफएस) परीक्षा से संबंधित है, जो दो चरणों में हुई थी: प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्‍य परीक्षा और इंटरव्‍यू.
  • प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य कट-ऑफ 267 अंक था, जबकि अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ 233 अंक था. जी किरण (अनुसूचित जाति) ने रियायती कट-ऑफ का लाभ उठाते हुए 247.18 अंक प्राप्त किए, जबकि एंटनी एस मरियप्पा (सामान्य) ने सामान्य कट ऑफ के आधार पर 270.68 अंक प्राप्त किए. अंतिम मेरिट सूची में किरण का रैंक 19वां और एंटनी का रैंक 37वां था. हालांकि कैडर आवंटन के दौरान कर्नाटक में सामान्य वर्ग के लिए एक इनसाइडर पद था और अनुसूचित जाति के कोई पद रिक्त नहीं था.
  • केंद्र सरकार ने एंटनी को जनरल इनसाइडर का पद आवंटित किया और किरण को तमिलनाडु कैडर में रखा गया. किरण ने इसे सेंट्र्रल एडिमिनिस्‍ट्रेशन ट्रिब्‍यूनल (कैट) और कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी. दोनों ही अदालतों ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया क्योंकि उन्होंने आखिर में बेहतर रैंक हासिल की थी.

कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या कहा?

हाई कोर्ट के फैसलों को को रद्द करते हुए जस्टिस माहेश्‍वरी ने अपने लिखे फैसले में कहा कि आईएफएस परीक्षा एक एकीकृत चयन प्रक्रिया है, जिसमें दो अनिवार्य चरण शामिल हैं.इसका अर्थ है कि प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करना मुख्य परीक्षा में प्रवेश के लिए एक पूर्व शर्त है और इसलिए प्रारंभिक चरण में प्राप्त किसी भी छूट को बाद के चरणों में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

दोनों फैसले पूरी तरह से अलग-अलग मामलों से संबंधित हैं.लेकिन ये दोनों मामले सुप्रीम कोर्ट की ओर से इंदिरा साहनी मामले स्थापित समानता के लंबे समय से चले आ रहे सिद्धांत को ही स्थापित करते हैं.

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