मजदूरी छोड़ी, पैसे खर्च किए, घंटों इंतजार किया... फिर भी राशन नहीं मिला; बस्तर में नक्सलवाद के बाद की असली लड़ाई

NDTV Ground Report: बस्तर में जहां एक तरफ नक्सलवाद के खत्म होने के दावे किए जा रहे हैं… वहीं दूसरी तरफ एक और लड़ाई जारी है, भूख के खिलाफ… दूरी के खिलाफ… और उस सिस्टम के खिलाफ… जो है तो सही… लेकिन समय पर पहुंचता नहीं.

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नक्सलियों के गढ़ में राशन के इंतजार में बैठे लोग.
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  • सरकार ने संसद में कहा कि भारत नक्सलवाद से लगभग मुक्त हो चुका है और बस्तर में विकास हुआ है.
  • बस्तर के हर गांव में स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और राशन की दुकानें खोलने के लिए अभियान चलाया गया है.
  • लेकिन NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में नक्सलियों के गढ़ में राशन वितरण में तकनीकी समस्याएं सामने आई हैं.
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सुकमा/बस्तर:

NDTV Ground Report: 'नक्सल मुक्त भारत' की डेडलाइन 31 मार्च 2026 आज पूरी हो रही है. सरकार ने संसद में दावा किया कि नक्सलवाद अब समाप्त हो गया है. लोकसभा में नक्सल मुक्त भारत पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा- "देश में अब नक्सलवाद खत्म होने की कगार पर है... जब यह पूरी प्रक्रिया औपचारिक रूप से पूरी हो जाएगी, तब देश को इसकी जानकारी दी जाएगी. लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि हम नक्सल-मुक्त हो चुके हैं." अमित शाह ने इस चर्चा के दौरान यह भी कहा, "आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है. बस्तर के हर एक गांव में स्कूल खोलने के लिए एक अभियान चलाया गया."

अमित शाह ने संसद में बताया- बस्तर में क्या कुछ हुआ?

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा- इस क्षेत्र के हर गांव में राशन की दुकान खोलने के लिए एक मुहिम शुरू की गई. हर तहसील और पंचायत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) स्थापित किए गए हैं. लोगों को आधार कार्ड और राशन कार्ड जारी किए गए हैं, और अब उन्हें 5 किलोग्राम अनाज मिल रहा है. मैं बस उन लोगों से यह पूछना चाहता हूँ जो यहां नक्सलवाद की वकालत कर रहे थे, लोगों को अब तक ये लाभ क्यों नहीं मिले?..."

बस्तर में नक्सलवाद के बाद की असली लड़ाई

संसद में कहे अमित शाह के बयान के अनुसार छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में बड़ी तेजी से विकास हुआ है. स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, राशन की दुकानें खुली हैं. लेकिन क्या यह पर्याप्त है? इस पर अभी भी सवाल है. NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में बस्तर में नक्सलवाद के बाद की असली लड़ाई नजर आई. 

नक्सलियों के गढ़ रहे जगरगुंडा में NDTV को क्या दिखा?

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में स्थित जगरगुंडा, जो कभी नक्सलियों का गढ़ (Red Corridor) माना जाता था, वहां पहुंचने से पहले NDTV की टीम ने एक राशन दुकान के बाहर कई ग्रामीणों को खड़ा देखा. पास में चावल से भरा ट्रैक्टर खड़ा था… लेकिन वितरण रुका हुआ था. करीब 58 राशन कार्ड धारकों को उनका हक नहीं मिला. राशन दुकान संचालक माड़वी हडमा ने तकनीकी दिक्कत का हवाला दिया.

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राशन के इंतजार में बैठे लोग.

लोगों ने बताया- मजदूरी छोड़ी, पैसे खर्च किए, घंटों इंतजार के बाद भी नहीं मिला राशन

वहां मौजूद लोगों ने कहा- हर व्यक्ति ने ₹400 से ₹500 तक खर्च किए. पूरा गांव मिलकर ₹3,000 से ₹4,000 जोड़कर ट्रैक्टर किराए पर लिया. महुआ सीजन था एक दिन की कमाई ₹500 से ₹600… वह भी छूट गई. और इसके बाद…घंटों पैदल चलकर… जंगलों को पार कर…करीब 12 घंटे राशन दुकान के बाहर खड़े रहने के बाद… उन्हें कुछ भी नहीं मिला. 

यह कहानी सिर्फ एक दुकान की नहीं है… यह बस्तर की वह सच्चाई की है, जो नक्सलवाद के खत्म होने के दावों के बीच भी ज़िंदा है.

राशन दुकान संचालक ने बताया- क्या आ रही दिक्कतें

राशन दुकान संचालक माड़वी हडमा ने कहा, “नए राशन कार्ड जारी हुए हैं, लेकिन तकनीकी समस्या की वजह से कई लोग अपना राशन नहीं ले पा रहे हैं. करीब 58 लोगों को अभी तक राशन नहीं मिला है.” राशन में चावल, चना, शक्कर और गुड़ शामिल हैं, वही सामान, जिस पर कई परिवारों का पूरा महीना निर्भर करता है.

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राशन के वहां पहुंचे माड़वी लक्ष्मण के लिए यह देरी सीधे भूख से जुड़ी है. वह कहते हैं, “हमारे परिवार में चार लोग हैं. हमें तीन महीने का राशन मिलना था, लेकिन एक महीने का भी नहीं मिला न चावल, न गुड़, न चना.”

स्थानीय सोड़ी मंगल ने समस्या की असली कीमत बताई

एक अन्य स्थानीय सोड़ी मंगल की कहानी इस समस्या की असली कीमत बताती है. उन्होंने कहा- “मैं सुबह 4 बजे गांव से निकला. करकनगुड़ा तक पैदल गया. वहां से नरसापुरम पहुंचे और फिर ट्रैक्टर से यहां आए. हम 10 बजे पहुंच गए थे, लेकिन राशन नहीं मिला,”  वह आगे बताते हैं, “मेरी एक दिन की मजदूरी चली गई. महुआ सीजन में ₹500–₹600 मिल जाते हैं. ऊपर से ट्रैक्टर के लिए ₹400–₹500 देने पड़े. पूरा गांव ₹3,000–₹4,000 मिलाकर ट्रैक्टर किराये पर लेता है.”

नक्सलियों के गढ़ में रहने वाले लोगों ने अपनी परेशानी बताई.

स्थानीय बोले- हमारे गांव में सड़क नहीं, सकूल नहीं, आंगनबाड़ी भी नहीं

मंगल ने वितरण में असमानता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा- “सुरपंगुड़ा के लोगों को दो-तीन महीने का राशन मिल चुका है, लेकिन हम 58 कार्ड धारकों को कुछ नहीं मिला,” राशन की दुकान पर खड़े स्थानीय सोड़ी मंगल ने कहा- "हमारा गांव सड़क से 2-3 किलोमीटर अंदर है. वहां सड़क नहीं है, स्कूल नहीं है, आंगनबाड़ी भी नहीं है. हमारे गांव में 300-400 लोग रहते हैं.” 

करकनगुड़ा से आए कार्ती मट्टा ने भी वही दर्द दोहराया. उन्होंने कहा- “मैं सुबह 4 बजे निकली, नरसापुर पहुंची और 9 बजे ट्रैक्टर से यहां आई. मुझे तीन महीने का राशन मिलना था, लेकिन सिर्फ दो महीने मिला है. एक महीने के राशन के लिए सुबह से इंतज़ार कर रही हूं.” 

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खाद्य विभाग के निरीक्षक ने माना दिक्कतें हैं

मामले की जानकारी मिलने पर खाद्य विभाग के निरीक्षक विजय कुमार मौके पर पहुंचे. उन्होंने माना कि दिक्कतें हैं. उन्होंने कहा-“नए राशन कार्ड वालों को राशन दिया जा चुका है. पुराने कार्ड धारकों का वितरण बाकी है. इस बार करीब 3 क्विंटल 65 किलो राशन की कटौती भी हुई है.” 

खाद्य विभाग के निरीक्षक विजय कुमार ने देरी की वजह भी बताई. उन्होंने कहा- “चावल की सप्लाई अक्सर देर से आती है, जिससे पुराना स्टॉक अटका रहता है. केंद्र सरकार का हिस्सा आ गया है, लेकिन राज्य सरकार का हिस्सा अभी आना बाकी है.” 

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राशन वितरण में आ रही दिक्कतों के बारे में बताते लोग.

अधिकारी बोले- इन ग्रामीणों के गांव में भी खोली जाएगी दुकान

दूरी की समस्या पर उन्होंने कहा, “हमने अधिकारियों को बताया है कि इनके गांव में ही राशन दुकान खोली जाए, क्योंकि यहां तक आना इनके लिए बहुत मुश्किल है. जल्द ही इस पर काम शुरू होगा.” लेकिन ज़मीन पर खड़े लोगों के लिए ये जवाब अधूरे हैं.

बस्तर में जहां एक तरफ नक्सलवाद के खत्म होने के दावे किए जा रहे हैं… वहीं दूसरी तरफ एक और लड़ाई जारी है, भूख के खिलाफ… दूरी के खिलाफ… और उस सिस्टम के खिलाफ… जो है तो सही… लेकिन समय पर पहुंचता नहीं.

सवाल सीधा है, अगर लोग घंटों चलकर आएं… अपनी जेब से पैसे खर्च करें… दिनभर की मजदूरी गंवाएं… और फिर भी खाली हाथ लौट जाएं तो क्या सच में विकास पहुंच गया है?

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