सबरीमला मामले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्‍पणी- "सुधार के नाम पर धर्म को खत्म नहीं किया जा सकता"

सबरीमला केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुधार के नाम पर धर्म खत्म नहीं किया जा सकता और धार्मिक आस्था से जुड़े मामलों को पूरी तरह न्यायिक बहस का विषय नहीं बनाया जा सकता।

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  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुधार के नाम पर धर्म को समाप्त नहीं किया जा सकता
  • वकील इंदिरा जयसिंह ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के अधिकार का समर्थन करते हुए अनुच्छेद २५(१) का हवाला दिया
  • न्यायालय ने धार्मिक परंपराओं को अचानक खत्म करने की बजाय उन्हें समय के साथ सुधारने की आवश्यकता पर जोर दिया
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नई दिल्‍ली:

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सुधार के नाम पर धर्म का खत्‍म नहीं किया जा सकता है. सबरीमला मामले में सुनवाई के 10वें दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुधार के नाम पर धर्म को समाप्त नहीं किया जा सकता और आस्था व अंतरात्मा से जुड़े मामलों को पूरी तरह न्यायिक बहस का विषय नहीं बनाया जा सकता. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी भी की कि जो महिलाएं भगवान अयप्पा की सच्ची भक्त हैं, वे 50 साल की उम्र तक सबरीमाला मंदिर नहीं जाएंगी.  

अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह दूरी नहीं बना सकतीं

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ सबरीमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के 10वें दिन वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के अधिकार का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25(1) हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और यह अधिकार धार्मिक संस्थाओं के अधिकार (अनुच्छेद 26) से अधिक महत्वपूर्ण है. उन्होंने यह भी कहा कि अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह दूरी नहीं बना सकतीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान का एक जरूरी हिस्सा है.  

सदियों से चल रही परंपराओं को अचानक नहीं किया जा सकता खत्‍म

जयसिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं का दावा केवल मंदिर में प्रवेश तक सीमित है. वे मंदिर के अंदर होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों या परंपराओं में बदलाव की मांग नहीं कर रही हैं. धर्म समय के साथ बदलता है और समाज के अनुसार, उसमें सुधार होता रहता है. इस पर जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि अनुच्छेद 25(2)(बी) राज्य को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है लेकिन यह खुद कोई मौलिक अधिकार नहीं है. सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना को कमजोर नहीं करना चाहिए. सदियों से चली आ रही परंपराओं और रीति-रिवाजों को अचानक खत्म नहीं किया जा सकता. 

कोर्ट कैसे तय करेगा कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी?

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि अदालत कैसे तय करेगी कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है? जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि एक ही धर्म में अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं, ऐसे में अदालत के लिए सही व्याख्या तय करना मुश्किल होगा. उन्होंने यह भी कहा कि अगर अदालत हर बार हस्तक्षेप करेगी तो संवैधानिक सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है. पीठ ने चिंता जताई कि अगर हर व्यक्ति अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मंदिर में नियम बदलने लगे, तो इससे अव्यवस्था फैल सकती है. 

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कोर्ट ने कहा- हम धर्म को खत्म करने की प्रक्रिया...

वकील इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि किसी महिला के मंदिर में प्रवेश से किसी को कोई कानूनी नुकसान नहीं होता. अगर कोई महिला धार्मिक मान्यता के कारण नहीं जाना चाहती तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है, लेकिन सभी महिलाओं पर रोक लगाना सही नहीं है. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि धार्मिक भावनाओं और परंपराओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हम धर्म को खत्म करने वाली प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकते. 

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सबरीमला मामले में क्यों हुआ UCC का जिक्र 

सबरीमला मामले में सुनवाई के दौरान वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि कई राज्यों ने मंदिर प्रवेश से जुड़े कानून बनाए हैं, जो सामाजिक सुधार का संकेत हैं. इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि क्या अदालत गैर-हिंदू धार्मिक संस्थानों के लिए भी समान दिशानिर्देश दे सकती है, जहां ऐसे कानून नहीं हैं? जयसिंह ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) को संविधान के नीति निदेशक तत्वों में इसलिए रखा गया है, क्योंकि यह एक नीतिगत फैसला है. भले ही देश में एक समान UCC लागू नहीं है, लेकिन अलग-अलग समुदायों के लिए कुछ एकरूप कानून पहले से मौजूद हैं.  जस्टिस BV नागरत्ना ने टिप्पणी की कि UCC तब लागू होगा जब समाज इसके लिए तैयार होगा और संसद उचित समय पर इस पर निर्णय लेगी. उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल यह प्रक्रिया राज्यों के स्तर पर आगे बढ़ रही है. जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि यदि राज्य सामाजिक सुधार के लिए कदम नहीं उठाता तो क्या अदालत हस्तक्षेप कर सकती है. साथ ही, क्या समानता के आधार पर किसी धार्मिक प्रथा को समाप्त किया जा सकता है.

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